आज मतदाताओं की अग्नि परीक्षा...
   Date23-May-2019
शक्तिसिंह परमार
भारतीय लोकतंत्र के सबसे बड़े एवं महत्वपूर्ण 'राष्ट्रीय उत्सवÓ लोकसभा चुनाव-2019 के लिए लोकतंत्र की वेदी अर्थात् ईवीएम-वीवीपैट में यजमान मतदाताओं द्वारा डाली गई मतरूपी आहुतियों के परिणाम/प्रतिसाद को जानने की वह घड़ी अर्थात् 23 मई आ गई है...आज भारतीय लोकतंत्र के 'जनमनÓ से निकले उस जनादेश की घड़ी है..,जो दलों/नेताओं की हार-जीत का ही कारण नहीं बनेगी..,बल्कि देश की सर्वोच्च नीति-नियंता पंचायत 17वीं लोकसभा के गठन का भी शंखनाद होगा...याद रहे, कोई चुनाव/परिणाम/आदेश और निर्णय अंतिम नहीं होता...क्योंकि उसको संशोधित, परिष्कृत करने की समय-समय पर अवसर आते रहते हैं...लेकिन 23 मई का 'जनादेशÓ उस अविश्वसनीय अंधेरे को तिरोहित करने..,उस अकल्पनीय धुंध को साफ करने और उन अवसरवादी बादलों के डेरों का सफाया करने का निमित्त भी बनेगा...
दुराशक्तियों की वे गड़बडिय़ां जो आए दिन हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं पर सवाल उठाकर उसके क्रियान्वयन का माखौल उड़ाती हैं...भारतीय लोकतंत्र के लिए आज का यह जनादेश इसलिए 'मील का पत्थरÓ साबित होगा...क्योंकि इसी से तो तय होगा दुनिया से आंखों में आंखें डालकर बात करने का साहस जुटा लेने वाला भारतीय लोकतंत्र अब कौन-सी राह पकडऩे वाला है..? इसलिए जो सोच रहे हैं कि-'जनादेश की यह घड़ीÓ सिर्फ नेताओं-दलों में बेचैनी बढ़ा रही है...तो उन्हें याद रखना है उनके लिए यह नतीजे एक दिन की 'मातम पुरसीÓ से ज्यादा कुछ नहीं..,लेकिन पूरे 5 वर्ष किसी के इठलाने/इतराने और पछताने का मुख्य कारण यह जनादेश बनेगा तो, वे सिर्फ राष्ट्रवासी यानी मतदाता ही होंगे...लोकतंत्र में तार्किक विमर्श का महत्वपूर्ण स्थान है..,जो तटस्थ भाव से घटनाओं/स्थितियों को देखते रहते हैं...पक्ष-विपक्ष में खड़े होने का साहस ही नहीं दिखाते...वे ही सबसे बड़े पाप के भागी हैं...खुशी की बात है कि, लोकसभा चुनाव के इस वैचारिक संग्राम में मतदाताओं ने पहली बार तटस्थ भूमिका से ऊपर उठकर रिकार्ड मतदान का इतिहास रचा है...जो नि:संदेह लोकतंत्र को मजबूती देगा...संभवत: हमारे जागरूक मतदाताओं ने महाकवि दिनकर की यह पंक्तियां चुनावी समर में हर पल-हर क्षण याद रखी होंगी..,तभी तो यह संभव हुआ...
समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याग्र।
जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनके भी अपराध।।
लोकसभा का यह वैचारिक समर अपने जनादेश द्वारा यह भी निर्धारित करेगा कि भारतीय मतदाता 'राष्ट्रीय नेतृत्वÓ को लेकर अपनी सोच का दायरा कितना विस्तारित कर चुके हैं..? क्या वे चुनाव कार्यक्रम घोषणा के पूर्व प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में घोषित हुए नरेन्द्र मोदी को पुन: नेतृत्व का मौका देने का निर्णय सुनाएंगे..? या फिर करीब दो दर्जन दलों के गठबंधन-महागठबंधन के उस विचार को जमीन देना चाहेंगे, जो चुनाव बाद 'प्रधानमंत्रीÓ का चेहरा तलाशेंगे..? यानी एक तरफ सफल नेतृत्व की उपलब्धि एवं दूसरी तरफ नेतृत्व का भारी अकाल जैसी स्थितियां 23 मई को आने वाले जनादेश के मान से बहुत निर्णायक नहीं हो गई हैं..? क्योंकि एक तरफ देखें-समझें मोदी हैं, तो दूसरी तरफ अदृश्य चेहरा-नाम यानी नेतृत्व करने की महत्वाकांक्षा वालों की लंबी फेहरिस्त...
