विचारधारा केंद्रित समर के मायने...
   Date22-May-2019
शक्तिसिंह परमार
भारतीय लोकतंत्र का राष्ट्रीय उत्सव 'लोकसभा चुनाव-2019Ó करीब सवा दो माह का लंबा प्रचार अभियान दलों/नेताओं द्वारा मतदाताओं को रिझाने-लुभाने, भ्रमित और प्रेरित करने के साथ ही विचलित करने का भी कारण बना है...अंतत: यह पूरा वैचारिक समर अब जनादेश सुनाने की दहलीज पर आकर खड़ा हो गया है...यह तो स्पष्ट रूप से सबको पता चल ही गया है कि यह आम चुनाव दो विचारधाराओं की लड़ाई का केंद्रबिंदु बन चुका था...जिसमें दो ही पक्ष थे। एक के नेतृत्वकर्ता के रूप में प्रधानमंत्री मोदी का चेहरा था, तो दूसरी तरफ वे तमाम विपक्षी धड़े जो अपने को मोदी विरोध का अगवा बना चुके थे...28 मार्च 2019 से 1857 की क्रांति की जन्मभूमि मेरठ से चुनाव प्रचार अभियान का मोदीजी ने श्रीगणेश किया...समापन म.प्र. के खरगोन में स्वतंत्रता संग्राम के वीर टंट्या भील एवं भीमा नायक को याद करके किया...51 दिनों में उन्होंने 1 लाख 5 हजार किमी की चुनावी यात्रा द्वारा 142 से अधिक जनसभाएं और 4 बड़े रोड शो करके देश की करीब आधी आबादी यानी 50 करोड़ लोगों से सीधा संपर्क व संवाद किया है...जिसमें उनका प्रमुख मुद्दा मजबूत सरकार ही था...कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी 1 लाख 25 हजार किमी की चुनावी यात्रा 2 माह 7 दिन में 153 रैलियों के द्वारा जनता के बीच पहुंचे...राहुल ने पूरे प्रचार के दौरान राफेल, रोजगार, न्याय योजना एवं कृषि-कृषकों को ही मुद्दा बनाए रखा...कुछ ऐसी ही स्थिति बाकी विपक्ष की भी रही...
लोकसभा के इस वैचारिक समर में प्रमुख 3 मुद्दे पूरे 2 माह तक गरमाते रहे और उस पर दावे-प्रतिदावे, आरोप-प्रत्यारोप भी राजनीतिक उफान लाते रहे...भाजपा ने राष्ट्रवाद के मुद्दे यानी देश पहले पायदान पर..,देश का ध्वज यानी तिरंगा और भारत की आस्था-अस्मिता से जुड़े प्रतीकों-मुद्दों को भी चुनाव प्रचार में जोरदार तरीके से उठाया...भाजपा के सभी स्टार प्रचारक भारतीय हितों की रक्षा करने वालों और भारत के खिलाफ बोलने वालों के बीच इसे वैचारिक समर करार देते रहे...यानी यह विचारधारा की लड़ाई थी...कृषक-कृषि की समृद्धि और नौजवानों से लेकर असंगठित क्षेत्र के कामगारों के लिए रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने की चर्चा भी पक्ष-विपक्ष ने खूब की...लेकिन जातिगत मुद्दों को हवा देने, लोगों को जाति-धर्म-सम्प्रदाय के नाम पर भिड़ाने और वोट झटक लेने का सियासी खेल भी चुनावी चौसर पर खूब खेला गया...इस पर जनता-जनार्दन ने क्या मानस बनाया..? शीघ्र सामने आने वाला है...
लोकसभा के समर में सेना के साहस, शौर्य और भारत की सीमाओं की रक्षा का विषय भी पहली बार चुनाव में सबसे अहम मुद्दा बनकर उभरा...सर्जिकल स्ट्राइक, एयर स्ट्राइक एवं सेना को संसाधनों से सम्पन्न बनाने की अपनी वचनबद्धता पर भाजपा ने बार-बार चुनाव प्रचार में साक्ष्यों-संदर्भों के साथ यह भी बताया कि देश किनके हाथ में मजबूत रहेगा..? कांग्रेस को राजीव गांधी के नाम पर दिल्ली, पंजाब, भोपाल में चुनाव लडऩे की चुनौती देना भी कोई छोटी बात नहीं है..,क्योंकि कोई पार्टी अपने ही पुरोधा से क्यों बचना चाहती है...इसे मोदी ने चुनाव में मुद्दा बनाकर दिखाया...सिख दंगों को लेकर सैम पित्रोदा का 'हुआ तो हुआÓ जुमला कांग्रेस को जनता के बीच शर्मसार और सिखों को आक्रोषित कर गया...अब देखने लायक होगा कि इन तीनों ही विषयों पर जनता की क्या समझ रही..?
