विपक्ष की बैसाखी जातिवाद और मजहबी तुष्टिकरण
   Date11-May-2019
ओमप्रकाश पाण्डेय
दे श में लोकतंत्र और राष्ट्ररक्षा के असिधारा व्रत के निर्वाह हेतु संकल्पित भारतीय मतदाता सम्प्रति कठिन परीक्षा के दौर से गुजर रहा है। आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। वंशवादी, जातिवादी और मजहबी सीढिय़ों को थामकर सत्ता के शिखर पर आरूढ़ होने के लिए बेताब खुर्राट राजनीतिक खिलाड़ी लुभावने वायदों, नकली नारों और झूठे आरोपों का भ्रमजाल फैलाने में सम्पूर्ण निष्ठा से संलग्न हैं। प्रथम चक्र के चुनाव से ही गंभीर राजनीतिक विश्लेषक यह आंकलन कर चुके हैं कि इस बार पुन: भारतीय जनता पार्टी की विजय और श्री नरेन्द्र मोदी का पुन: प्रधानमंत्री पद पर आसीन होना प्राय: सुनिश्चित ही है। तथापि, अभी पूरी सावधानी अपेक्षित ही नहीं आवश्यक भी है। अपेक्षित ईमानदारी के अभाव में घोषणा-पत्र बहुधा एक मुखौटाभर रह जाता है। फिर भी उससे राजनीतिक दलों के मन्तव्यों की कुछ आहट तो मिल ही जाती है। भाजपा और कांग्रेस दोनों के घोषणा-पत्र अब सामने आ चुके हैं। इनके तुलनात्मक विवेचन से मतदाता अपने कर्तव्य का निर्णय भली भाँति कर सकता है।
सर्वप्रथम राष्ट्रीय सुरक्षा और देश की एकता तथा अखण्डता के सन्दर्भ में दोनों दलों के घोषणा-पत्रों की निष्पक्ष तुलना करने पर ज्ञात होता है कि कांग्रेस खुले तौर पर उन लोगों की सहायता के लिए आतुर है, जिन्होंने 'भारत, तेरे टुकड़े होंगे, इंशा अल्लाह, इंशा अल्लाहÓ, 'अफजल हम शर्मिन्दा हैं, तेरे कातिल जिन्दा हैंÓ, जैसे नारे जवाहरलाल नेहरू युनिवर्सिटी, नई दिल्ली के परिसर में खुलकर लगाये थे। इन पर राष्ट्रद्रोह (स्द्गस्रद्बह्लद्बशठ्ठ) का आरोप भी लगा है। कांग्रेस ने अपने घोषणा-पत्र (हम निभायेंगे) में यह वायदा किया है कि यदि वह चुनाव जीतकर सत्तानशीन हुई, तो राष्ट्रद्रोह के इस कानून को ही समाप्त कर देगी। सर्वविदित है कि राहुल गांधी राष्ट्रद्रोह के इन अभियुक्तों की पैरवी में प्रारम्भ से ही संलग्न हैं। यह निर्विवाद सत्य है कि कश्मीर की सुरक्षा स्वतंत्रता के तत्काल बाद से ही भारतीय सेना पूरे मनोयोग से कर रही है। वहाँ के अलगाववादी तत्वों पर यदि किसी का नियंत्रण है, तो वह है भारतीय सेना, जो अपने प्राणों को हथेली में लेकर आए दिन आतंकवादियों के साथ ही विघटनमूलक उन अन्य पक्षों से भी जूझ रही है, जो पाकिस्तान के इशारे पर काम करते हैं। सेना जब आतंकवादियों से मोर्चा लेती है, तो उसको बाधित करने के लिए पत्थरबाज सामने आ जाते हैं। इन सभी से निबटने के लिए सेना का संरक्षक केवल एक ही कानून है, जिसे 'आफस्पाÓ कहा जाता है। इसकी आवश्यकता सेना को तब पड़ती है, जब आतंकवादी आबादी वाले इलाके में छिपे हों और उनकी तलाशी आवश्यक हो, आरोपितों को गिरफ्तार किया जा सके और आवश्यकता पडऩे पर आत्मरक्षा में सेना शस्त्रास्त्र का प्रयोग कर सके। जम्मू-कश्मीर में यह कानून सन् 1960 से लागू है। कांग्रेस आरम्भ से ही जम्मू-कश्मीर के संरक्षण में प्रमाद करती रही है। आज वहाँ अलग प्रधानमंत्री की माँग की जा रही है- पहले भी 'दो निशान, दो प्रधान और दो विधानÓ जैसे नारे लगते रहे हैं। इसका दायित्व यदि किसी पर है, तो वह थे प्रथम प्रधानमंत्री नेहरू अब भी गुलाम नबी आजाद जैसे कांग्रेस के नेता भारतीय सेना पर यदा-कदा यह आरोप मढऩे में संकोच नहीं करते कि उसकी गोली से आतंकवादियों की कम और नागरिकों की ज्यादा मौत होती है। पाकिस्तान के पैसों पर पलने वाले राष्ट्रद्रोही तत्व 'आफ्स्पाÓ को हटाने की माँग जब-तब इस कारण करते रहते हैं, ताकि सेना मुस्तैदी से कश्मीर की सुरक्षा न कर सके। इनमें हुर्रियत सदृश अलगाववादियों के साथ नेशनल कांफ्रेंस और पी.