रामलीला मैदान का मंथन...
   Date12-May-2019
शक्तिसिंह परमार
भारत का इंद्रप्रस्थ (दिल्ली) जो देखता, सुनता, समझता और निर्णय करता है...वही पूरे भारतवासियों की तासीर, तस्वीर बनकर सामने आता है...फिर इंद्रप्रस्थ स्थित रामलीला मैदान सिर्फ 'रामलीला मंचनÓ का ही साक्षी नहीं है...बल्कि 'राजनीतिक लीलाओंÓ के भी समय-समय पर दर्शन-मंथन का यह केंद्रबिंदु बन जाता है...और जब यहां से कोई संदेश निकलता है तो यह अपना लक्ष्य संधान करके ही रहता है...याद करें..? इसी रामलीला मैदान में संप्रग के समय में एक संन्यासी योगगुरु रामदेव को भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन के बदले तब की सत्ता के दमनचक्र का सामना करना पड़ा था...पुलिसिया बर्बर कार्रवाई के आगे बाबा को वेश बदलकर जान बचाना पड़ी थी...लेकिन उस अपमान का प्रतिकार उन्होंने संप्रग को सत्ता से बेदखल करने के रूप में रखा था...रामदेव ऐसा करके ही चैन से बैठे...अंतत: रामलीला मैदान में आंदोलनकारियों पर पुलिसिया बर्बर लाठियां बरसाने वाली कांग्रेस 2014 में 44 सीटों पर सिमट गई...2014 में मोदी ने इसी रामलीला मैदान से बदलाव का आह्वान किया था...और दिल्ली की 7 सीटों के साथ देशभर में भाजपा को ऐतिहासिक जनआशीर्वाद मिला था...
2014 से 2019 का लोकसभा चुनाव अनेक मामलों में भिन्न है...लोकसभा का संग्राम इस बार दो विचारधाराओं का वैचारिक समर बन चुका है...ऐसे में राजनीतिक धर्म-अधर्म के बीच की इस लड़ाई पर जन आह्वान के लिए रामलीला मैदान से बेहतर स्थल और क्या हो सकता है..? बुधवार को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने दिल्ली में इस लोकसभा चुनाव की पहली रैली की...दिल्ली के सातों लोकसभा प्रत्याशियों के पक्ष में दिल्लीवासियों से मतदान की अपील के साथ अपने उद्बोधन के जरिए उन्होंने देशवासियों से संवाद किया...रामलीला मैदान का यह वैचारिक मंथन जन-जन के मानस को मथने का शुभ अवसर भी बन गया है...
यह सत्य है कि चुनाव सरकार बनाने के लिए ही लड़े जाते हैं...और वे सरकारें कैसी रही होंगी और किस तरह की हैं.., इसी पर मतदाताओं का 'जनमतÓ चुनावी सभाओं, रैलियों, रोड-शो के जरिए तय होता है...प्रधानमंत्री ने इस विषय पर भारतीय राजनीति की पांच सरकारों के मॉडल देश के सामने रखे हैं...जो सिर्फ दिल्लीवासियों को ही आत्मविश्लेषण का मौका नहीं दे रहे..,बल्कि शेष दो चरणों में जिन राज्यों में वोटों की आहुतियां डाली जाएंगी, उन मतदाताओं के लिए भी यह मॉडल आत्ममंथन में सहायक सिद्ध होगा...प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि भारतीयों ने अभी तक देश में चार प्रकार की सरकारों के मॉडल देखे हैं...पहला: नामपंथी, दूसरा : वामपंथी, तीसरा : दाम और दमनपंथी, चौथा : विकासपंथी...इन्हीं मॉडल वाली सरकारों को देखा, सुना, समझा और स्वीकारा तथा नकारा भी..,लेकिन दिल्ली में ही पांचवें प्रकार की 'नाकामपंथीÓ सरकार का मॉडल भी जनता देख रही है...प्रधानमंत्री ने कितनी गंभीर बात सहज रूप से आम जनता के सामने रखी है कि-आप कैसी सरकार चाहते हैं..? इसका पैमाना तय करने का काम जनता के वोट की ताकत अर्थात 'जनादेशÓ से ही संभव है...इसलिए इन पांच प्रकार के मॉडल वाली सरकारों पर भी लोकतंत्र की वेदी पर चर्चा जरूरी है...
