हताशा में थप्पड़, दुर्योधन की याद...
   Date09-May-2019
शक्तिसिंह परमार
भारतीय राजनीति का यह वह कालखंड है, जिसमें नेता एक-दूसरे के दामन पर दाग दिखाकर स्वयं को पाक-साफ बताने से नहीं अघा रहे हैं...लोकसभा चुनाव के इस वैचारिक समर के पांच चरणों का सिंहावलोकन करें तो पता चलता है कि चुनावी समर के मैदान में मुद्दों और ज्वलंत समस्याओं से इतर बयानी बोल को ही 'हर मर्जÓ की दवा के रूप में पेश किया जा रहा है...दो विचारधाराओं पर केंद्रित हो चुका यह वैचारिक समर जिस तेज गति से परिणामों की तरफ बढ़ रहा है..,उतनी ही तेजी से नेताओं और जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगों की जुबान बयानों के जरिए मारकाट मचाने का माहौल निर्मित करती नजर आ रही है...लोकसभा के इस वैचारिक समर के सात चरण हैं और नेता/दलों के लिए यह सात चरणों का 'चुनावी चक्रव्यूहÓ भी है, जिसके पांच चरणों को भेदा जा चुका है...शेष दो चरणों के लिए सभी ने अपना सबकुछ झोंक दिया है...ऐसे में जो विकृति सामने आ रही है, वह लोकतंत्र के मान से चिंता पैदा करने वाली है...क्योंकि जब आप प्रधानमंत्री पद पर बैठे व्यक्ति के साथ बयानों के जरिए, आरोपों के जरिए, किसी सड़कछाप व्यक्ति की भांति व्यवहार करते नजर आते हैं..,तब यह लोकतत्र में सार्वजनिक जीवन की पहली शर्त 'बड़प्पनÓ का भी हनन माना जाना चाहिए...क्योंकि राजनीतिक शालीनता को ताक पर रखकर कोई चुनाव जीतना भी हारने जैसा ही है...
लोस चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने झारखंड के चाइबासा में कांग्रेस के साथ ही संपूर्ण विपक्ष को जब यह चुनौती दी कि वे दिल्ली से लेकर पंजाब और भोपाल तक के चुनाव पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के नाम पर लड़कर दिखाएं...तो इस चुनौती में बुराई क्या है..? क्योंकि जब आप बार-बार मोदी से और भाजपा सरकार से 5 सालों के विकास-कार्यों का हिसाब मांग रहे हैं...विकास के मुद्दों के आधार पर उन्हें घेरने की कोशिश कर रहे हैं..,तब क्या आपका भी यह नैतिक धर्म नहीं बनता कि आप अपने नेतृत्वकर्ताओं की विकास गाथाओं का पिटारा खोलें.., जनता को बताएं कि उन्होंने क्या-क्या किया...मोदी की उस चुनौती को सहज रूप से स्वीकार करने के बजाय कांग्रेस हमलावर रूप में अब यह कहने से नहीं अघा रही है कि मोदी ने दिवंगत प्रधानमंत्री का अपमान किया...आखिर इसमें अपमान जैसा क्या है..? स्वयं राजीव गांधी ने अपने कार्यकाल में इस बात को स्वीकार किया था कि दिल्ली से चला एक रुपया गांव तक पहुंचते-पहुंचते 15 पैसे रह जाता है... उसी समय उन्होंने यह भी कहा था कि वे सत्ता के दलालों को राजनीति से बेदखल करेंगे...फिर उनकी वही राजनीति बोफोर्स के जरिए सत्ता के मोल-भाव का जरिया क्यों बन गई..?
