नैतिकता का अर्थ मनुष्य का आंतरिक स्वरूप
   Date14-May-2019
धर्मधारा
य ह संसार स्रष्टा की विविधतापूर्ण अद्भुत कृति है। इसमें एक दूसरे से तुलना स्वाभाविक है, लेकिन यदि हम व्यक्तिगत जीवन में किसी से तुलना-कटाक्ष के अंतहीन कुचक्र में उलझ गए तो जीवन में सुख और सफलता का मार्ग कंटकाकीर्ण हो जाता है। हमें इस कुचक्र से बाहर निकलने की आवश्यकता है। किसी से तुलना-कटाक्ष करने के चलते हम ईष्र्या-द्वेष में फंस जाते हैं और अनावश्यक तनाव एवं मानसिक संताप को निमंत्रण दे रहे होते हैं।
समझने की जरूरत है कि इस सृष्टि में स्रष्टा की हर रचना स्वयं में अनुपम एवं अनूठी है। सबका अपना सौंदर्य है, अपना वजूद है, अपनी रंगत है, अपना स्वरूप है, अपनी विशेषता है व अपनी उपयोगिता है और साथ ही अपनी सीमाएं भी हैं। जल में तैरने वाली मछली से पेड़ पर उछलकूद करने वाले बंदर की तुलना नहीं की जा सकती। कीचड़ में खिलने वाले कमल से गुलाब की क्या तुलना। गर्मी में पकने वाले आम से बर्फीले क्षेत्रों में तैयार होने वाले सेब की क्या तुलना। हिमालय की वादियों में खिल रहे ब्रह्म कमल से घर-आंगन में खुशबू बिखेर रही तुलसी की क्या तुलना। कहने का तात्पर्य है कि सृष्टि की हर कृति स्वयं में बेजोड़ एवं अनुपम है। इनको निहार कर स्रष्टा की कुशल कारीगरी एवं सौंदर्य-बोध की दाद देनी पड़ेगी।
यही इंसान के संदर्भ में भी सत्य है। हर व्यक्ति एक विशिष्ट उद्देश्य के साथ अपनी भूमिका निभाने के लिए धरती पर आया है, परमात्मा के विश्व उद्यान को सुंदर सुरम्य बनाने के लिए भेजा गया है। जरूरत अपने मौलिक स्वरूप को पहचानने की, जीवन के मूल लक्ष्य को समझने की है। वह मौलिक बीज क्या है, जो अंकुरित होने की बाट जोह रहा है। वह मौलिक विचार-भाव क्या है, जो अभिव्यक्त होने के लिए कुलबुला रहा है। वह मौलिक विशेषता क्या है, जो इस सृष्टि के सौंदर्य में एक नया आयाम जोडऩे वाली है। वह मौलिक कृति क्या है, जो सिर्फ और सिर्फ आपके अंदर से बाहर प्रकट होने के लिए जन्मों से इंतजार कर रही है। इन प्रश्नों का उत्तर प्राप्त करने वाले ही स्वयं में निहित मौलिकता से परिचित हो पाते हैं।