'नामपंथीÓ सरकार से तात्पर्य यह है कि जो वंशवाद को आगे बढ़ाकर नाम व परिवार के जरिए सत्ता का निरंतर दोहन करती रही...विकास जिसके सिर्फ नारों में झलकता है...न्याय की वह बात करती है..,लेकिन 70 के दशक से गरीबी हटाने का उसका लक्ष्य आज भी अधूरा है...और अब लोगों को 72 हजार की खैरात के जरिए गरीब से अमीर बनाने का लालच दिया जा रहा है...विचार किया जा सकता है कि नामपंथ अर्थात नामदार, परिवारवाद का यह राजनीतिक जुमला क्या अब भी भारतीय मतदाता स्वीकार करने की स्थिति में है..?
'वामपंथीÓ सरकार का वह मॉडल जिसे हमने साढ़े तीन दशक तक पश्चिम बंगाल में लाल हिंसा एवं अराजक शासन व्यवस्था के जरिए तार-तार होते देखा...केरल से लेकर अन्य राज्यों में जिसने सिर्फ हिंसा के बल पर ही अपनी सत्ता को बनाए रखकर भारतीय विचारों-कार्यों से लोगों को दूर करने की नीतियों को बड़े जतन से पाला-पोसा...क्या ऐसे वामपंथी पुन: किसी भी तरह की सत्ता में वापसी के हकदार हैं..?
'दाम-दमनपंथीÓ तृणमूल कांग्रेस ने वामपंथियों की हिंसा को पछाड़कर पश्चिम बंगाल में दो कार्यकाल में जो हिटलरशाही तौर-तरीके अपनाए, वह घोर निराशावादी हैं... ममता बनर्जी ने तुष्टिकरण की पराकाष्ठा पार की है...सत्ता का दाम यानी शारदा चिटफंड घोटाला और दमन के मायने हिन्दुओं को श्रीराम के नारे लगाने पर भी आंखें दिखाने वाला राजनीतिक खेल क्या राष्ट्र-राज्य हितैषी माना जा सकता है..?
'नाकामपंथीÓ दिल्ली में भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन खड़ा करके अंकुरित हुई अरविंद केजरीवाल की आआपा ने 'आम आदमीÓ की परिभाषा को ही लांछन लगा दिया...आज दिल्ली में अकर्मण्यता और काम न करके सिर्फ लोकलुभावन अराजक आंदोलन की राह पकडऩा, जिनका एक सूत्रीय कार्यक्रम हो..,वे क्या और कैसी सरकार चलाएंगे..? दिल्ली में हमने देखा है...दिल्ली को प्रदूषण से मुक्त करने के लिए 'सम-विषमÓ का खूब खेल खेला...लेकिन केंद्र की भाजपा सरकार ने ही स्टेटवे और वेस्टर्न पेरिफेरल हाईवे बनाकर दिल्ली को प्रतिदिन 50 हजार ट्रकों की आवाजाही से मुक्ति दिलाई...लेकिन केजरीवाल सरकार केंद्र की आयुष्मान योजना से गरीबों को पांच लाख का नि:शुल्क उपचार एवं 10 फीसदी आर्थिक आरक्षण का लाभ भी दिलाने में विफल रही...ऐसे में विचार किया जा सकता है कि आआपा का यह दूसरों को दोष देकर 'नाकामपंथीÓ सरकार का मॉडल भविष्य में क्या गुल खिलाएगा..?
'विकासपंथीÓ केंद्र की मोदी सरकार 'नया भारत निर्माणÓ में रत है...क्योंकि विकास ही उसका अंतिम ध्येय है...जब 50 करोड़ गरीब परिवारों यानी देश की आधी आबादी को 5 लाख तक का सालाना मुफ्त उपचार उपलब्ध हो रहा हो...6 करोड़ लोगों को नि:शुल्क रसोई गैस मिल चुकी हो...किसानों को वर्ष में 6 हजार नकद खाद-बीज के मिल रहे हों...क्या यह विकास की इबारत के जरिए नए भारत के निर्माण की मजबूत इमारत का प्रमाण नहीं है..? इसलिए जिस तरह के पांच मॉडल जनता-जनार्दन के सामने प्रधानमंत्री मोदी ने रखे हैं...उनकी नीतियों, कार्यों एवं विकास में योगदान मानस मंथन भी जनता-जनार्दन की जिम्मेदारी है...क्योंकि जब तक जनता यह तय नहीं करेगी कि उसे कौन से मॉडल वाली सरकार चाहिए..,तब तक रामलीला मैदान का मंथन लक्ष्य से दूर ही रहेगा...क्या देशवासी यही चाहते हैं..? क्योंकि इंतजार कीजिए लोकतंत्र के इस वैचारिक समर से आने वाले जनादेश के सिर्फ 12 दिन शेष...
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