कंजूस का दर्द
   Date09-May-2019
प्रेरणादीप
एक व्यक्ति के पास बहुत धन था, पर वह स्वभाव से बहुत कंजूस था। न खुद अच्छे से रहता था और न दूसरे का ही कुछ भला कर पाता था। वह अपने घर में धन इसलिए नहीं रखता था, ताकि कोई चोर-डाकू चुरा न लें। अत: गांव के बाहर एक जंगल में गड्ढा करके उसने अपना सारा धन वहीं गाड़कर रख दिया था। हर दूसरे-तीसरे दिन जाता और उस स्थान को चुपचाप देख आता। उसे यह देखकर बड़ा संतोष होता कि उसका धन वहां सुरक्षित रखा हुआ है।
एक बार एक चोर को शक हुआ तो वह कंजूस के पीछे-पीछे चुपचाप गया और छिपकर उस स्थान को देख आया, जहां कंजूस बार-बार जाया करता था। उसे समझते देर न लगी कि उस स्थान पर अवश्य कोई मूल्यवान वस्तु दबी है। जब कंजूस उस जगह का चक्कर लगाकर घर चला गया तो चोर ने खुदाई करके वहां से सारा धन निकाला और भाग गया। दो-तीन दिन बाद जब कंजूस अपने छिपे धन को देखने गया तो उसे जमीन खुदी हुई दिखाई पड़ी। आसपास मिट्टी का ढेर लगा हुआ था और बीच में एक खाली गड्ढा था। उसका सारा धन जा चुका था। इतनी बड़ी हानि वह सहन न कर सका और माथा पकड़कर जोर-जोर से रोने लगा।
वह बोला-'हाय मैं तो लुट गया। मेरी जीवन भर की कमाई चली गई।Ó उसका रोना सुनकर आते-जाते लोग वहां पहुंचे। उन्होंने पूछकर सारी स्थिति जानी, तब एक व्यक्ति बोला-'सेठजी! धन तो आपके काम पहले भी नहीं आया था और ना अब आपके काम आ सकता है। हां, उस पर आपका अधिकार अवश्य था और उसे यहां आपने छिपा रखा था। अब यदि यहां से कहीं ओर चला गया तो आपको कौन-सी हानि हो गई? आप तो उसे वैसे भी इस्तेमाल नहीं करते थे।Ó