भाजपा में राजतिलक की तैयारी, कांग्रेस में निराशा
   Date21-May-2019
जयकृष्ण गौड़
19 मई का दिन भी उसी तरह जिज्ञासा रहा, मानो चुनाव परिणाम घोषित हो रहे हैं। आचार संहिता के कारण चुनाव सात चरणों में होने से चुनावी आंकलन और एग्जिट पोल रुके हुए थे, लेकिन 19 मई को जैसे ही अंतिम चरण का मतदान पूर्ण हुआ, इसके तुरंत बाद धड़ल्ले से एग्जिट पोल टीवी के पर्देे पर छा गए। वैसे तो कई एजेंसियों ने चुनावी आंकलन किया है। लेकिन जिन प्रमुख आठ एजेंसियों के एग्जिट पोल के जो आंकलन सामने आए है उसमें प्राय: सभी ने एनडीए को बहुमत दे रहे है। तीन प्रमुख एजेंसियों ने एनडीए को तीन सौ से 313 तक सीटें मिलने की संभावना है। एग्जिट पोल की माने तो दूसरी बार नरेन्द्र मोदी की सरकार बनेगी। एग्जिट पोलों का आंकलन सामने आते ही विपक्षी दलों में मायूसी होना स्वाभाविक है। जिस तरह कटु सत्य कोई स्वीकार नहीं करता, यही स्थिति भाजपा विरोधी दलों की है। इनके नेता इस आंकलन को स्वीकार करने को तैयार नहीं है। एग्जिट पोलों के आंकलन का मनोवैज्ञानिक असर यह हुआ कि विपक्षी एकता की दौड़ पर विराम लग गया। सोनिया गांधी ने विपक्षी दलों की 20 मई को जो बैठक बुलाई थी, उसे निरस्त करते हुए कहा कि अब 27 मई को बैठक होगी। भाजपा में उत्सव जैसा माहौल है। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने एनडीए नेताओं की बैठक 21 मई को दिल्ली में बुलाई है। भाजपा मोदीजी के राजतिलक की तैयारी में जुट गए हैं। आंध्र के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू भी विपक्षी नेताओं को एकजुट करने की पहल कर रहे थे। वे भी वापस अपने निवास में चले गए। सबसे अधिक निराश कांग्रेसी है। हालांकि कांग्रेस की दुर्गति का कारण स्वयं कांग्रेस है। उनके 55 वर्षों के कर्मों का फल उन्हें जनता दे रही है। देश के विभाजन से लेकर आतंकवाद और गड़बड़ घोटाले चुनाव में उजागर होते हैं। इसके अलावा कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी चाहे और पद के लायक हो, लेकिन कांग्रेस के अध्यक्ष के लायक बिल्कुल नहीं है। जिस लटके-झटके के साथ भाषण देते है, लेकिन उनके भाषण में ऐसा आभास होता है कि कोई प्रायमरी कक्षा का छात्र का लड़का बोल रहा है। जिस तरह भाजपा के नरेन्द्र मोदी ने पांच वर्ष के कार्यकाल में भारत को जिस ऊंचाई पर पहुंचाया, भाजपा का उत्तर से दक्षिण तक जो फैलाव हुआ, उससे नरेन्द्र मोदी का कद इतना ऊंचा हुआ कि उनके सामने आज कोई विकल्प नहीं है। यही कारण है कि न केवल 2014 चुनाव में भाजपा ने स्पष्ट बहुमत प्राप्त किया, बल्कि 2019 का चुनाव भी मोदी मैजिक के कारण जीत रही है। मोदी सरकार के कार्यकाल की यह विशेषता रही कि सरकार के विरोध की बजाए सरकार के पक्ष में वातावरण बना और 2019 का चुनाव में अपने विकास और सुरक्षा के लिए किए गए कामों के लिए भाजपा ने वोट मांगे। हालांकि चुनाव के अंतिम दौर में केवल एक ही मुद्दा रहा, नरेन्द्र मोदी पर विपक्ष का विरोध केंद्रित हो गया और जनता में यह विश्वास दृढ़ हुआ कि मोदी ही एकमात्र ऐसा विकल्प उनके सामने है जो देश को उन्नत और सुरक्षित रख सकता है। इसलिए जनता के, जनता के लिए और जनता के द्वारा लोकतंत्र को सफल बनाने के लिए केवल नरेन्द्र मोदी का चेहरा ही दिखाई दिया। चाहे विपक्ष मोदी के बारे में कुछ भी कहे, लेकिन जनता की पहली पसंद मोदी हो गए। जनता ने जहां नरेन्द्र मोदी को पसंद किया। वहीं कांग्रेस और मोदी विरोधियों का काफी हद तक सफाया कर दिया। नरेन्द्र मोदी का यह कथन सार्थक दिखाई देता है 2019 का चुनाव न मोदी लड़ रहा है न भाजपा लड़ रही है, यह चुनाव जनता लड़ रही है। इस कथन के अनुरूप ही चुनाव का आंकलन है। एक एजेंसी का एग्जिट पोल में जातीय आधार पर चुनाव की समीक्षा करते हुए जो आंकड़े प्रस्तुत किए है वे भी चौंकाने वाले है। इसी एजेंसी ने मुस्लिम वोटों का रूझान का प्रतिशत भी प्रस्तुत किया है। इस सर्वे का मानना है कि 60-70 प्रतिशत तक हिन्दू भाजपा के पक्ष में है और 8-10 प्रतिशत ही अन्य दलों को हिन्दू वोट जाता है। इसी तरह मुस्लिमों का समर्थन कांग्रेस और अन्य कथित सेकुलर दलों के साथ है। एजेंसी की माने तो 80-90 प्रतिशत मुस्लिम वोट कांग्रेस और