विश्व मंच पर भारत का नया अवतार...
   Date12-May-2019

शक्तिसिंह परमार
अं तरराष्ट्रीय मंच पर जब जैश-ए-मोहम्मद के सरगना दुर्दान्त आतंकवादी मसूद अजहर विश्व का सबसे बड़ा प्रतिबंधित आतंकवादी घोषित हो रहा था, तब भारत विश्व मंच पर अपने नए अवतार के साथ कदमताल करता नजर आ रहा था... सही मायने में यह भारत की पांच वर्षों में कूटनीतिक रूप से सोच-समझकर आगे बढऩे की उस विदेश नीति की शत-प्रतिशत सफलता है, जो प्रधानमंत्री मोदी ने विदेशी भूमि पर दौरे कर-करके बनाई थी... मसूद का वैश्विक आतंकवादी घोषित होना इतना आसान नहीं था.., यह हमने मार्च में देख भी लिया था... क्योंकि चीनी चौधराहट और कुटिल चीनी चालों का हमने कई बार खामियाजा भुगता है... वही तो मार्च में हुआ था.., लेकिन इस बार पुलवामा के बाद जो हुआ, वह भारत की आतंकवाद के खिलाफ कारगर रणनीति एवं स्पष्ट लाइन का ही नतीजा है... संयुक्त राष्ट्र ने मसूद को वैश्विक प्रतिबंधित आतंकवादी घोषित कर जो प्रतिबंध लगाए, उसके लिए दो घटनाक्रमों ने पहले ही पटकथा लिख दी थी... क्योंकि हवा का रुख तो तभी से स्पष्ट होने लग चुका था..
पहला : जब चीनी ड्रेगन अपनी कुटिल चालों को आगे बढ़ाकर महत्वाकांक्षी 'बेलट एण्ड रोड प्रोजेक्टÓ के दूसरे शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए पाकिस्तान के वजीर-ए-आजम इमरान खान बीजिंग पहुंचे, तो उनकी अगवानी चीन सरकार के किसी मंत्री, प्रमुख अधिकारी के बजाय बीजिंग म्युनिसिपिल कमेटी के उपसचिव ली फिंग को करने भेजा था... जिसे पाक अपना घनिष्ठ मित्र बताते नहीं अघाता था, वही (चीन) उसके साथ कैसे पेश आया, इसको देखकर इमरान भी बेचैन हो उठे थे...
दूसरा : जब शिखर सम्मेलन में आए हुए मेहमानों के साथ स्मृति के रूप में चित्र साझा करने हेतु मंच पर मेहमानों को बुलाया गया तो इमरान खान को पुन: दूसरी बार चीन ने जमीन दिखाते हुए दूसरी पंक्ति के एक कोने में खड़ा किया... यानी एक-दूसरे की दांतकटी रोटी खाने वाले चीन-पाक में दूरियां बढ़ चुकी थी... क्योंकि वहां से चीन ने स्पष्ट संदेश आतंकवाद के मामले में सुना दिया था कि 'बहुत हो चुकाÓ अब पाकिस्तान के आतंकपरस्त साये को चीन का साथ नहीं मिलेगा...
इन दोनों घटनाक्रमों ने चीन के सख्त रुख को पाक के परिप्रेक्ष्य में सामने लाकर खड़ा कर दिया... अब चीन आतंकवाद के मामले में पाकिस्तान को और आश्रय देने को तैयार नहीं है... यानी अब चीन ने दस वर्षों से मसूद पर अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी घोषित होने की जो रोक लगा रखी थी, 'वीटोÓ को हटा लिया और अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की ऐतिहासिक जीत का डंका बज गया... यह भारत की रणनीतिक ही नहीं, कूटनीतिक विजय थी, जिसमें अमेरिका के साथ मिलकर ब्रिटेन व फ्रांस ने चीन पर जोरदार दबाव डालने का काम किया... क्या यह भारत की बिना रणनीतिक/कूटनीतिक पहल से संभव था..? कतिय नहीं..?
चीन के साथ आतंकवाद के मामले में पहली बार समस्या यह उत्पन्न हो गई थी कि वह आतंकवाद के पालने-पोसने वाले और उनको संरक्षण देने वालों की सूची में तेजी से शुमार होने लगा था... यानी चीन की छवि आतंकवाद के प्रश्रयदाता के रूप में उभरकर सामने आने लगी थी... चीन वीटो हटाकर आतंकवाद के समर्थन में खड़े होने की अपनी छवि को सुधारना चाहता था... क्योंकि अगर इस बार चीन वीटो नहीं हटाता तो अंतरराष्ट्रीय संस्था एफटीएलएफ पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी देश घोषित कर देती... ऐसे में चीन का पाकिस्तान में अरबों डॉलर का निवेश एवं निर्माण कार्य खटाई में पड़ जाता... इसलिए पाकिस्तान को मझधार में छोड़कर चीन ने अपना हित संवद्र्धन करने में ही भलाई समझी... यह भारत की लगातार कोशिशों से ही संभव हो सका...
