राहुल-वाड्रा कांग्रेस अब पतन की ओर!
   Date11-Jun-2019
जयकृष्ण गौड़
कांग्रेस की दुर्गति क्या करारी पराजय के कारण हो रही है? जिस पार्टी में वैचारिक दृढ़ता नहीं होती वह संकट के समय स्थिर नहीं रह पाती और अस्तित्व को बचाने का सवाल पैदा हो जाता है। चाहे वर्तमान सोनिया-राहुल-वाड्रा की कांग्रेस स्वयं को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस कहे, इस नाम की कांग्रेस को इंदिरा गांधी ने 1969 में ही समाप्त कर दिया। इस बारे में उल्लेख करना होगा कि 1966 में लालबहादुर शास्त्री की मृत्यु होने के बाद वरिष्ठ नेताओं ने इंदिराजी को प्रधानमंत्री पद के लिए चुना। वरिष्ठ नेताओं को विश्वास था कि इंदिराजी उनके नियंत्रण में रहेगी। मोरारजी देसाई को उपप्रधानमंत्री बनाया गया। 1967 के चुनाव में 515 में से 283 सीटों पर कांग्रेस की जीत दर्ज हुई। सिंडीकेट के नेताओं ने इंदिराजी के प्रभाव को कम करने की कोशिश की। इंदिराजी ने मोरारजी भाई को उपप्रधानमंत्री पद से हटा दिया। सन् 1969 में राष्ट्रपति चुनाव में सिंडीकेट ने नीलम संजीव रेड्डी को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया। जबकि इंदिराजी ने वी.वी. गिरी को राष्ट्रपति के लिए खड़ा किया। इंदिराजी ने आत्मा की आवाज से मत करने की अपील की। वी.वी. गिरी बहुत कम वोटों के अंतर से विजयी हुए। 1969 में कांग्रेस समिति के बेंगलोर अधिवेशन में कांग्रेस पार्टी का औपचारिक विभाजन हो गया। सिंडीकेट की कांग्रेस को कांग्रेस (ओ) कहा गया। इंदिराजी की कांग्रेस को कांग्रेस (आई) की पहचान मिली। 1971 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस (आई) को भारी बहुमत मिला और ओल्ड कांग्रेस अर्थात् कांग्रेस (ओ) हाशिये पर आ गई और उसका अस्तित्व इंदिराजी ने खत्म कर दिया। तब से अब तक कांग्रेस (आई) अस्तित्व में है जो इसे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस कहता है उसे चुनाव आयोग का रिकार्ड देख लेना चाहिए। पुराना चुनाव चिन्ह गाय बछड़ा केवल इतिहास में दर्ज है। कांग्रेस (आई) की जगह अब सोनिया-राहुल कांग्रेस ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को बैनर इसलिए लगाया कि इंदिराजी को भुला दिया जाए। क्योंकि इंदिराजी के नाम के साथ आपातकाल का घटनाक्रम उभरता है। स्वर्ण मंदिर में किए गए ऑपरेशन ब्लू स्टार की याद ताजा हो जाती है। वर्तमान कांग्रेस इंदिराजी के नाम को भुलाने की कोशिश कर रही है, जबकि इस कांग्रेस की मूल पहचान है कांग्रेस (आई)। वर्तमान कांग्रेस को सोनिया-राहुल-वाड्रा कांग्रेस कहना उचित होगा। कांग्रेस में हो रही भगदड़ का मूल कारण है कि कांग्रेस से जुड़े लोग अवसरवादी है, 'जिधर दम उधर हमÓ जैसी स्थिति है। इसलिए कांग्रेस में लगातार पलयान हो रहा है। वैचारिक दृढ़ता पराजय की चुनौती को स्वीकार कर आगे बढऩे को प्रेरित करती है। वैचारिक शून्यता में अस्तित्व ही मिट जाता है। जो कांग्रेस राहुल गांधी के