अन्य सेकुलर दलों को मिलता है। इस प्रकार न चाहते हुए भी इस चुनाव में हिन्दू-मुस्लिम वोटों का ध्रुवीकरण हो गया। यह भी सच्चाई है भारत में हिन्दू जनसंख्या करीब 80 प्रतिशत हैं। हिन्दू विरोधी तुष्टिकरण नीति का परिणाम है कि हिन्दू कांग्रेस को समर्थन देने की स्थिति में नहीं है। क्योंकि हिन्दू की संस्कृति, परंपरा और श्रीराम-श्रीकृष्ण के श्रद्धाभाव पर कई बार कांग्रेस ने प्रहार कर हिन्दू भावना को लहूलुहान करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। चुनावी समीक्षा में साध्वी प्रज्ञा भारती का भी संदर्भ दिया गया। इस बात को भाजपा ने पर्दे के पीछे नहीं रखा कि हिन्दू आतंकवाद की झूठी साजिश में साध्वी प्रज्ञा भारती को लगातार सात वर्षों तक प्रताडि़त किया गया। उसके प्रमाण के रूप में साध्वी प्रज्ञा को भोपाल का प्रत्याशी बनाया। साध्वी प्रज्ञा राजनीति के दांव-पेंच नहीं समझती। राजनीति में अक्सर बातें होती है इसलिए उनके मन में आया, वह मुंह से निकाल दिया। इस कारण वे अपने कथों के कारण विवादों में फंस गई। उन्होंने इस सच्चाई को व्यक्त करने में संकोच नहीं किया कि उन्होंने भी बाबरी ढांचा ध्वस्त करने में भागीदारी की है और उनको प्रताडि़त करने वाले एटीएस अधिकारी के विनाश का श्राप उन्होंने दिया। इस कथन से भाजपा की परेशानी बढ़ी है। जब साध्वी प्रज्ञा ने गांधीजी के हत्यारे नाथूराम गोड़से को देशभक्त कहा तो भाजपा को गांधी विरोधी बताते हुए आलोचना का तांता लग गया। हालांकि अमित शाह ने कहा कि हमने तीन नेताओं को नोटिस देकर जवाब मांगा है, अनुशासन समिति कार्रवाई करेगी। इस बारे में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा कि चाहे उन्होंने माफी मांग ली है, लेकिन उनका मन कभी उन्हें माफ नहीं कर सकता। साध्वी प्रज्ञा को चुनाव में राजनीतिक मुद्दा बनाने की कोशिश की गई। लेकिन श्री मोदी के इस कथन से विपक्ष के मुद्दे की हवा निकल गई। जब उन्होंने कहा कि मैं उनको माफ नहीं कर सकता। इस सारे मामले को जनतांत्रिक रूप में देखती है। इसका ताजा उदाहरण यही हो सकता है कि भोपाल की जनता की सहानुभूति साध्वी प्रज्ञा के साथ है। भोपाल लोकसभा क्षेत्र के हिन्दुओं ने श्री मोदी के साथ साध्वी प्रज्ञा को भी समर्थन दिया है। चुनाव बाद की समीक्षा में यह सच्चाई लोगों के सामने आ जाएगी कि साध्वी प्रज्ञा का समर्थन क्षेत्र के 90 प्रतिशत हिन्दुओं ने किया है। इस मामले को तूल देना भाजपा के हित में नहीं है। इस बारे में भाजपा के महासचिव कैलाश विजयवर्गीय का कथन नपा तुला है। उन्होंने कहा कि साध्वी प्रज्ञा हाल ही में भाजपा में आई है, इसलिए वे भाजपा की रीति-नीति से परिचित नहीं है। मनुष्य की पहचान को छिपाया या नकारा नहीं जा सकता। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भगवान केदारनाथ की पूजा-अर्चना कर वहां की गुफा में ध्यान किया। उन्होंने बद्रीनाथ में जाकर भी पूजा-अर्चना की। सोशल मीडिया के चैनलों ने उन्हें हिन्दू ह्रदय सम्राट कहा। यह जमीनी सच्चाई है कि भारत का हिन्दू नरेन्द्र मोदी के साथ खड़ा है। हिन्दू को भरोसा है कि सांस्कृतिक गुलामी की जंजीरों से नरेन्द्र मोदी उन्हें मुक्त करेंगे। जदयू के नेता और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भी साध्वी प्रज्ञा को पार्टी से बाहर कर देना चाहिए। नीतीश कुमार का जदयू एनडीए का दल है। लेकिन भाजपा किसके खिलाफ है और विवादित बयान देने वालों को भाजपा में रखना या बाहर करने का अधिकार केवल भाजपा हाईकमान का है। दूसरों को इस बारे में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। यदि एग्जिट पोल तो जिस महागठबंधन के जोर-शोर की बात कही जाती थी। वह सिमट कर उत्तरप्रदेश में रह गया। मायावती, अखिलेश भी मोदी मैजिक को रोक नहीं सके। 80 में से 60-65 सीटें भाजपा की झोली में जाती हुई दिखाई देती है। यदि एग्जिट पोल के आंकड़ों को मिलाकर विचार करे तो कांग्रेस, सपा-बसपा, भाजपा के प्रभाव को कम करने में सफल नहीं हुई। कांग्रेस का तो सफाया हो रहा है। प. बंगाल में हिंसा की घटनाओं के बाद भी वहां भाजपा ने प्रभावी दस्तक दी है।
(लेखक-वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक)