श्रेष्ठ परम्परा
   Date14-May-2019
प्रेरणादीप
का शी नरेश की धर्मपत्नी बड़ी सुंदर थीं। एक दिन वे दासियों समेत प्रात:काल गंगा स्नान को गईं। अभ्यास न होने के कारण ठंड से कांपने लगीं। सो अपने कर्मचारियों को आदेश देकर गंगा तट पर बनी झोपडिय़ों को जलाकर ठंड छुड़ाने का प्रयत्न किया। यह सूचना काशी नरेश तक पहुंची। उन्होंने रानी को दरबार में अपराधी की तरह बुलाया और कहा-'वे सारे कीमती कपड़े उतारकर भिखारियों जैसे वस्त्र पहनें।Ó आगे उन्होंने कहा- 'अज्ञात रूप में भिखारियों के साथ रहकर उसी तरह भिक्षा मांगें और उपलब्ध धन से जली हुई झोपडिय़ों को नई बनवाएं।Ó रानी अपनी सजा पूरी करके लौटीं तो काशी नरेश ने उनका सम्मान किया और कहा - 'देवी! राज्य हमारा परिवार है। हम इस परिवार के प्रमुख हैं। हम जिन आदर्शों का स्वयं पालन करेंगे, वही राज्य में पनपेंगे। तुमसे भूल हुई, उसका प्रायश्चित सहर्ष करके तुमने प्रजा का विश्वास ही नहीं जीता, बल्कि श्रेष्ठ परंपराओं को भी पोषण दिया है।Ó