राष्ट्रधर्म परमेष्टि की प्राप्ति का सबसे बड़ा साधन
   Date23-May-2019
सर्वेश चन्द्र द्विवेदी
भा रतवर्ष में हिन्दू सनातन धर्म युगानुरूप अपना विशिष्ट महत्व रखता है। व्यष्टि, समष्टि, सृष्टि, परमेष्टि की समुच्चय दृष्टि राष्ट्रधर्म की श्रेणी में समाविष्ट है, जिसमें भूभाग, उस पर रहने वाले जन उनकी जीवनशैली, प्रवृत्ति तथा प्रकृति का सन्तुलन लोक व्यवस्था आदि पर सम्पूर्णता से विचार कर व्यवहार में लाना धर्मसापेक्षता है। वेदार्थ वित्तमै: कार्य यत्स्मृतं मुनिभि: परा। स ज्ञेय: परमोधर्मों नान्य शास्त्रेषु संस्थित:।। वेदार्थ ज्ञान में श्रेष्ठ मुनियों ने प्राचीन समय में जो कर्म करने योग्य बतलाया उसी को परम धर्म समझना चाहिए। धर्म के परिज्ञान के लिए वेद का आश्रय ग्रहण कर, धर्म सहित ज्ञान के द्वारा परम ब्रह्म प्रकाशित हो जाता है जो धर्म की रक्षा करता है। धर्म भी उसकी रक्षा करता है। इसमें धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष चार पुरुषार्थों की प्रधानता रही है। पुरुषार्थ सिद्धि के लिए भगवद्गीता में भगवान् कृष्ण ने योगदर्शन का ज्ञान दिया, जिसे कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग को पूर्णता में बताया है। कर्म के लिए आवश्यक ज्ञान, ज्ञेय, परिज्ञाता, कर्म की प्रेरणा देते हैं तथा अधिष्ठानकर्ता, करण, चेष्टा तथा दैव यह कर्म संग्रह के हेतु बताये गये हैं। अत: कर्म की प्रधानता को समझने के लिए ज्ञान तथा भक्ति का लव कर्मयोग स्वधर्म राष्ट्र धर्म का पालन आवश्यक है।
वर्तमान समय में पश्चिमी भोगप्रधान विज्ञान व तकनीकी युग में धर्म सापेक्षता के स्थान पर धर्मनिरपेक्षता पर बल दिया जा रहा है। भारत में वर्ष 1975 में आपातकाल लगाकर राजसत्ता द्वारा संविधान संशोधन कर अंग्रेजी का शब्द 'सेक्युलरÓ उद्देश्यिका में जोड़ा गया, जिसका हिन्दी अनुवाद पन्थनिरपेक्ष है, जिसे अधिकतर राजकर्ता धर्मनिरपेक्षता कहते हैं। संविधान में स्वतन्त्रता की परिधि में विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म, उपासना का अभिकथन व्यक्ति के लिए है तथा न्याय-आर्थिक, सामाजिक व राजनैतिक तथा बन्धुता राष्ट्र की एकता व अखण्डता को लक्ष्य रखा गया है। अंग्रेजी शब्द फेथ का अनुवाद धर्म बताया गया जबकि अंग्रेजी शब्द रिलीजन व्यक्ति का मूल अधिकार धर्म कहा है। कन्सेन्सिस का हिन्दी अन्त:करण कहा है। इससे समाज में विभ्रम उत्पन्न हुआ, जबकि रिलीजन का ही अर्थ पन्थ है तथा सेक्युलर का अर्थ लौकिक फेथ का अर्थ धर्म उचित ही है। भारत देश धर्मप्रधान रहा, जो सनातन व पुरातन है। इसे कर्मभूमि शेष पूरा विश्व भोगभूमि कहा है। धर्म में संयमित भोग के साथ योग की प्रधानता है। योग का अर्थ है क्रमबद्ध संयुक्तता। धर्म का अर्थ कर्तव्यपरायणता जिसमें राष्ट्र का भाव व्यापक है। पश्चिम की अवधारणा नेशन, देश, समाज व पन्थ व अर्थ की प्रधानता को लेकर राज्य व्यवस्था है। जबकि भारत में राष्ट्र का अर्थ (रा+इष्ट) 'रÓ तेजस् व 'इष्टÓ जो रमण करता है, वह धर्म है। जो आचरण की बात है अत: राष्ट्र धर्मसापेक्ष है। राष्ट्र