भारतीय दर्शन को शिक्षा का अंग बनाना जरूरी
   Date24-May-2019
धर्मधारा
मन, वाणी तथा शरीर से मनुष्य को सत्य का पालन करना चाहिए। योग मार्ग में सत्य बहुत महत्वपूर्ण स्तम्भ है। बिना सत्य आचरण के जीवन में आत्मसाक्षात्कार की अनुभूति नहीं हो सकती। जीवन के प्रत्येक स्तर पर व्यवहार में शुद्ध, पवित्र आचरण मनुष्य को सामाजिक तथा आर्थिक स्तर के शिखर पर पहुंचा देता है। जिस समाज और राष्ट्र के व्यवहार में सत्यता होती है वहां भौतिक विकास भी तीव्र गति से होता है और कार्य में भी परिपक्वता दिखाई देती है। जो व्यक्ति सत्य का आचरण करता है, उसका सकारात्मक प्रभाव अन्य लोगों पर भी पड़ता है। सामान्य रूप से व्यवहार में असत्य बोलना पाप कर्म माना गया है। विश्व का कोई भी समाज या वर्ग असत्य व्यवहार को अनैतिक ही मानता है। चाहे घर-परिवार में हो, व्यापार, राजनीति या जहां भी हो, सामने वाला व्यक्ति आपसे सत्य व्यवहार की ही उम्मीद रखता है। जब व्यवहार में असत्यता हो, तो विश्वास टूट जाता है। संंबंधों में दूरी आ जाती है, जो कि घृणा, ईष्र्या, द्वेष, क्रोध तथा असंतोष को जन्म देती है। एक समय था, जब झूठ बोलना पाप समझा जाता था और धन कमाने के लिए झूठ बोलना तो अत्यंत ही निकृष्ट माना गया था। लेकिन इस आधुनिक युग में भारत जैसे देश के लोगों की नैतिकता को अगर नापा जाए तो बड़े ही दुख के साथ कहना पड़ेगा कि योगी ऋषियों की पवित्र सात्विक भूमि पर आज समाज किस प्रकार से हिंसा, मांसाहार, गरीबी, अन्याय तथा अधर्म के गर्त में गिरता जा रहा है। आज मात्र धन कमाना लक्ष्य रह गया है। मैंने एक अनुसंधान में पाया कि एक सामान्य व्यक्ति दिन में लगभग दस झूठ बोलता है। जैसे किसी ने पूछा कि आप कितनी देर में आ जाएंगे? दूसरा व्यक्ति बोला, दस मिनट में, लेकिन वह व्यक्ति वहां उतने समय में नहीं पहुंचता है, तो नैतिकता की दृष्टि से यह भी असत्य की श्रेणी में ही आएगा। अगर वह थोड़ी देर से भी पहुंचे तो भी इसका कोई नफा-नुकसान किसी को नहीं है, मगर इस प्रकार के लगभग दस-पन्द्रह झूठ दिन में एक सामान्य व्यक्ति अगर बोलता है, तो एक महीने में लगभग तीन सौ और एक साल में तीन हजार छह सौ झूठ बोलता है। इस तरह अगर व्यक्ति अस्सी वर्ष जीता है।
तो वह अपने जीवनकाल में लगभग दो लाख अट्ठासी हजार झूठ अपने जीवन में बोलता है, जिसका न कोई अधिक महत्व होता है और न ही कोई नफा-नुकसान। धन कमाने के लिए व्यापार में दूसरों को झूठे आश्वासन देना, कहना कुछ और करना कुछ, जाने कितने प्रकार के झूठ वह अपने पूरे जीवनकाल में बोलता है। अगर इसका हिसाब-किताब लगाया जाए तो व्यक्ति बहुत भारी पाप का वजन अपने सिर पर लेकर मरता है।