लोकसभा चुनाव के नतीजे भारत की आर्थिक सेहत को सुधारने के लिए की गई 'शल्यक्रियाÓ यानी नोटबंदी-जीएसटी पर भी क्या मुहर लगाएंगे..? क्योंकि, कालेधन के मकडज़ाल को तोडऩे..,आयकर चोरी रोकने एवं पारदर्शी शासन व्यवस्था को अमल में लाने के लिए 2016 और 2017 में आमजन ने भी 'राष्ट्र निर्माणÓ के इस जोखिमभरे अभियान में नोटबंदी की कतार में लगकर तो जीएसटी के जरिए व्यापार-व्यवसाय में व्यवधान को सहन करके भी भारत की साहसिक पहल का बिना विरोध-प्रदर्शन किए स्वागत किया...अत: 23 मई के नतीजे मतदाताओं के उस वैचारिक समर्पण का परिचायक होंगे कि, वे अपने हित-स्वार्थ को पीछे रखकर राष्ट्रहित को कौन-से पायदान पर रखना चाहते हैं..?
भारतीय लोकतंत्र के लिए वैचारिक संघर्ष का आधार बन चुका यह चुनाव 'राष्ट्रहितÓ को प्राथमिकता में रखने के नीति-निर्णय की कसौटी को भी परखेगा...क्योंकि चुनावी सभाओं में बार-बार यह बात उठी है कि किसी सरकार के लिए प्राथमिकता क्या है..? जनता एवं मतदाताओं के लोकलुभावन व ललचाने वाले नीति-निर्णय या फिर राष्ट्र को प्रत्येक क्षेत्र में मजबूती के साथ खड़ा करने वाली कड़वी दवाई...एनआरसी के जरिए घुसपैठियों से मुक्ति हो..? या सीमा पर बाढ़ लगाकर घुसपैठियों की मजबूती नाकाबंदी...आतंकवाद के सफाये के लिए 'सर्जिकल स्ट्राइक-एयर स्ट्राइकÓ जैसे साहसिक कदम...या फिर देश को सुरक्षित रखने के लिए सेना को हर स्तर पर संसाधन सम्पन्न और मजबूत बनाने की पहल...इन सभी बातों पर जनता का रुख क्या नतीजे सुनाएगा..? यह भी देखने लायक होगा...यानी यहां पर भी नेता-सरकार नहीं..,जनता ही कसौटी पर है कि, वे मजबूत सरकार चुनेंगे या फिर मजबूर..?
इस लोकसभा चुनाव में पहली बार 1989 के बोफोर्स मुद्दे से भी ज्यादा हवा रॉफेल विमान खरीदी के मामले को लेकर बनाई गई है...बोफोर्स के मुद्दे ने तो राजीव सरकार को बदल दिया था...लेकिन रॉफेल के मुद्दे पर राहुल गांधी द्वारा गढ़े गए झूठ-झूठ और महाझूठ के उस भ्रमजाल में जनता-जनार्दन कितनी उलझी..? क्योंकि, राहुल भी तो माफी-माफी पुकारते रहे हैं...फिर जनता ने इस ज्वलंत..,लेकिन संवेदनशील मुद्दे को राजनीतिक गलियारे की चर्चा में चटकारेदार बनने दिया..? या सजग मतदाताओं ने राहुल के इस रॉफेल के झूठ को सिरे से नकार दिया..? इसका भी निर्धारण होगा...कुल मिलाकर पूरा चुनाव सिर्फ मोदी विरोध और मोदी को रोकने एवं मतगणना के बाद बेमेल गठबंधन की कोशिश भी यही बयां कर रहा है कि, मतदाताओं को ठगने की तिकड़में भिड़़ाई जा रही हैं...लेकिन राजनीतिक धर्म की रक्षा करना ही एक सफल नेतृत्व की कसौटी होती है...क्या मोदी उसमें सफल हुए..? इसकी अग्नि परीक्षा का परिणाम आज घोषित होगा...याद करें महाभारत काल में श्रीकृष्ण के उस शाश्वत संदेश को...
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्?॥
भावार्थ : हे भारत..! जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब ही मैं अपने रूप को रचता हूँ अर्थात् साकार रूप से लोगों के सम्मुख प्रकट होता हूँ... राजनीतिक धर्म की रक्षा कौन कर सकता है..? इसकी कसौटी पर मोदी बनाम सैकड़ों चेहरे हैं..,लेकिन उम्मीद सिर्फ एक (मोदी) से ही है...विश्वास है जनता उन्हें 2014 से भी बड़ा मतरूपी आशीर्वाद प्रदान करेगी...इंतजार खत्म हुआ..,क्योंकि लोकतंत्र के इस वैचारिक समर से आने वाले जनादेश की आज घड़ी है... श्चड्डह्म्द्वड्डह्म्ह्यद्धड्डद्मह्लद्ब८०ञ्चद्दद्वड्डद्बद्य.ष्शद्व