आग की तपन के बाद ही बनता है शुद्ध स्वर्ण
   Date09-May-2019
धर्मधारा
मारे जीवन में, जगत में विस्तारित जीवन में कृत यानी किया तो बहुत कुछ जाता है। कृत के विस्तार की कोई सीमा नहीं है, लेकिन वहां अर्थ शून्य है, अर्थ अनुपस्थित है। प्रकृति के गुण-सत्, रज व तम, पुरुष को जीवन देकर, एक के बाद एक नया जीवन देकर कृत तो बहुत कुछ कर रहे हैं, लेकिन उसमें अर्थ नदारद है। इसलिए जिसे जीवन मिला, वह स्वयं भी कृतार्थ नहीं हो पा रहा है और जिसने जीवन दिया, प्रकृति के वे गुण भी कृतार्थ नहीं हो पा रहे हैं, इसीलिए परिणामक्रम भी नहीं समाप्त हो रहा। एक जीवन में हम जो कर्म करते हैं, जिन संस्कारों का संचय करते हैं, उसी का परिणाम हमें अगले जीवन के रूप में मिल जाता है। एक जीवन का परिणाम होता है- दूसरा जीवन। यही क्रम है। जीवन के संबंध में परिणाम व क्रम का यह सिलसिला चलता रहता है। इसकी परिसमाप्ति नहीं हो पाती। परिसमाप्ति तो तब हो, जब कृतार्थता की अनुभूति हो सके। यह अनुभूति पाने में हम हर बार असफल हो जाते हैं। धर्ममेघ समाधि होने पर हमें यह अनुभूति मिलती है। इसके लिए हमें जीवन को सही व सम्यक ढंग से देखना होगा। जहां हम हैं हम सबका जीवन है, वह विश्व सचमुच का विश्वविद्यालय है। सच तो यह है कि विश्व ही एकमात्र विश्वविद्यालय है। विश्वविद्यालय शब्द आया है 'विश्वÓ से। वास्तविकता यही है कि किसी भी विश्वविद्यालय को स्वयं को विश्वविद्यालय नहीं कहना चाहिए। यह नाम तो विराट हैं, अतिव्यापक है। संपूर्ण विश्व ही एकमात्र विश्वविद्यालय है। हालांकि हम सबने छोटे-छोटे विश्वविद्यालय बना लिए हैं। इनमें पढ़कर हम स्वयं को ज्ञानी समझने लगते हैं। इनकी परीक्षाएं उत्तीर्ण करके स्वयं को उपाधिधारी मानने लगते हैं। जबकि सत्य यह नहीं है। सत्य यही है कि संपूर्ण विश्व ही विश्वविद्यालय है। यहां प्रकृति व सद्गुण हमें शिक्षक के रूप में मिलते हैं और तब आयोजित होती हैं जीवन की विचित्र-विलक्षण परीक्षाएं। इनमें अनेक पीड़ाओं को सहन करना पड़ता है, क्योंकि बिना पीड़ा के परिपक्व होने की कोई संभावना नहीं है। यह आग है, सोने को शुद्ध होने के लिए इसमें से गुजरना ही पड़ता है। यदि सोना कहने लगे कि मेरे लिए यह आग क्यों? तो सोना हमेशा अशुद्ध व मूल्यहीन बना रहेगा।