पशु प्रवृत्ति
   Date23-May-2019
प्रेरणादीप
ची न के महान् दार्शनिक कन्फ्यूशियस एक बार घूमते-घूमते दूर के एक देश में पहुँचे। वहाँ के राजा ने उनके सामने तीन पिंजरे रख दिए। एक पिंजरे में चूहा था, उसके सामने ढेर सारे व्यंजन रखे हुए थे, किन्तु वह कुछ भी नहीं खा रहा था। दूसरे पिंजरे में बिल्ली थी, उसके सामने दूध और दूध से बने ढेर सारे व्यंजन थे, लेकिन वह भी न कुछ पी रही थी और न खा रही थी। तीसरे पिंजरे में एक बाज था। उसके सामने ढेर सारे ताजे मांस के टुकड़े रखे थे, लेकिन वह भी ऐसे ही पड़ा हुआ था। कन्फ्यूशियस ने यह सब देखा और अपने शिष्यों से कहा- 'देखी तुमने संकट की घड़ी में पशुओं की प्रवृत्ति? चूहा बिना भोजन किए रह जाएगा, किन्तु आने वाले संकट की अपेक्षा आज के संकट की इसे ज्यादा चिन्ता है। वह अनभिज्ञ है कि एक न एक दिन तो उसे मरना ही है, तो सामने रखे भोजन को खाकर क्यों न मरे? यही स्थिति बिल्ली की भी है। बाज को सामने देख लग रहा है कि साक्षात् मौत उसके सामने खड़ी है। पर बाज की दशा इन दोनों से निराली है। वह कभी चूहे को खाने की सोचता है, तो कभी बिल्ली को। उसकी नजर इन दोनों पर अटकी हुई है। उसके सामने जो भोजन रखा हुआ है, उसे वह इस भावी भोजन के सामने उपेक्षित समझ रहा है। यह जीव का स्वभाव है। यदि ये तीनों इसी प्रकार पिंजरों में कैद एक-दूसरे के सामने रहे, तो तीनों भूखे मर जाएंगे। ये तीनों इस देश के उन राजनेताओं से अधिक बुद्धिमान् और विचारशील हैं, जो राष्ट्रीय संकट के समय भी एक-दूसरे पर कीचड़ उछालते रहे हैं।