मोदी, आयोग और बयानी कोहराम...
   Date20-May-2019
शक्तिसिंह परमार
भारतीय लोकतंत्र की यह खूबी है कि जहां पर जिस किसी को विषय/मुद्दे पर प्राथमिक ज्ञान भी न हो...वहां पर विशेषज्ञों की भांति तर्क-कुतर्क करने वाला झुंड नजर आता है...क्योंकि उन्हें अभिव्यक्ति की आजादी जो मिली है...यही बात तो लोकतंत्र के लिए किसी विडंबना से कम भी नहीं है.., क्योंकि जब बिना विचार किए एवं किसी विषय/मुद्दे को समझे बिना सिर्फ विरोध-आलोचना के लिए हमलावर हुआ जाता है...तब केवल इसके जरिए विभ्रम फैलाने के सिवाय कुछ हासिल होता नजर नहीं आता...लेकिन कुछ लोगों का काम सिर्फ बुराई-आलोचना ढूंढऩा और ऐसा करते समय वे शत-प्रतिशत सच्चाई-अच्छाई में भी बुराई ही तलाशने में अपना जीवन खपा देते हैं...लेकिन चुनाव के सातवें चरण की पूर्व संध्या पर भारतीय लोकतंत्र की दो घटनाएं मानो आलोचना करने वालों के लिए 'बिना मांगे मुराद पूरी होने जैसी थीÓ लेकिन इसको लेकर जो उनकी बुद्धि का अजीर्ण सामने आ रहा है...वह स्वस्थ लोकतांत्रिक परंपरा के पूर्णत: खिलाफ नहीं है..? प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सातवें चरण का प्रचार समाप्त करते ही बाबा केदारनाथ के दर्शन का रुख किया... इधर आदर्श चुनाव आचार संहिता के मामले में 'चुनाव आयोगÓ पर बयानी हमला शुरू हो चुका है...'जनताÓ ने अपना 'जनादेशÓ ईवीएम में कैद कर दिया है..,लेकिन प्रधानमंत्री मोदी एवं चुनाव आयोग को लेकर जो बयानी कोहराम मचाया जा रहा है, वह बहुत ही निराशाजनक एवं ओछी मानसिकता को दर्शा रहा है...क्या इन दोनों मुद्दों/विषयों पर विपक्ष ही नहीं, आलोचना में जुटे धड़ों को भी संवैधानिक पदों/संस्थाओं की मर्यादा तार-तार करने से नहीं बचना चाहिए..?
लोकसभा चुनाव में भाजपा के सबसे बड़े स्टार प्रचारक और पार्टी के ब्रांड एम्बेसेडर नरेन्द्र मोदी ने प्रचार अभियान के समापन के साथ शनिवार को बाबा केदारनाथ के दर्शन किए एवं आत्मिक शांति के लिए ध्यानमग्न हुए...अब कांग्रेस समेत तमाम राजनीतिक दलों के प्रवक्ता एवं मोदी विरोधी गैंग सोशल मीडिया पर प्रधानमंत्री के इस धार्मिक प्रवास को मुद्दा बना रही है...वे बाबा के दर्शन को गैर लोकतांत्रिक कैसे ठहरा सकते हैं..? क्योंकि ऐसे कुतर्कियों को तो बाबा केदारनाथ तुरंत सबक सिखा देंगे...इसीलिए बेचारे मुद्दे के बजाय मुद्दे की पूंछ पकडऩे की शैली में कह रहे हैं कि- प्रधानमंत्री कैमरा लेकर क्यों गए..? आलोचकों का भोंडा तर्क देखिए वे कह रहे हैं मोदी अंतिम चरण के मतदान से ठीक पहले स्वयं का प्रचार कर रहे हैं...वाह! क्या खूब कुतर्क गढ़ा..? ऐसे आलोचकों से एक ही सवाल है कि क्या मोदी पहली बार बाबा केदारनाथ के धाम पहुंचे हैं..? जो बात का बतंगड़ बनाया जा रहा है...प्रधानमंत्री इन दोनों सालों में चौथी बार बाबा केदारनाथ के दर्शन को पहुंचे हैं...3 मई और 20 अक्टूबर 2017 को क्रमश: धाम के कपाट खुलने एवं बंद होने पर मोदी ने दर्शन किए थे...तब सवाल क्यों नहीं उठाया..? 7 नवंबर 2018 को तो प्रधानमंत्री ने जवानों के संग धाम परिसर में दीपावली मनाई थी...तब ऐसे कैमरा ले जाने का भोंडा तर्क क्यों नहीं गढ़ा गया था..? और अब जब 2019 में गए हैं, तब चुनाव आचार संहिता का हवाला भी खोखला है...क्योंकि प्रचार समाप्त होने के बाद आयोग से अनुमति लेकर यह यात्रा कर रहे हैं...