विचारों से प्रेरित है, जो राहुल स्वयं कांग्रेस के विचारों को नहीं जानते। वे कांग्रेस की नैया को पार लगाने की बजाए उसे डुबो देंगे। जिस दल का वैचारिक आधार समाप्त हो जाता है उसका पतन निश्चित है। जिस दल का नेतृत्व अवसर, महत्वाकांक्षा और अवसरवाद से ग्रस्त हो, उसको कोई बचा नहीं सकता। दिशाहीन, विचारहीन कांग्रेस अब इतिहास में दर्ज होने जा रही है। चाहे भाजपा हो या अन्य कोई दल हो, जो भी अपने मूल को छोड़ देता है वह संकट का सामना करना की बजाए पतन के रास्ते पर चल पड़ता है। भारतीय राजनीति की सामान्य घटना नहीं है, जब तेलंगाना में कांग्रेस के दो तिहाई विधायक अर्थात् बारह विधायकों ने कांग्रेस से नाता तोड़ सत्तारूढ़ तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) में शामिल हो गए। कांग्रेस के अब छह विधायक बचे है वे भी अपने भविष्य की तलाश कर रहे है। राजनीतिक आकलन के आधार पर कहा जा सकता है कि तेलंगाना कांग्रेस मुक्त हो गया। ऐसा थोक में दल-बदल हरियाणा में भजनलाल के नेतृत्व में हुआ था। तब कांग्रेस में जाने वाले अवसरवादियों का तांता लग रहा था। सुना है कि जगमोहन जातीय आधार पर छह उपमुख्यमंत्री बनाएंगे। कांग्रेस का बिखराव केवल तेलंगाना में नहीं है, बल्कि राजस्थान और पंजाब में भी ऐसी ही स्थिति पैदा हो गई है। राजस्थान में विधानसभा चुनाव में कांग्रेस बहुमत प्राप्त करने में सफल रही थी। लोकसभा चुनाव 2019 में सभी 26 सीटों पर लाखों के अंतर से भाजपा ने प्रभावी जीत दर्ज की है। राहुल गांधी ने भी आरोप लगाया है कि राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गेहलोत ने अपने पुत्र को जिताने में पूरा जोर लगा दिया। लेकिन फिर भी वे जीत नहीं सके। पुत्र मोह में कांग्रेस की हत्या की गई। अब वहां अशोक गेहलोत को हटाकर सचिन पायलट को मुख्यमंत्री बनाने की मांग की जा रही है। कांग्रेस की पराजय के लिए अशोक गेहलोत को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। कांग्रेस विधायक पी.आर. मीणा ने सार्वजनिक रूप से मांग की है कि अशोक गेहलोत के स्थान पर सचिन पायलट को मुख्यमंत्री बनाया जाए। उल्लेख करना होगा कि राजस्थान में बहुत कम अंतर से विधानसभा में कांग्रेस को बहुमत मिला है। जानकार कह रहे है कि राजस्थान में कांग्रेस की अस्थिर सरकार है, वहां बदलाव कभी भी हो सकता है। कुल मिलाकर ऐसी ही स्थिति मध्यप्रदेश की है। म.प्र. में जनता का बहुमत भाजपा को मिला है और सीटों की तीन-चार सीटें कम होने से यहां कांग्रेस को सरकार बनाने का अवसर मिला। लोकसभा चुनाव में मोदी की आंधी में कांग्रेस के मजबूत पेड़ भी उखड़ गए। मध्यप्रदेश में केवल अपने बेटे को कमलनाथ जीता सके। शेष सभी 28 सीटों पर भाजपाने जीत दर्ज की। कांग्रेस हाईकमान का आरोप है कमलनाथ ने केवल अपने बेटे की सीट पर ध्यान केंद्रित किया, इसलिए शेष सभी 28 सीटों पर भाजपा का विजयी परचम फहराया। राजनीतिक पंडितों का आकलन है कि म.