सभी भाषाओं की जननी देवभाषा संस्कृत
   Date23-May-2019
धर्मधारा
सं स्कृत विश्व की प्राचीनतम भाषा है। यह एकमात्र वैज्ञानिक भाषा भी है। 'संस्कृतÓ का निहितार्थ है, वह जो कि उत्तम, सभ्य एव शिष्ट है। अतएव यह देव-वाणी कहलाई। संस्कृत देवताओं की भाषा इसलिए मानी जाती है, क्योंकि यह किसी मनुष्य के दिमाग की उपज नहीं है, जैसा कि अन्य सभी प्रकार की भाषाओं के लिए कहा जा सकता है। संस्कृत 'अपौरुषेयÓ है, किसी पुरुष द्वारा जनित नहीं है। इसकी उत्पत्ति दिव्य है। संस्कृत की दिव्यता के बारे में इसलिए दो राय नहीं हो सकती, क्योंकि प्रथम वेद ऋग्वेद की रचना इसी भाषा में हुई है। पारम्परिक पद्धति के विद्वानों तथा वेद-पाठियों का मानना है कि चारों वेदों का उद्भव स्वयं परब्रह्म के श्रीमुख से हुआ है। इसलिए हिन्दू धर्म के स्रोत- यह चारों वेद- समय, देश, काल के परे, सर्व-व्याप्त, सनातन माने गए हैं। इनका न आदि है न अन्त। स्वयं वेदों में वर्णित है कि जिस प्रकार किसी प्रज्वलित अग्नि से धुआँ निकलता है, उसी प्रकार वेदों का ज्ञान ब्रह्मा के मुख से उत्पन्न हुआ। यद्यपि पाश्चात्य बुद्धिजीवी ऋग्वेद, अत: संस्कृत भाषा को प्राय: 3500 वर्ष पुराना ही आँकते हैं, परन्तु हिन्दू धर्म के मनीषियों ने देव भाषा संस्कृत को सनातन मानते हुए हमारे महान् ऋषि-मुनियों को मंत्र-द्रष्टा माना। अकल्पनीय बुद्धि-कौशल तथा ब्रह्म-चक्षु के स्वामी इन प्राचीन ऋषि-वैज्ञानिकों ने ब्रह्माण्ड में व्याप्त इन वैदिक तरंगों को देखा, समझा, पकड़ा तथा उन्हें साधारण मनुष्यों के लिए सुलभ करने हेतु शाब्दिक रूप दिया, ध्वनि का जामा पहनाया। आज के युग में कितने ही उपकरण सहजता से उपलब्ध हैं, जो शून्य में मँडरा रही आवृत्तियों, सुदूर ब्रह्माण्ड के कोनों से उत्पन्न तरंगों को अति सरल रूप में संप्रेषण करते हैं, हम तक ध्वनि तथा चित्र रूप में पहुँचाते हैं। इसलिए 'दूरÓ का 'दर्शनÓ कराने के कारण 'दूरदर्शनÓ का नाम भारतीय चैनल को दिया गया है। यही बात भारतीय ऋषिवरों की संज्ञा 'मंत्र-द्रष्टाÓ के विषय में सिद्ध होती है। इस अतुलनीय ज्ञान को समझने वाले भारतीय ऋषि-मुनियों के प्रति हमें चिर-ऋणी भाव रखना चाहिए। तथा सनातन संस्कृत भाषा के माध्यम से इस ज्ञान की पीढ़ी-दर-पीढ़ी, श्रुति तथा स्मृति के अत्यन्त अनुशासनात्मक प्रक्रियाओं के अनुपालन करके पहुँचाने वाले विप्र समाज का सम्मान करना चाहिए।
कथा है, कि आदि देव महादेव शिव शंकर, जब अपने नटराज रूप में अलौकिक ताण्डव करते हुए, अपने डमरू वादन से ब्रह्माण्ड के सृजन-प्रलय की चक्रीय-क्रिया, नित्य-क्रिया का आनन्द ले रहे होते हैं, तो उनके डमरू से उठने वाले स्वर ही संस्कृत के अक्षर बनते हैं। वे कुल चौदह समूह में हैं। अ, इ, उ, ण, ऋ, लृ, क, ए, ओ, ङ, ऐ, औ, च, ह, य, व, र, अ, ल, ण, ञ, म, ङ, ण न, म, झ, भ, ञ, घ, ढ, ध, ष, ज, ब, ग, ड, द, श, ख, फ, ध, ठ, थ, च, ट, त, व, क, प, य, श, ष, स,र, ह, ल। ये चौदह समूहों में व्यवस्थित अक्षर ही संस्कृत व्याकरण के महान् प्रणेता ऋषि पाणिनि की अभूतपूर्व रचना 'अष्टाध्यायीÓ की आधारशिला हैं।