रांगेय राघव
   Date20-May-2019
प्रेरणादीप
महज 39 वर्ष में 150 से अधिक पुस्तकों की रचना करने वाले हिंदी के मूद्र्धन्य उपन्यासकार रांगेय राघव की लेखनशैली भी अद्भुत थी। वे एक बड़ा-सा रजिस्टर लेकर उसमें कई पन्नों को छोड़कर अध्याय बांट लेते और अपने मनोभाव के हिसाब से अध्यायों को आगे-पीछे लिखते। मुरदों का टीला नामक उनका उपन्यास इसी विधि से लिखा गया था। जब उन्यास लेखन से वे ऊब जाते थे तो कहानियां लिखने लगते और जब कहानियों से ऊब जाते तो कविताएं या चित्रकारी करने लगते। वे गंभीर-से-गंभीर पुस्तकों को इतनी गहराई से पढ़ते थे कि किस पृष्ठ पर क्या लिखा है, यह उन्हें याद रहता। जब गंभीर विषयों से वे थकान महसूस करते तो बिल्कुल हल्की-फुल्की कहानियां व उपन्यास पढ़ा करते। उन्हें देवकीनंदन खत्री की रचनाएं प्रिय थीं।