प्रदूषण से पस्त होते मौलिक अधिकार
   Date10-Jun-2019
धर्मधारा
दे श के शासन-प्रशासन का संचालन संविधान में बताए गए नियम-कानूनों के अनुसार चलता है। हमारा संविधान महज एक किताब न होकर एक जीवंत दस्तावेज है जो समय के साथ-साथ संशोधित होकर विकसित होता रहता है। पर्यावरण संरक्षण को लेकर संविधान में किए गए प्रावधान इसकी विकासशील प्रकृति को दर्शाते हैं। नागरिकों के जीने के बेहतर मानक और प्रदूषण रहित स्वच्छ वातावरण संविधान में निहित हैं। 'पर्यावरण संरक्षण अधिनियम-1986Ó के मुताबिक पर्यावरण में हवा, पानी एवं जमीन के साथ पेड़-पौधे व जीव-जंतु भी समाहित हैं। संविधान के अनुच्छेद-21 के अनुसार व्यक्ति को जीवन जीने एवं व्यक्तिगत आजादी का अधिकार है। किसी कानूनी कार्यवाही को छोड़कर इसी अनुच्छेद की समय-समय पर अच्छी तरह से व्याख्या की गयी है एवं बताया गया है कि यह जीवन जीने का मौलिक अधिकार भी प्रदान करता है। स्वच्छ वातावरण में जीवन जीने के अधिकार को पहली बार उस समय मान्यता मिली, जब 1978 में देहरादून में चूने की खदानों के खनन से पैदा प्रदूषण के विरोध में सुप्रीम कोर्ट में प्रकरण दर्ज हुआ। वर्तमान समय में देश में चारों ओर फैल रहे। वायु, जल, ध्वनि एवं मिट्टी के प्रदूषण ने स्वच्छ वातावरण में जीवन जीने का मौलिक अधिकार ही छीन लिया है। साफ पर्यावरण में जीने के लिए शुद्ध हवा, पानी, शांति एवं विष-रहित खाद्य व पेय पदार्थ जरूरी हैं। एक औसत व्यक्ति को प्रतिदिन लगभग 14 किलो हवा, 5-6 लीटर पेयजल एवं 1.5 से 2.0 किलोग्राम भोजन लगता है। शुद्ध रूप में इनके मिलने से उसका स्वास्थ्य ठीक रहता है एवं वह स्वयं, उसका परिवार देश के विकास में योगदान देता है। वर्तमान समय में व्यक्ति को ये चीजें निर्धारित मात्रा में तो लगभग मिल रही हैं, परंतु वे प्रदूषित कई कारणों से वायु प्रदूषण अब महानगरों, नगरों से होकर छोटे शहरों एवं गांवों में भी फैल गया है। यह दुखद संयोग है कि देश की राजधानी दिल्ली के निवासी शुद्ध वायु पाने के मौलिक अधिकार से सबसे ज्यादा वंचित है।