मिस्टर क्लीन के नाम से पहचान बनाने वाले राजीव गांधी भी जाते-जाते अपने दामन पर बोफोर्स का स्याह दाग लगाकर गए थे...भले ही उनके दिवंगत होने के बाद अदालत ने उन्हें इस मामले में बरी कर दिया हो..,लेकिन प्रधानमंत्री मोदी ने जो कहा कि वे अपने साथ मिस्टर क्लीन के बजाय मिस्टर भ्रष्ट का दाग लेकर गए तो इसमें गलत क्या है..? और इसमें किसी दिवंगत अथवा शहीद का अपमान जैसा भी क्या है..? अब रही बात दिल्ली, पंजाब और भोपाल में राजीव गांधी के नाम पर कांग्रेस चुनाव क्यों नहीं लडऩा चाहती..? मोदी की इस चुनौती को स्वीकार क्यों नहीं करना चाहती..? क्योंकि देश में राजीव के नेतृत्व में ही दिल्ली में सिखों का सबसे बड़ा नरसंहार सड़कों पर हुआ था...पंजाब के सिख समाज ने उस नरसंहार की साजिश के लिए राजीव गांधी को आज भी माफ नहीं किया है...फिर भोपाल में गैसकांड के लिए जिम्मेदार एंडरसन की भारत से सकुशल रिहाई का पाप भी तो राजीव गांधी के ही दामन पर लगा हुआ है...इसलिए कांग्रेस चाहकर/भूलकर भी दिल्ली में, पंजाब में और भोपाल में राजीव का नाम नहीं लेना चाहती...जबकि वह राजनीति की मर्यादा व सीमाओं को नया आयाम देकर मोदीजी को यह जवाब देकर निरुत्तर कर सकती थी कि दिल्ली, पंजाब, भोपाल में राजीव की नीति-नीयत से जो कुछ दु:ख पसरा, उसके लिए हम क्षमाप्रार्थी हैं...ऐसा करके कांग्रेस राजीव को ही अपनी ढाल बना लेती...लेकिन वह अब दिवंगत का अपमान बताकर सारे मामले से पल्ला झाडऩे की राजनीतिक फितरत करती नजर आती है...इसलिए दिल्ली से पंजाब और भोपाल तक कांग्रेस को लोकतंत्र का करारा जवाब मिलना तय है...
पश्चिम बंगाल में लोकसभा के चुनावी 'चक्रव्यूहÓ में बुरी तरह से उलझ चुकी ममता बनर्जी की आएदिन जुुबान फिसल रही है या कहें कि वे बयानों के जरिए ही पूरे चुनाव को दिशाभ्रमित करना चाहती हैं...ठीक ऐसी ही स्थिति कांग्रेस की नई-नई महासचिव बनी प्रियंका वाड्रा की भी है...वंशवादी राजनीतिक विरासत के नाम पर राजनीति में जगह बनाने के चक्कर में वे भी प्रधानमंत्री पद के अपमान की पराकाष्ठाएं पार कर रही हैं... ममता, मोदी को लोकतंत्र का जोरदार थप्पड़ लगाना चाहती हैं..,तो प्रियंका उन्हें दुर्योधन की भांति अहंकारी बता रही हैं...क्या चुनावी समर में प्रचार के दौरान इस तरह के संबोधन, प्रबोधन मतदाताओं को भ्रमित करने का राजनीतिक खेल नहीं है..?
ममता बनर्जी की स्थिति राजनीतिक रूप से पश्चिम बंगाल में बहुत ही चिंताजनक है...क्योंकि यह चुनाव उनके राजनीतिक जीवन का यक्ष प्रश्न बन चुका है...इसलिए वे सारे मुद्दों, समस्याओं से ध्यान भटकाने के लिए मोदी के नाम पर भय का माहौल पसारकर तुष्टिकरण का खुला खेल रही हैं...सवाल यह है कि जब आप मोदीजी को 'टोलाबाजÓ कहती हैं...बंगाली मिट्टी के बड़े-बड़े लड्डू खिलाना चाहती हैं..,उन्हें जोरदार थप्पड़ मारने की इच्छा रखती हैं...तब क्या यह उसी सिंडिकेट राजनीति का विकृत नजारा नहीं है..,जो सिर्फ अराजक शासन व्यवस्था एवं आतंकी राज कायम करने को आतुर रहा है..? सही मायने में ममता को सच का सामना करना कभी रास नहीं आया...याद करें संप्रग-2 में उन्होंने अच्छा रेल बजट पेश करने वाले दिनेश त्रिवेदी को दूसरे दिन ही पद से हटा दिया था...यानी रेल बजट को ही पलट दिया था...इस तरह की अति हठधर्मिता ही ममता के राजनीतिक अवसान का इस बार पश्चिम बंगाल में मुख्य कारण बनेगी...रही बात प्रियंका वाड्रा के दुर्योधन संबोधन की तो यह चुनाव कौरव-पांडवों की महाभारत जैसा भले ही न हो..,लेकिन जिस तरह से सारे विपक्षी धड़ों ने 'मोदी-शाहÓ को घेरने का राजनीतिक चक्रव्यूह रचा, उसे वे लगातर भेद रहे हैं...ऐसे में कांग्रेस के राजनीतिक पंडितों को विचार कर लेना चाहिए कि दुर्योधन कौन है..? क्योंकि जनता तो थप्पड़ लगाने का मन बना चुकी है...क्योंकि इंतजार कीजिए लोकतंत्र के इस वैचारिक समर से आने वाले जनादेश के सिर्फ 15 दिन शेष...
- श्चड्डह्म्द्वड्डह्म्ह्यद्धड्डद्मह्लद्ब८०ञ्चद्दद्वड्डद्बद्य.ष्शद्व