प्र. की कमलनाथ सरकार की किसी भी समय अकाल मौत हो सकती है। इस बारे में उल्लेखनीय है कि दिग्विजय सिंह जो पराजय के बाद भी भोपाल में डेरा डाले हुए है। इसी प्रकार ज्योतिरादित्य सिंधिया अपनी पुश्तैनी की गुना सीट से पराजित हो गए। वे भी कमलनाथ के वर्चस्व को समाप्त करने में लगे है। कमलनाथ, सिंधिया और दिग्विजय सिंह की आपसी खींचतान से मध्यप्रदेश में अराजक स्थिति पैदा हो गई है। बिजली और पेयजल संकट से लोग त्राहि-त्राहि कर रहे हैं। पंजाब में कांग्रेस की स्थिति मजबूत मानी जाती है। मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह सूझबूझ से सरकार चला रहे है। वे ममता बेनर्जी की तरह केंद्र से टकराव भी नहीं चाहते, लेकिन जब से नवजोत सिंह सिद्धू को पंजाब की कैबिनेट में शामिल किया गया, तभी से केप्टन अमरिंदर सिंह और सिद्धू के बीच टकराव की स्थिति पैदा हो गई है। लोकसभा चुनाव की भी पराजय का ठीकरा एक-दूसरे पर फोड़ रहे है। इस लोकसभा चुनाव में पंजाब में कांग्रेस ने तेरह में से 8 सीटें जीती है। मुख्यमंत्री केप्टन अमरिंदर सिंह की सिद्धू से नाराजी का कारण यह है कि सिद्धू ने मुख्यमंत्री का नाम लिए बिना कहा था कि 'बादलों से मिलीभगत करने वालों को भी ठोंक दो।Ó सिद्धू से स्थानीय निकाय मंत्रालय छीन लिया है। अब उन्हें ऊर्जा विभाग दिया है।। संचात्मक व्यवस्था पर भी सवाल इसलिए उठ रहे है कि प. बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बेनर्जी केंद्र की मोदी सरकार के खिलाफ सीधे टकराव की स्थिति में है। वे प्रधानमंत्री को प्रधानमंत्री नहीं मानती, केंद्र की आयुष्यमान योजना का भी वे विरोध कर रही है। नीति आयोग की बैठक के आमंत्रण को भी अस्वीकार कर उन्होंने नीति आयोग के औचित्य पर ही सवाल उठाया है। प. बंगाल इन दिनों हिंसा की आग में जल रहा है। हर रोज राजनीतिक कार्यकर्ताओं की हत्या हो रही है। जिस तरह रोम के बारे में कहा जाता है कि 'जब रोम अग्नि में जलता है तो नीरो गाता था गाने।Ó इसी तरह ममता बेनर्जी कानून व्यवस्था को संभालने की बजाए वे विरोधियों को चेतावनी देते हुए कहती है कि जो हमसे टकराएगा वह चूर चूर हो जाएगा। भाजपा और टीएमसी कार्यकर्ताओं के बीच खूनी झड़पें आए दिन हो रही है। भाजपा की ओर से कहा जा रहा है कि उसके करीब सौ कार्यकर्ताओं की हत्या हुई है। ममता बेनर्जी विपक्ष को कुचलने ेमें लगी हुई है। अब वहां भाजपा की विजय यात्रा पर भी बंदिश लगा दी है। गत 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने प. बंगाल में 40 में से 18 सीटों पर प्रभावी जीत दर्ज की है। भाजपा को मिले वोटों का प्रतिशत चालीस तक पहुंच गया है। तृणमूल कांग्रेस के नेता टीएमसी को छोड़ भाजपा में शामिल हो रहे है। एक नगर निगम पर भाजपा काबिज हो गई है। ममता की बेचैनी और घबराहट भाजपा के कारण बढ़ गई है। दीवार पर क्षेत्रीय दल टीएमसी के पतन की भविष्यवाणी लिखी जा चुकी है। ममता ने कम्युनिस्टों से संघर्ष कर उन्हें शून्य कर दिया।