जीव की आत्मा के समान है। यह देश राज्य, प्रजा, समाज, कुटुम्ब (परिवार) व्यक्ति के समुच्चय में भक्तियुक्त ज्ञान सम्पन्न कर्म की प्रधानता रहने से राष्ट्र भाव प्रकट होता है। इसलिए व्यक्ति द्वारा दूसरे के प्रति कर्तव्य स्वधर्म है जैसे पिता का धर्म माता का पुत्र पुत्री का बन्धु का पति का पत्नी का, मित्र का, गुरु शिष्य का, कुटुम्ब समाज, राज्य प्रजा का धर्म समग्रता में ही राष्ट्र का धर्म है। इसे विश्व के लिए बन्धुत्व भावे व्यष्टि से लेकर सृष्टि, समष्टि व परमेष्टि तक भक्तियुक्त कर्तव्य ही धर्म की अवधारणा है। परमेष्टि जिसकी यह सम्पूर्ण रचना है। समष्टि सृष्टि कारण, व्यष्टि कर्म फल भोक्ता है जो धर्म के माध्यम से अर्थात् भक्तिपूर्ण कर्म निष्कामता के द्वारा मोक्ष का पात्र बनता है। राष्ट्रधर्मिता के लिए व्यष्टि से क्रमश: उत्तरोत्तर बढ़कर कर्तव्य होता है। इसके निम्न उदाहरण हैं- राजा उत्तानपाद की दो रानियाँ थीं, एक सुरुचि दूसरी सुमति यथा नाम तथा गुण सुमति के पुत्र ध्रुव थे। वह खेलते हुए अपने पिता की गोद में जा बैठे। माता सुरुचि ने गोद से उतार दिया, कहा, पिता की गोद चाहिए तो हमारे गर्भ से जन्म लेना था, अत: राजा की गोद के लिए सुरुचि का आश्रय चाहिए सुमति का नहीं। बालक दुखी हुआ उसकी माता सुमति ने उसे राज्य छोड़ वन में तपस्या करने के लिए प्रेरित किया। प्रेरित ध्रुव अटल साधना दृढ़ निश्चय द्वारा कर्तव्य मार्ग पर अग्रसर हुआ। प्रथम गुरु माँ के द्वारा दिए गए ज्ञान व संस्कार से तथा द्वितीय गुरु नारद ने मार्ग प्रशस्त कर राजा पिता की गोद से बढ़कर परमपिता परमात्मा की अटल गोद प्राप्त करा दी। ध्रुव ने राष्ट्रधर्म का निर्वहन किया।
त्रेतायुग के पूर्वकाल में हिरण्यकश्यप का राज्य था, उसकी प्रकृति असुर की थी। उसके पुत्र प्रहलाद जी थे। हिरण्यकश्यप में राजसत्ता का मद होने से वह ईश्वरी सत्ता को नहीं मानता था अर्थात् ब्रह्म सत्ता को नकारता था। उसके पुत्र के संस्कार व प्रकृति ब्रह्म सत्ता से प्रेरित थी। उसने अपने पुत्र को राजसत्ता के अधीन राज शिक्षक से शिक्षा दिलवाई, जिसमें राजसत्ता की प्रधानता थी। अत: प्रहलाद ने गुरु का दिया गया राज्यप्रधान ज्ञान अस्वीकार कर दिया तथा अपनी भक्ति व लगन से पिता के अत्याचार को भक्ति के प्रभाव से विजित कर नरसिंह भगवान् को प्रकट कराया। प्रहलाद ने पिता को मुक्ति व राष्ट्रधर्म को प्रधानता दी।
दैत्यराज महाराज बलि ने राजसूय यज्ञ किया। दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य ने यज्ञ के आचार्य का कार्य किया। यज्ञ के समय भगवान् विष्णु ने स्वयं देवताओं के हित में ब्राह्मण बालक के रूप में आकर बलि से तीन पग भूमि दान में माँगी। दैत्य गुरु शुक्राचार्य जी ने भूमि न देने को कहा। उसे न मानकर गुरु के आदेश को त्याग कर दान दिया। राष्ट्र कर्म किया, जिससे ईश्वर की भक्ति का प्राकट्य हुआ और कर्म योग भक्तियोग में परिणित राष्ट्र धर्म का पालन किया। ईश्वर को राजा बलि के आग्रह पर दान के फलस्वरूप उनका द्वारपाल बनना स्वीकार करना पड़ा।
