सदाचार की शक्ति
   Date01-Jun-2019
प्रेरणादीप
दे वों और असुरों में घोर युद्ध हो रहा था। राक्षसों के शस्त्रबल और युद्ध- कौशल के सम्मुख देवता टिक नहीं पा रहे थे। वे हारकर जान बचाकर भागे और महर्षि दत्तात्रेय के पास पहुँचकर उनसे अपनी विपत्ति की गाथा कह सुनाई। महर्षि ने उन्हें धैर्य बँधाते हुए पुन: लडऩे को कहा। फिर लड़ाई हुई, किंतु देवता फिर हार गए और जान बचाकर पुन: महर्षि दत्तात्रेय की शरण में पहुँचे। इस बार असुरों ने भी उनका पीछा किया। वे भी महर्षि दत्तात्रेय के आश्रम में आ पहुँचे। असुरों के आश्रम में प्रविष्ट होने पर उनका स्वागत एक नवयुवती स्त्री ने किया। बस, दानव लडऩा भूल गए और उस पर मुग्ध हो गए। वह नवयुवती और कोई नहीं, बल्कि रूप बदले हुए लक्ष्मी जी ही थीं।
महर्षि दत्तात्रेय ने अब देवताओं से कहा- 'अब तुम तैयारी करके, फिर से असुरों पर चढ़ाई करो।Ó लड़ाई छिड़ी और इस बार देवताओं ने असुरों पर विजय प्राप्त की। असुरों का पतन हुआ। विजय प्राप्त करके देवता फिर दत्तात्रेय के पास आए और पूछने लगे-'महर्षि! दो बार पराजय मिलने और अंत में विजय प्राप्त होने के पीछे का क्या रहस्य है?Ó महर्षि दत्तात्रेय ने उत्तर दिया-'जब तक प्राणी सदाचारी व संयमी रहता है, तब तक उसमें उसका पुण्यबल विद्यमान रहता है और जब वह कुपथ पर बढ़ चलता है तो उसका आधा बल क्षीण हो जाता है। परनारी का अपहरण करने की कुचेष्टा में असुरों का आधा बल नष्ट हो गया था, तभी तुम उन पर विजय प्राप्त कर सके।Ó