लोकसभा का यह समर गठबंधन राजनीति के अवसरवादी प्रयोग का भी साक्षी बना...जो एक-दूसरे का कभी मुंह देखना पसंद नहीं करते थे, वे मंचों पर गलबहियां करते नजर आए...उप्र में बसपा-सपा का गठबंधन इसकी मिसाल बना...जबकि 5 साल तक केंद्र की सत्ता में भागीदार रहकर रालोसपा ने राजग से किनारा कर लिया...शिवसेना ने भी 5 साल भाजपा व मोदी विरोध का झंडा लहराया..,लेकिन गठबंधन में रहकर हर किसी को चौंकाया...यह तय होगा ये अवसरवादी राजनीति जनता को पसंद आएगी या नहीं..?
वैचारिक संग्राम बन चुका यह चुनाव पहली बार चुनाव आयोग की सख्ती, शक्ति एवं सक्रियता के लिए भी पहचान बनाने वाला रहा...मायावती, योगी आदिनाथ एवं आजम को चुनाव प्रचार के लिए 72 व 48 घंटे के लिए प्रतिबंधित करना..,जबकि चुनावी इतिहास में प. बंगाल में पहली बार अंतिम चरण का प्रचार अभियान एक दिन पहले खत्म करना...वहीं बंगाल में चुनाव आयोग द्वारा अफसरों के तबादले करना भविष्य के चुनावों में बड़ी नजीर बनेगा...इससे दल-नेता सबक लेंगे..? देखने लायक होगा..?
लोकसभा का यह सियासी संग्राम हिंसा, उपद्रव एवं बयानी जहर का भी साक्षी बना है...बंगाल में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के रोड शो में तृणमूल के कार्यकर्ताओं की हिंसा 'राजनीतिक अराजकताÓ का बड़ा प्रमाण है...जबकि बिहार में भाजपा प्रत्याशी पर प्राणघातक हमला भी राजनीति के अपराधीकरण का ज्वलंत उदाहरण है...जबकि जम्मू-कश्मीर में गड़बड़ी रोकने, आतंकी मंसूबों को नाकाम करने के लिए पहली बार एक ही लोकसभा सीट 'अनंतनागÓ पर तीन चरणों में मतदान कराना भी भविष्य में विवादित अति असंवेदनशील क्षेत्र के लिए नजीर बन सकता है...
इस लोकसभा चुनाव के तीन चर्चित केंद्रबिंदु भी रहे...जिन्होंने केरल से लेकर बिहार और मध्यप्रदेश तक में राजनीतिक प्रचार-प्रसार में उथल-पुथल मचाने में अहम भूमिका का निर्वाह किया है...अमेठी में हार के भय से कम्युनिस्टों के गढ़ केरल की वायनाड सीट पर चुनाव लडऩे पहुंचे राहुल गांधी हर किसी के निशाने पर आ गए...बिहार के बेगुसराय में 'भारत तेरे टुकड़े होंगेÓ के झंडाबरदार बने कन्हैया कुमार की वामपंथी उम्मीदवारी ने बिहार के ही नहीं...देश के सियासी समीकरण बदल दिए...जबकि भोपाल में भगवा और हिन्दू आतंकवाद का जुमला गढऩे वाले दिग्विजयसिंह का साध्वी प्रज्ञा से सीधा सामना राजनीति के भविष्य के रंग-रूप और संभावनाओं को तराशने की प्रयोगशाला के रूप में देखा जा रहा है...
विचारधारा का यह सियासी संग्राम अनेक मायनों में राजनीति की भूमिका को बदलने का भी कारण बन चुका है...बस नजर तो इससे जुड़े परिणामों पर टिकी है...जिससे तय होगा कि विश्व के सबसे परिपक्व माने जाने वाले लोकतंत्र में मतदाता कितना परिपक्व, समझदार एवं परिष्कृत हुआ है..? क्योंकि उसे चुनाव प्रचार के चरण-दर-चरण दलों-नेताओं ने भांति-भांति के जुमलों, बयानों, वादों और इरादों से भ्रम में डालने में कोई कसर नहीं छोड़ी है..,लेकिन दूसरी तरफ ऐसे प्रत्याशी, दल भी रहे, जिन्होंने मतदाताओं को राजकाज एवं नीति-नीयत के संदर्भ में जाग्रत करने और उन्हें अपने राष्ट्रीय गौरव व आत्म स्वाभिमान का परिचय कराने की पहल भी की है...उसे जनता-जनार्दन ने एक मतदाता एवं राष्ट्र के सजग नागरिक के रूप में कितना आत्मसात किया..? नीर-क्षीर-विवेक की उस जुगलबंदी को मतदाताओं ने दलों-नेताओं की सियासत के संदर्भ में कितना परिष्कृत किया...इसी पर तय होगा कि भारत का यह मजबूत एवं परिपक्व गणतंत्र कौन-सी दशा-दिशा का निर्धारण लोकतंत्र की इस वेदी पर मतों की आहुति द्वारा 'जनादेश-2019Ó के रूप में कर चुका है..? क्योंकि इंतजार कीजिए लोकतंत्र के इस वैचारिक समर से आने वाले जनादेश के सिर्फ २ दिन शेष...
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