भरत जी की माता जी कैकेई द्वारा राजा दशरथ को युद्ध में सहयोग करने से प्राप्त वरदान को मन्थरा दासी के परामर्श पर राम के राज्याभिषेक के समय अपने वर की माँग की। वर की पूर्ति में महाराजा दशरथ जी ने भरत से बड़े पुत्र राम जी को वनवास तथा भरत को राज्य दिया। माता की अनैतिक माँग का विरोध व प्रतिकार कर माता को त्याग ईश्वर रूप राम के प्रति प्रेम व समर्पण कर राष्ट्र धर्म का पालन किया, कर्म योग से भक्ति योग द्वारा ईश्वररूपी राम की कृपा प्राप्ति की। भ्रातृ धर्म व राज धर्म का उच्च आदर्श स्थापित किया।
* महाज्ञानी पंडित वेदों के ज्ञाता शक्ति सम्पन्न विश्रवा ऋषि के पुत्र रावण ने भाई कुबेर का राज्य छीन लिया। श्रीराम की 7 पत्नी का हरण किया तथा अनेक दुष्कृत्यों
के कारण छोटे भाई विभीषण ने अपने बड़े 7भाई का त्याग कर दिया, सीता को मुक्त कराने हेतु राम की शरण में जाकर युद्ध में राम का साथ दिया। राष्ट्र धर्म का पालन श्री राम की कृपा प्राप्ति से भक्ति योग का प्रकटीकरण कर लंका का राज्य प्राप्त कर 7 पुन: धर्म की स्थापना की। । द्वापर में महाभारत काल में अर्जुन द्वारा अपने राजगुरु द्रोणाचार्य को गुरु दक्षिणा
में द्रुपद के राज्य को में जीत कर द्रोणाचार्य को देकर शिष्य धर्म का पालन किया। कौरवों ने द्यूतक्रीड़ा व छल करके पाण्डवों का राज्य छीन लिया। द्रौपदी का अपमान किया। द्रोणाचार्य ने राजधर्म के विरुद्ध राजकर्म में हस्तक्षेप न कर अनुचित राज कर्म को संरक्षण दिया अर्थात् राष्ट्रधर्म का पालन नहीं किया अर्जुन ने भगवान् श्रीकृष्ण के परामर्श पर क्षत्रिय धर्म का पालन कर परिवार व गुरु के विरुद्ध युद्ध किया। कृष्ण को नारायण रूप में पाकर
कृष्णभक्ति, भक्ति योग राष्ट्र धर्म का पालन 7 कर गुरु द्रोणाचार्य का त्याग किया।
. महाभारत के ही पात्र राजा धृतराष्ट्र की राजसत्ता के मन्त्री महात्मा विदुर नीति के मर्मज्ञ ने दुर्योधन के दुष्कृत्यों का साथ नहीं दिया। विरोध में युद्ध करने की सामर्थ्य नहीं थी। विदुर की मन्त्रणा को धृतराष्ट्र व दुर्योधन ने नहीं माना तो विदुर मन्त्री पद के दायित्व को त्याग कर प्रवास पर चले गये। पाण्डवों की समय-समय पर सहायता की। भाई व राज्य को छोड़कर राष्ट्र धर्म का पालन कर भगवान् कृष्ण की कृपा प्राप्त की तथा भक्ति योग प्राप्त कर मुक्ति मार्ग अपनाया। आदर्श प्रस्तुत किया।
1. कलियुग में राजकुमार सिद्धार्थ (गौतम बुद्ध) ने अपने राजकुमार भाई द्वारा पक्षी का शिकार करने पर शिकार पक्षी को राजकुमार को न देकर पक्षी की रक्षा की। राष्ट्र धर्म का पालन कर (बुद्धत्व) बोध को प्राप्त किया।
वर्तमान युग में भी राष्ट्र धर्म की प्रेरणा देने वाले अनेक उदाहरण है। स्वतन्त्रता आन्दोलन में देश को स्वतन्त्र कराने के लिए अपना सर्वस्व बलिदान करके देश व राष्ट्र को स्वतन्त्र कराने में अपना जीवन समर्पित कर दिया। ऐसे महापुरुष लाला लाजपत 7 राय, बाल गंगाधर तिलक, बिपिनचन्द्र पाल (लाल, बाल, पाल), मदनमोहन मालवीय, गान्धी जी जैसे अनेक हैं। क्रान्तिकारी वीर भगतसिंह, चन्द्रशेखर आजाद, अशफाकउल्ला खाँ, सुभाषचन्द्र बोस इसी श्रेणी में हैं। राष्ट्र व देश स्वतन्त्र रहे इसके लिए डा. हेडगेवार जी डाक्टरी की शिक्षा प्राप्त कर स्वतन्त्रता आन्दोलन से जुड़े
