परिवर्तन के मध्य है सर्वोपरि सत्ता
   Date20-May-2019
धर्मधारा
संसार और जीवन में दो ही तत्व हैं-एक तत्व वह है, जहां निरंतर परिवर्तन घटित होता रहता है और दूसरा तत्व वह है, जो उस परिवर्तन के बीच भी सदा स्थिर और स्थायी रहता है। प्रकृति में परिवर्तन घटित होते हैं और होते ही रहते हैं। इन परिवर्तनों में कभी कोई विराम नहीं लगता है, कोई ठहराव नहीं होता है। प्रकृति का नियम है कि उसमें परिवर्तन घटित होते रहेंगे। इस नियम को कोई बदल नहीं सकता है। परिवर्तन का यह नियम जितना स्थिर एवं अटल है, उतना ही स्थायी यह नियम भी है कि इस परिवर्तन के मध्य जीवात्मा सदा स्थिर एवं शांत रहती है। शरीर बदलता है, नए जीवन में नया शरीर मिलता है, परंतु शरीर के परिवर्तन की इस यात्रा में जीवात्मा सदा स्थिर रहती है। शरीर मिलता है और शरीर के साथ ही नया बचपन शुरू होता है। शरीर और मन दोनों की गतिविधियां, दोनों की बातें, दोनों की हलचलें कुछ अलग होती हैं। हम पहचान जाते हैं कि ये बच्चे हैं। सब बच्चों का व्यवहार, सब बच्चों का भाव, क्रियाकलाप, उनका जीवन एक जैसा होता है। समय बीतता है, अवस्था बदलती है और किशोरावस्था शुरू होती है। किशोरावस्था में सबकुछ बदलने लगता है। नई उमंग, नई तरंग, नया उल्लास, नया जीवन, कुछ नया करने की एवं नया पाने की इच्छा शुरू होती है। इस अवस्था में शरीर में परिवर्तन होते हैं और मन में भी परिवर्तन होते हैं। ये परिवर्तन सभी देहधारियों में होते हैं। मनुष्यों में भी होते हैं और पशु-पक्षियों में भी होते हैं तथा वृक्षों-वनस्पतियों में भी होते हैं। बचपन के बाद किशोरावस्था और किशोरावस्था के बाद यौवन आता है। जो ऊर्जा बचपन से विकसित हो रही थी, जो ऊर्जा बचपन में अंकुरित हो रही थी, वह यौवन में, युवावस्था में अपने चरम पर होती है। यौवन की यह घटना शुरुआत से लेकर 35 वर्षों में घटित हो जाती है। 35 वर्षों तक ये सारे परिवर्तन हो जाते हैं और उसके बाद ढलान शुरू हो जाती है। वही बचपन में अठखेलियां करना, हंसना-खिलखिलाना, वही उमंगों से, उल्लास से भरी किशोरावस्था और अभिमान एवं दर्प से भरा यौवन ढलने लगता है। दिन-प्रतिदिन नए-नए ढंग से, नए-नए तरीके से, नई-नई रीति से, नई-नई विधियों से बुढ़ापा दस्तक देने लगता है। परिवर्तन की यह घटना केवल शरीर में ही नहीं, मन में भी घटती है। इन परिवर्तनों के बीच भी कुछ ऐसा है, जिसमें परिवर्तन बिल्कुल नहीं होते। जो चिर है, जो शाश्वत है, जो पुरातन होते हुए भी नूतन है- वह है आत्मा। आत्मा इन सब परिवर्तनों का आधार है।