पाकिस्तान की स्थिति को अगर भारत की इस अंतरराष्ट्रीय जीत के संबंध में देखें तो पता चलता है कि पुलवामा के बाद भारत द्वारा उठाए गए आर्थिक प्रतिबंधों के चलते ही पाकिस्तान की कमर टूट चुकी है... ऊपर से अंतरराष्ट्रीय दबाव और खैरात (आर्थिक सहायता) न मिलने के चलते पाकिस्तान ने आतंकवाद के खिलाफ फिलहाल तो कुछ समय के लिए हथियार डालना ही मुनासिफ समझा... क्योंकि पाकिस्तान को यह मालूम है कि 26/11 के आतंकी हमले और अब पुलवामा के हमले के बाद पाकिस्तान का आतंकी चेहरा बेनकाब हो चुका है... पाकिस्तान अपनी सामरिक शेखी दिखाने या भारत से इस संदर्भ में होड़ लगाने के चलते ही सामाजिक-सांस्कृतिक रूप से ही बांग्लादेश से भी बहुत पिछड़ चुका है... बालाकोट की कार्रवाई के बाद पाकिस्तान के हाथ से परमाणु धौंस जमाने का वह पुछल्ला भी जाता रहा...
अमेरिकी भूमिका को देखें तो यह पर भारतीय बाजार की सभी के लिए पहले पायदान पर है, क्योंकि कोई भी आतंकवाद झेलकर पाकिस्तान को मौका नहीं देना चाहता... क्योंकि भारत आज तीन ट्रिलियन डॉलर के करीब की अर्थव्यवस्था है, यानी पाकिस्तान से 10 गुना बड़ी... फिर सऊदी अरब, यूएई के साथ ही ईरान भी अब भारतीय हितों के पक्ष में मुखर होने लगे हैं... वहीं पाकिस्तान के रिश्ते तेहरान-ईरान के साथ ही उतने जोशीले नहीं रहे... स्वयं इमरान ने भी स्वीकार किया था कि पाक की धरती पर ईरान में आतंकी हमलों के लिए उपयोग होता है... फिर चीन को भी तो पाकिस्तान की तुलना में भारतीय बाजार, यहां के आयात-निर्यात और उन द्विपक्षीय व्यापारिक समझौतों को भी तरजीह देना था... इसलिए जो समीकरण चीन, अमेरिका और पाकिस्तान के संयुक्त राष्ट्र ने आतंकवाद के खिलाफ बने और भारत का पक्ष मजबूत हुआ, इसमें कहीं-न-कहीं भारत की लंबे समय से चल रही कारगर कूटनीतिक रणनीतिक की भूमिका रही है... अमेरिका की एक और रणनीति इस मामले में सामने आई है, वह यह कि विश्व को अपना चौधरी बताने से नहीं अघाने वाला अमेरिका चीन के संदर्भ में यह जंचाने में सफल रहा कि अंतत: अब भी उसी की ही चल रही है... यह अलग विषय है कि भारत को अमेरिका के साथ चीन की तुलना में फिलहाल नजदीकियां बढ़ाकर रखनी होगी, साथ ही व्यापारिक मामलों एवं ईरान के मामले में अमेरिकी रुख का मजबूरी में समर्थन भी करना होगा...
भारत की बढ़ती धाक कहें या उसका प्रभाव कि संयुक्त राष्ट्र द्वारा मसूद वैश्विक प्रतिबंधित आतंकवादी घोषित होता है और संयुक्त राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद् की स्थायी सदस्यता के लिए भारत की पुरजोर दावेदारी एवं समर्थनकर्ता के रूप में फ्रांस उतरता है। फिलहाल फ्रांस के साथ ही चीन, अमेरिका, रूस और ब्रिटेन इसके स्थायी सदस्य हैं, यानी भारत की सदस्यता के लिए कोई स्थायी सदस्य पहली बार इस तरह से खुलकर पक्ष रख रहा है, यह भारत की कूटनीतिक विजय का दूसरा बड़ा उदाहरण है... कुल मिलाकर भारत ने जिस तरह से इन पांच वर्षों में अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की रीति-नीति का परिचय प्रधानमंत्री मोदी की यात्राओं के जरिए दिया... जिस तरह से अंतरराष्ट्रीय समुदाय एवं विदेशी भूमि पर निवासरत भारतीय समाज को विश्वास में लेकर आगे कदम बढ़ाया, उसी का नतीजा है कि आज चीन, अमेरिका, फ्रांस, जापान समेत सऊदी अरब से लेकर अन्य देश भारत के हितों एवं आतंकवाद को लेकर उसकी चिंताओं को गंभीरता से समझ रहे हैं और कारगर निर्णय भी ले रहे हैं...