व्यवसाय न अपनाकर राष्ट्र सेवा का व्रत लेकर ऐसा संगठन खड़ा करने का निश्चय किया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना विजय दशमी के दिन 1625 में की। शाखा पद्धति से संस्कार देकर स्वयंसेवक तैयार करना उनके माध्यम से सभी क्षेत्रों में हिन्दू संगठन खड़ा करने की व्यवस्था तथा संगठन को गति व प्रेरणा हेतु पूर्णकालिक प्रचारक निकालने की स्वेच्छा से स्वीकार्य पद्धति विकसित की। अपना सम्पूर्ण जीवन राष्ट्र 7 को समर्पित कर राष्ट्र धर्म की स्थापना का
कार्य किया जो सतत हो रहा है। विविध क्षेत्रों में स्वयंसेवकों द्वारा संगठन खड़ाकर कार्य किये जा रहे हैं। राष्ट्र धर्म का पालन कर रहे हैं।
हिन्दू जीवन पद्धति में वर्ण आश्रम पद्धति रही है आज बाध्यकारी नहीं है। हिन्दू जीवन पद्धति स्वेच्छा से स्वीकारोक्ति पर आधारित है किसी व्यक्ति व सरकार के दबाव में नहीं रही। धार्मिकता, समाज रचना का एक उपक्रम है सेवादान स्वच्छता शुद्धता, पवित्रता, सत्यता, उपासना, आध्यात्मिकता वैचारिकता को व्यवहार में प्रामाणिकता से अनुपालन व्यक्ति, कुटुम्ब व समाज का कर्तव्य रहा है। आश्रम व्यवस्था में ज्ञान
प्राप्ति हेतु ब्रह्मचर्य, ज्ञान देना ब्राह्म कार्य, 7 तो गृहकार्य- धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष पुरुषार्थ हेतु गृहस्थ आश्रम प्रमुख है। वानप्रस्थवन्य जीवन पद्धति, नगर ग्राम्य जीवन से विरत भोग को त्याग कर प्रकृति पर पूर्ण निर्भर रहकर लोक कल्याण में रत तदुपरान्त । संन्यास सम्पूर्ण जीवन लोक प्रकृति व राष्ट्र
को समर्पित इसको सभी वर्गों ने ग्राह्य किया था तथा एक दूसरे के पूरक व सहयोगी थे। आज इसमें क्षरण हुआ है।
ब्रह्मपुराण में कथन है1 ते स्तच्छरीर मुत्सृष्टं धर्म 7 एकोऽनुगच्छति। तस्माद्धर्म: सहायश्च
सेवितव्य: सदा नृभि: ।। । मृत्यु के बाद सब लोग त्याग देते है; किन्तु धर्म उनका त्याग नहीं करता। वह अकेले ही जीव के साथ जाता है। अत: धर्म ही सच्चा सहायक है। इसलिए मनुष्य को
राष्ट्र धर्म एक दृष्टि सदा धर्म का सेवन करना चाहिए।
धर्मश्चार्थश्च कामश्चत्रितयं जीवत: फलम । एतत्त्रयमवाप्तव्यम धर्म परिवर्जित् ।।
धर्म अर्थ काम तीनों ही इस जीवन के फल हैं। अधर्म त्यागकर इन तीनों की प्राप्ति करनी चाहिए। के वर्तमान समय में विश्व की प्रचलित जीवन पद्धतियों का हमारे देश व समाज पर भी प्रभाव पड़ा है, इसका अर्थ यह नहीं कि हमारी जीवन पद्धति अवैज्ञानिक व अनुपयुक्त थी कठिन व त्यागपूर्ण अवश्य थी।
इन कथाओं से स्पष्ट होता है कि धर्म कर्म से व्यक्ति कुटुम्ब व समाज, राज्य व राष्ट्र धर्म की उत्तरोत्तर प्रधानता होती है। उसका पालन राष्ट्र धर्म है। यह विश्व के लिए हितकर व मार्गदर्शक भी है।
अत: राष्ट्र धर्म को जानना उसका पालन करना केवल अपने राष्ट्र के लिए ही हितकर नहीं वरन् सम्पूर्ण सृष्टि के लिए हितकर है।
जो परमेष्टि की प्राप्ति का सबसे बड़ा साधन 7 व माध्यम भी है।