सत्पुरुष कौन?
   Date18-May-2019
प्रेरणादीप
सूर्य परिभ्रमण में निरत था। उसने प्रवास काल में कइयों से कई प्रकार की निंदाएं सुनीं।
एक बोला-'अभागे को कभी छुट्टी नहीं मिलती।Ó
दूसरे ने कहा-'बेचारा रोज जन्मता और रोज मरता है।Ó
तीसरे ने कहा-'निर्जीव होते हुए भी आग उगलता है।Ó
चौथे ने कहा-'किसी बड़े अपराध का दंड भुगत रहा है।Ó
सूर्य को इस कृतघ्नता भरे जवाब पर क्रोध आया और दूसरे दिन उगने से इनकार कर दिया। सूर्य की पत्नी ने रूठने का कारण जाना तो हंस पड़ी और बोली-'ढेले की चोट से घड़े फूटते हैं, किंतु ढेले समुद्र में गिरकर गर्त में विलीन हो जाते हैं। आप घड़े नहीं, समुद्र हैं और फिर ढेले की आदत और परिणति क्यों नहीं समझते?Ó
अपनी भूस स्वीकार करते हुए सूर्यनारायण ने यथाक्रम अपना रथ आगे बढ़ा दिया। वस्तुत: सत्पुरुष न अशिष्टता बरतते हैं और न अशिष्टों के व्यवहार को महत्व देते हैं, तभी लक्ष्य पर बढ़ पाते हैं।