डी.पी. जैसे राजनीतिक दल भी सम्मिलित हैं। अब राहुल गांधी की अध्यक्षता में कांग्रेस भी 'आफ्स्पाÓ के विरोध में खड़ी दिखती है, जिसने घोषणा-पत्र में यह वायदा भी कर दिया है कि सत्ता में आने पर वह 'आफ्स्पाÓ को हटा देगी। मतदाताओं को इस पर गंभीरता से विचार करना चाहिए कि कांग्रेस का यह वायदा देश के हित में है या उसके विरुद्ध? क्या 'आफ्स्पाÓ के हटने के बाद भारतीय सेना पूर्ववत् जिहादियों से जूझ सकेगी? क्या वह पत्थरबाजों से निबट सकेगी? क्या वह आबादी वाले इलाकों में छिपे आतंकवादियों की छानबीन कर सकेगी? सेना के वरिष्ठ अधिकारी और अन्य सुरक्षाबल 'हम निभायेंगेÓ के इस अंश से अत्यन्त चिन्ताग्रस्त हैं। सेना के मनोबल को घटाने वाले कांग्रेसी घोषणा-पत्र का एक अन्य महत्वपूर्ण बिन्दु यह है कि सत्ता में आने पर कांग्रेस कश्मीर घाटी में सैनिकों की संख्या भी कम कर देगी। इस सन्दर्भ में अब तक का अनुभव यही है कि कश्मीर घाटी के अनन्तनाग, त्राल और पुलवामा जैसे जिन क्षेत्रों में सैनिकों की संख्या कम की गई, उनमें जिहादी और आतंकवादी घटनाएँ स्वत: बढ़ गई। बुरहान बानी जैसा दुर्दान्त आतंकवादी भी उसी क्षेत्र का था, जहाँ सेना का परिमाण कम किया गया था। सेना का मनोबल बढ़ाने के स्थान पर, कांग्रेसी घोषणा-पत्र में, इनके अतिरिक्त भी अनेक ऐसे वायदे किए गए हैं, जो सेना के मनोबल को क्षीण करने वाले ही हैं। उदाहरण के लिए, सम्प्रति, किसी सैन्यकर्मी के विरुद्ध अभियोजन करने से पूर्व सरकार से स्वीकृति लेनी पड़ती है, लेकिन कांग्रेस ने अपने घोषणा-पत्र में वचन दिया है कि कुछ प्रकरणों में सैनिकों के विरुद्ध बिना अनुमति के ही अभियोग चलाया जा सकेगा। निश्चित ही ऐसे प्रकरण अधिकांशत: फर्जी होंगे, जिनमें अलगाववादी उन सैन्यकर्मियों पर, जो घरों में तलाशी लेने या आतंकवादियों की धरपकड़ करने गए होंगे, महिलाओं से दुव्र्यवहार या चोरी जैसे आरोप सरलता से लगा सकते हैं। अब भी यही हो रहा है। इस स्थिति में फंसे किसी सैन्यकर्मी की यंत्रणा अकल्पनीय ही है। क्या इस दु:स्थिति में कोई सेनाधिकारी या सामन्य सैनिक अपने कर्तव्य का पालन कर सकेगा? कांग्रेस के इस घोषणा-पत्र में 25-30 वर्षों से बुरी तरह उत्पीडि़त और विस्थापित लाखों कश्मीरी पण्डितों की रत्ती भर भी चिन्ता नहीं की गई है, जिनके बहुसंख्यक स्वजनों की घाटी में निर्ममता से हत्या कर दी गई और जो बच गए, वे आज भी इधर-उधर दीन-हीन, अनिकेत शरणार्थी के रूप में पड़े हैं। इसके विपरीत घोषणा-पत्र में प्रगाढ़ प्रेम प्रदर्शित किया गया है राष्ट्र विरोधी अलगाववादियों से। इनसे बिना शर्त बातचीत का वायदा किया गया है। 'हम निभायेंगेÓ में राष्ट्रद्रोहियों, नक्सलियों और अलगाववादियों के लिए सबसे बड़ी खुशखबरी यह है कि उन्हें जमानत देना एक नियम होगा। किसी अपराधी की अपवादस्वरूप ही जमानत नहीं होगी। यह आंकलन सरलता से किया जा सकता है कि राष्ट्रीय सुरक्षा को संकट में डालकर भी, कांग्रेस के लिए चुनाव जीतना और सत्ता हासिल करना ही एकमात्र लक्ष्य है। (शेष भाग सोमवार के अंक में)