निष्काम कर्म ही कर्मयोग का आधार
   Date18-May-2019
धर्मधारा
इस जगत में कोई तो आनंद की लहरों से खेल रहा हैष अठखेलियां कर रहा है तो वहीं दूसरी ओर कोई गम के समंदर में डूबा हिचकोले खा रहा है। कोई किलकारियां मार रहा है तो कोई सिसकियां भर रहा है। किसी का दामन खुशियों से भरा है तो किसी का जीवन कांटों में उलझा है। कोई अपने स्वर्णमहल में रहकर भी उदास है तो कोई खुले आसमान के नीचे रहकर भी निहाल है। सचमुच जीवन और जगत के इस रूप को देखकर हमें कितना विस्मय व अचरज होता है! पर क्या ऐसा अनायास ही होता है या फिर इसका कोई ठोस कारण है? क्यों किसी के जीवन में सुख-ही-सुख है, आनंद-ही-आनंद है, तो किसी के जीवन में शोक की सिसकियां ही भरी हैं? किसी के जीवन में सावन की रिमझिम फुहार है, तो किसी के जीवन में ज्येष्ठ की तपती दोपहरी है? ऐसा क्यों है? कुछ भी हो, पर ऐसा अनायास तो नहीं हो सकता। ऐसा अकारण तो नहीं हो सकता। इसका कोई तो कारण होगा? हमारे सुख-दु:ख का अवश्य ही कोई कारण है और वह कारण है हमारे द्वारा कभी-न-कभी बोए गए शुभ-अशुभ, अच्छे-बुरे, पाप-पुण्य आदि कर्मों के बीज। जो समय पाकर अच्छे-बुरे फलों के रूप में, हमारे जीवन में अब प्रकट हो आए हैं। भला बीज के बिना कोई वृक्ष कैसे हो सकता है? कहीं संतरे के बगीचे हैं तो कहीं सेब के, पर ऐसा सिर्फ इसलिए है, क्योंकि वहां किसी ने संतरों के, सेबों के बीज बोए हैं, पौधे लगाए हैं इसलिए वे वहां उग आए हैं। हमारे जीवन ेमें यदि सुख है या दु:ख है तो सिर्फ इसलिए है कि अपने इस जीवन में या पूर्व के जीवन में हमने सुख या दु:ख के बीज बोए अवश्य हैं, सुख या दु:ख के पौधे लगाए अवश्य है, क्योंकि हमारे सुख-दु:ख का कारण हम स्वयं हैं कोई और नहीं। नागफनी के पौधे बोने पर हम कोई मीठा फल प्राप्त करने की आशा कैसे कर सकते हैं। हमें तो तब दु:ख के कांटे ही मिलेंगे। जैसा कि कहा गया है- बोया पेड़ बबूल का आम कहां से खाय।
रामचरितमानस की प्रस्तुत चौपाई में यही भाव मुखरित हो रहे हैं-
काहु न कोउ सुख दुख कर दाता।
निज कृत करम भोग सबु भ्राता।।
कोई दूसरा किसी के सुख-दु:ख का कारण नहीं है, वरन अपने किए गए कर्मों का फल ही सबको प्राप्त होता है। युगऋषि परमपूज्य गुरुदेव श्रीराम शर्मा आचार्यजी की प्रस्तुत पंक्तियों में भी यही भाव मुखरित हैं- 'कर्मफल विधान में ईश्वर का कोई हस्तक्षेप नहीं है। हमारे द्वारा किए गए अच्छे-बुरे कर्म ही सुख और दु:ख के रूप में हमारे समक्ष प्रकट होते हैं। कर्मफल विधान 'बोओ और काटोÓ के सिद्धांत पर आधारित हैं।Ó