ममता का 'त्रियाहठ' खेल...
   Date14-May-2019
शक्तिसिंह परमार
भारतीय लोकतंत्र में त्रियाहठ की बेजा आहट सुनाई दे रही है... क्या 'त्रियाहठÓ स्वीकार किया जा सकता है..? वह भी सिर्फ स्वार्थपूर्ति की बुनियाद पर.., सुधार, निर्माण तक तो किसी भी स्तर पर जाकर 'त्रियाहठÓ स्वीकार है.., लेकिन जब उस 'त्रियाहठÓ का आधार बिगाड़, विध्वंस, दंभ और सिर्फ स्वार्थ हो, तब आखिर लोकतंत्र या संविधान की दुहाई देकर ऐसी वृत्ति को स्थान देना क्या अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा नहीं है..? भारत में 'त्रियाहठÓ की लंबी श्रंृखला है... लेकिन रामराज्य के समय में, भारतीय लोकतंत्र की युवा अवस्था में और लोकतंत्र के वर्तमान दौर में 'त्रियाहठÓ के वृतांत-अनुभव हमें बता रहे हैं, हमें चेता रहे हैं और सजग भी कर रहे हैं कि - स्वार्थ से ओत-प्रोत 'त्रियाहठÓ को कतई स्वीकार नहीं करना है... और साथ ही उसके पीछे की मंशा को समझकर अपना निर्णय करना है...
रामायण का कालखंड याद कीजिए.., दासी मंथरा ने रानी कैकयी को बहकाया पुत्र व सत्ता मोह में... कैकयी का कोपभवन में जाना, महाराजा दशरथ का उन्हें मनाने का प्रयास करना और 'नारीहठÓ अर्थात त्रियाहठ के आगे 'राजहठÓ का हारना... कैकयी का यह दोनों हठ भले ही स्वार्थपूर्ति लिए थी, लेकिन 'जन-जनÓ के बीच 'श्रीरामÓ के जीवनवृत्त को पहुंचाने के लिए वे (कैकयी) निमित्त बनी थी, जिसे राजा दशरथ ने भी 'रामचंद्रजीÓ को वनवास एवं भरत को राजतिलक का वचन देकर पूरा किया... अगर कैकयी 'त्रियाहठÓ न दिखाती तो 'राम और रामायणÓ का सूत्रपात और जन-जन का प्रेरणा पथ अधूरा ही रह जाता...यह था रामराज्य का लोकतंत्र...
जब भारतीय लोकतंत्र ने युवा अवस्था की दहलीज पर ही कदम रखा था कि 1975 में इंदिरा गांधी ने अपनी सत्ता को बचाए रखने के लिए, अपने गड़बड़ निर्णयों पर पर्दा डाले रखने के लिए लोकतंत्र को बंधक बनाने का महास्वार्थ आगे बढ़ाया और देश को आपातकाल की आग में झोंका... इंदिरा गांधी की वह जिद अर्थात 'त्रियाहठÓ क्या सत्ता स्वार्थ के साथ ही लोकतंत्र एवं राष्ट्र को विध्वंसक स्थिति की तरफ धकेलने वाला नहीं था..? क्या उस त्रियाहठ के कारण जिन्हें जेलों में रखकर भयावह प्रताडऩा दी गई, जिन्हें वर्षों तक घर-परिवार छोडऩे के लिए मजबूर किया... क्या ऐसा त्रियाहठ याद आते ही आंखों में खून नहीं उतर आता..?