जब मप्र में पहले चरण में 6 सीटों पर मतदान के बाद वहां पर चुनाव आयोग कांग्रेस की कमलनाथ सरकार को किसानों की ऋणमाफी की राशि खातों में डालने की अनुमति दे सकता है..,तब धार्मिक यात्रा से चुनावी क्षेत्रों पर क्या असर हो सकता है..? रही बात दर्शन-पूजन, योग-ध्यान एवं निर्माण-कार्यों के अवलोकन के समय छायाचित्रों की तो इसको लेकर विपक्ष का कोई-सा भी कुतर्क विचारणीय नहीं है...याद रखिए आलोचक बंधुओं, मोदीजी भाजपा के प्रचारक प्रमुख ही नहीं हैं..,वे देश के प्रधानमंत्री हैं...उनकी सुरक्षा में जो-जो आवश्यकताएं/संसाधन जरूरी हैं, उनका पालन होना ही चाहिए...फोटो जारी नहीं होते तो यही आलोचक फिर कहने लग जाते कि वे (मोदी) चुनावी जीत के लिए न जाने क्या-क्या तंत्र-मंत्र, जाप-अनुष्ठान करने गए हैं..? क्योंकि जीत के लिए ही तो भोपाल में दिग्विजय ने जो खुले मैदान में हठ योग किया.., सबको मालूम है...अत: फोटो जारी करने, न करने दोनों ही स्थितियों पर आलोचकों का मुख कुतर्कों के लिए खुला रहता...इसलिए मोदी के देवदर्शन, ध्यान-योग पर सवाल उठाने वाले आलोचक अब यह भी बता दें कि हिन्दुत्व की रीति-नीति के आधार स्तम्भ भारत में 'राजाÓ को अपनी आस्था-विश्वास के मानबिंदुओं के पालन के लिए क्या टुकड़े-टुकड़े गैंग से अनुमति लेना होगी..? तो माफ कीजिएगा, ये मोदी की शैली है..,वह ऐसा कतई नहीं करेंगे...
भारत के निर्वाचन महायज्ञ के प्रमुख पुरोहित 'चुनाव आयोगÓ की आपसी सहमति-असहमति या कहें कि आंतरिक विवाद का विषय सार्वजनिक होना क्या पिछले 5 वर्षों से लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं/संस्थाओं में जो कैकटस उभरकर केंद्र सरकार एवं मोदी की छवि को धूमिल करने का खेल खेलते रहे हैं, उसी की पुनरावृत्ति को दोहराता हुआ चुनाव आयोग का ताजा विवाद नहीं दिख रहा..? याद करें केंद्र की सर्वोच्च न्याय व्यवस्था सुप्रीम कोर्ट के चार जजों का विवाद बाहर लाना.., देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ 'रिवर्ज बैंकÓ एवं नीति आयोग में विवादों को बढ़ावा देना...जनेविवि में भारत के टुकड़े करने की नारेबाजी से लेकर पुरस्कार-सम्मान लौटाने वाली उस गैंग का खेल क्या सिर्फ मोदी पर लक्षित हिंसा ही नहीं रहा है..? इस बार इस मोदी विरोधी अभियान के अगवा चुनाव आयुक्त अशोक लवासा बने हैं...चुनाव आयोग जैसी संस्था में भी व्यक्ति ही बैठते हैं..,कभी वे मनोहरसिंह गिल एवं नवीन चावला की भांति खुले रूप से कांग्रेस के एजेंट की भूमिका का निर्वाह करते रहे हैं.ऐसे में लवासा किस मोह में चुनाव के समय ही विरोध का बिगुल बजा रहे हैं, यह तो वे ही जानें...लेकिन कांग्रेस समेत तमाम विपक्ष के प्रवक्ताओं एवं मोदी विरोधी धड़ों द्वारा चुनाव आयोग को भाजपा सरकार और मोदी-शाह का पिट्ठू, राजनीतिक एजेंट, नाकारा जैसे संबोधन क्या प्रदर्शित कर रहे हैं..? क्या इसे लोकतांत्रिक भाषाशैली मान लें..? जब सुप्रीम कोर्ट ने 15 अप्रैल को हनुमानजी की भांति 'चुनाव आयोगÓ को अपनी शक्तियां याद दिलाई, तभी आयोग ने माया-आजम और योगी पर 48 व 72 घंटे के चुनाव प्रचार पर प्रतिबंध लगाए थे...लेकिन प्रधानमंत्री या शाह के खिलाफ कोई कार्रवाई न होना भी अचंभित करता है.., फिर भी संवैधानिक व्यवस्थाओं का मखौल उड़ाने वालों को और प्रधानमंत्री एवं चुनाव आयोग पर जबरिया बयानी कोहराम मचाने वालों को जनता का 'जनादेशÓ करारा जवाब देगा...क्योंकि इंतजार कीजिए लोकतंत्र के इस वैचारिक समर से आने वाले जनादेश के सिर्फ 4 दिन शेष... -श्चड्डह्म्द्वड्डह्म्ह्यद्धड्डद्मह्लद्ब८०ञ्चद्दद्वड्डद्बद्य.ष्शद्व