बगैर नैतिकता के मानवता अधूरी
   Date21-May-2019
धर्मधारा
शाों के अनुसार जब भी ऐसी परिस्थितियां विनिर्मित होती हैं कि अधर्म जीतता हुआ तथा धर्म हारता हुआ दिखता है तब उन परिस्थितियों में संतुलन लाने के लिए भगवान एक अवतारी चेतना के रूप में प्रकट होते हैं। रामायण के समय से लेकर, महाभारत के काल तक इस सत्य को स्पष्टता के साथ अनुभव किया जा सकता है कि उस की विषम परिस्थितियों का चयन परमात्मा ने अपने अवतरण के लिए किया। उस दृष्टि से देखें तो वर्तमान परिस्थितियां भी कुछ उन्हीं चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों के समकक्ष हैं। आज मानवता एक चौराहे पर आकर खड़ी हो गई प्रतीत होती है। यहां से एक रास्ता विनाश की ओर बढ़ता प्रतीत होता है। यदि उस ओर को यह यात्रा चल निकलेगी तो सारी मानवता को नष्ट होते, समाप्त होते देर नहीं लगेगी। परमाणु बमों के जखीरे एकत्रित हो गए हैं, चरमपंथी सत्ता पर काबिज दिखाई पड़ते है, हर ओर बंटवारे-अलगाव की आग लगी हुई है, आतंकवाद एक वीभत्स रूप से धारण कर चुका है। इस ओर यदि मानवता बढ़ती रही तो यह एक सामूहिक आत्महत्या के ही समकक्ष होगा। इसी चौराहे से एक राह उत्थान की ओर भी जाती है। उस पर बढऩे से मनुष्य का स्वरूप, भविष्य-सब बदल सकते हैं। दूसरे शब्दों में कहे तो आज जिस मुकाम पर मानवता आ खड़ी हुई है, वहां से, एक राह देवत्व की ओर ले जाती हैं तो दूसरी पाशविकता की ओर। ऐसे समय में भगवान अवतारी चेतना के रूप में फैल जाने को, प्रज्ञावतार के रूप में सर्वत्र छा जाने को कृतसंकल्पित हैं और अपने सहयोगियों की तलाश करते दिखाई देते हैं। सच पूछा जाए तो वर्तमान समय विकराल भी है और सौभाग्य का द्वार भी। विकराल इसलिए कि वर्तमान समय में परिस्थितियां जितनी चुनौतीपूर्ण है, उतनी संभवत: पहले कभी नहीं रही हों। सौभाग्यशाली इसलिए, क्योंकि इस शानदार समय में हमारे पास यह अवसर है कि हम अपना नाम भगवान के साथी सहयोगी के रूप में, भगवान के पार्षद के रूप में लिखवा सकते हैं। नए युग का निर्माण करने के लिए जिन भी आत्माओं के भीतर जाग्रति की, उत्थान की संभावना प्रकट होती दिखती है, वे सभी भगवान के पार्षद के रूप में गिने जा सकते हैं।