अब अनुभवशील उम्रदराज भारतीय लोकतंत्र के पग बाधने का खेल पुन: शुरू हो चुका है, पश्चिम बंगाल से लेकर उत्तरप्रदेश तक में जिस तरह से लोकसभा चुनाव के सियासी समर में लोकतंत्र की दुहाई देकर लोकतंत्र की हत्या करने की साजिशें परवान चढ़ाई जा रही हैं, क्या इन्हें 'त्रियाहठÓ की कीमत पर मंजूर किया जा सकता है..? क्या महिला होना ही 'लोकतंत्रÓ एवं कानून-नियमों के साथ खिलवाड़ की छूट समझ लेने की राजनीतिक परिपाटी को ऐसे ही बढ़ावा दिया जाएगा..? जैसा पश्चिम बंगाल में रह-रहकर 'ममता बनर्जीÓ जबरिया दोहरा रही हैं... बंगालवासियों पर थोप रहीं और पूरे बंगाल को भारत से अलग बताने पर तुली हैं... जो नियम देश के सभी राज्यों के लिए हैं, वे पश्चिम बंगाल में ममता द्वारा क्यों और कैसे रोके जा रहे हैं..? ठीक बहुजन समाज पार्टी की मायावती की जो राजनीतिक बयानबाजी 'प्रधानमंत्रीÓ के खिलाफ लगातार अनर्गल प्रलाप के रूप में सामने आ रही है, क्या यह भी समाज के बंटवारे की 'त्रियाहठÓ मानसिकता की परिचायक नहीं है..? आखिर मायावती बार-बार जाति-जाति ही क्यों खेल रही हैं...
बंगाल में कुल 42 लोकसभा सीटों के लिए चुनाव आयोग को सात चरणों में कभी 2, कभी 4, तो कभी 6 सीटों पर मतदान करवाकर लोकतंत्र की चुनावी प्रक्रिया का पालन करना पड़ रहा है... अगर एक या दो चरणों में पश्चिम बंगाल में मतदान होता तो ममता का सिंडिकेट तंत्र क्या गुल खिलाता... विचार किया जा सकता है... क्योंकि अभी तक सम्पन्न 6 चरणों में प्रत्येक चरण में हिंसा, लूटपाट, झड़प, फायरिंग और हत्या का खेल चला है... बिना हिंसा के कोई चरण बंगाल में पूरा नहीं हुआ, यानी चुनाव आयोग द्वारा तैनात 11 हजार केन्द्रीय पुलिस बल और साथ ही राज्य पुलिस के हाथ बांधने का गुस्सा ममता बनर्जी के चेहरे एवं जुबान से प्रतिदिन झलक रहा है..? भाजपा कार्यकर्ताओं एवं भाजपा के लोस प्रत्याशियों पर भी हमला करवा रही हैं... क्या यह बंगाल में लोकतंत्र के सारे कानूनों को ताक पर रखकर सिर्फ अपनी हठ का राज चलाने, अपने दंभ का कानूनी राज लागू करने की घृणित राजनीति नहीं है..? अगर ऐसा करके भी ममता जीत जाती हैं तो हारेगा कौन..? भाजपा और मोदी..? बिल्कुल नहीं, तब सिर्फ बंगाल की बंधक बनी निरीह जनता एवं लोकतंत्र हारेगा... क्योंकि ममता का 'त्रियाहठÓ तो अभी तक यही दिखा रहा है..?
आखिर कौन-सा पहाड़ टूट पड़ता बंगाल में जो ममता ने फिर अमित शाह के चुनाव प्रचार को प्रतिबंधित करने का अलोकतांत्रिक कदम उठाया... चुनाव की घोषणा के साथ ही ममता ने भाजपा के साथ यह गैरकानूनी राजनीति का खेल खेलना शुरू कर दिया था, भाजपा नेताओं के हेलिकॉप्टर को उतारने की अनुमति न देकर तो कभी रैली के रोड शो पर प्रतिबंध लगाकर... अब पुन: अंतिम चरण में उसी घृणित सियासी खेल के शोले से ममता खेल रही हैं...ममता बौखलाहट भी बयां कर रही हैं, जबकि सर्वाधिक रिकॉर्ड मतदान का कीर्तिमान बना रहा बंगाल ममता को चेतावनी भी दे रहा है कि उनके पैरों तले से जमीन खिसक चुकी है... तभी तो वे अंतिम चरण में लाज बचाने का 'त्रियाहठÓ खेल खेल रही हैं, लेकिन यह भी स्वार्थ पर केन्द्रित है, जिसे जनता स्वीकार नहीं करेगी..? क्योंकि जनता जवाब देने को तैयार है... इंतजार कीजिए लोकतंत्र के इस वैचारिक समर में आने वाले जनादेश के सिर्फ 10 दिन शेष... - श्चड्डह्म्द्वड्डह्म्ह्यद्धड्डद्मह्लद्ब८०ञ्चद्दद्वड्डद्बद्य.ष्शद्व