मुक्ति का दर्शन
   Date22-May-2019
प्रेरणादीप
ए क मनुष्य को संसार से वैराग्य हुआ। उसने कहा- 'यह जगत मिथ्या है, माया है। अब मैं इसका परित्याग करके सच्ची शांति की तलाश करूँगा।Ó आधी रात बीती और वैराग्य लेने वाले ने कहा-'अब वह घड़ी आ गई है, मुझे परमात्मा की खोज के लिए निकल पडऩा चाहिए।Ó निकलने से पहले उसने अपनी धर्मपत्नी और दूधमुंहे बच्चे की ओर सिर उठा करके देखा। दोनों की बड़ी सौम्य आकृतियाँ थीं। वह मन-ही-मन बोला-'कौन हो तुम, जो मुझे माया से बाँधते हो?Ó उसे आकाशवाणी सुनाई पड़ी-'मैं तुम्हारा भगवान हूँ।Ó वह मन ही मन बोला ये तो मेरी धर्मपत्नी और बालक हैं, ये भगवान कैसे हो सकते हैं?Ó पुन: आकाशवाणी हुई और बोली-'बावरे! ये ही भगवान हैं। इन्हें छोड़कर तू नकली भगवान की खोज में मत भाग।Ó उस व्यक्ति के मन में शंका का पुन: उदय हुआ और वह बोला- 'ये ही तो मेरी माया में बँधने का कारण हैं।Ó आकाशवाणी बोली-'पुत्र! यहाँ से भाग जाने पर क्या माया तुझे नहीं बाँधेगी? माया तो सर्वत्र व्याप्त है। यदि मुक्ति की कामना है तो मन से मुक्त हो। संबंधों को तोडऩे से और अपनी जिम्मेदारियों से भागने से कोई ईश्वर की प्राप्ति नहीं कर पाता। जो प्राणिमात्र के अंदर ईश्वरत्व का दर्शन कर पाता है, वही प्रभु को प्यारा होता है।Ó यह बात उसे समझ में आई और उसने गृहस्थ धर्म का निर्वहन करते हुए साधना के पथ को चुनने का निर्णय लिया।