जीवन में सफलता के स्वर्णिम सूत्र
   Date11-May-2019
धर्मधारा
जी वन में लक्ष्य निर्धारण के बाद भी जब सफलता नहीं मिल पाती तो व्यक्ति में निराशा एवं कुंठा के भाव पनपने लगते हैं, जो कि स्वाभाविक है। ऐसे में हमें थोड़ा गहराई में उतरकर आत्मनिरीक्षण करने की आवश्यकता है कि हम सफलता के लिए आवश्यक ऐसे किन कारकों को नजरअंदाज कर रहे हैं, जिनके अभाव में हम सफलता के समीप होते हुए भी इससे वंचित रह गए। प्रस्तुत हैं ऐसे ही कुछ महत्वपूर्ण कारक, जिनके प्रकाश में हम आत्मसमीक्षा कर सकते हैं।
सोच की समग्रता का आशय ऐसे जीवन लक्ष्य से है, जिसकी वर्तमान प्रासंगिकता और भावी उपयोगिता स्पष्ट हो। साथ ही यह भी ज्ञात हो कि क्या यह सोच हमारे व्यक्तित्व, हमारी अभिरुचि, योग्यता से भी मेल खाती है या नहीं। कहीं हम बिना आंतरिक मूल्यांकन किए बिना किसी आवश्यक तैयारी के कार्य करने तो नहीं जुट पड़े हैं। अपना सही मूल्यांकन सदा आवश्यक है। इसी पर आधारित प्रयास सफलता की मंजिल तक पहुँच पाते हैं। कल्पना स्वयं में एक शक्ति है, जिसे हम प्राय: नजरअंदाज किए रहते हैं। स्वयं पर संदेह एवं लक्ष्य के प्रति स्पष्ट दृष्टि न होने के कारण हम निरर्थक कल्पनाओं के जंजाल में उलझ जाते हैं और इस शक्ति का दुरुपयोग अधिक करते हैं। यदि इसका हम सही उपयोग करना सीख लें, तो यह हमारे लिए वरदान सिद्ध हो सकती है। हम जैसी कल्पना करते हैं, वैसा ही वास्तविकता में परिणत होने लगता है। कल्पना के अनुरूप हमारे विचार ढलते जाते हैं, उसी दिशा में क्रिया शुरू हो जाती है और देर-सवेर कल्पित सत्य घटित भी होने लगता है। जितनी भी महान खोजें, आविष्कार, उपलब्धियाँ आज हमें सामाजिक परिदृश्य में दिखाई पड़ते हैं, वे सब किसी भविष्यद्रष्टा के मन से उपजे कल्पना बीज के ही परिणाम रहे हैं।
कल्पना के साथ ज्वलंत इच्छाशक्ति का होना भी आवश्यक है। मात्र कल्पना की उड़ान भरने से बात बनने वाली नहीं है। ऐसे में शेखचिल्ली के दिवा स्वप्न और मुंगेरीलाल के हसीन सपनों की तरह ही काल्पनिक स्वप्न तक सफलता का अस्तित्व भी सीमित रहेगा। यथार्थ के कठोर धरातल का सामना करते ही ये चकनाचूर हो जाएंगे और इनका कोई अस्तित्व नहीं दिखेगा। इच्छाशक्ति के जुडऩे के साथ कल्पना के पंख उड़ान भरने लगते हैं और यह प्रचंड पुरुषार्थ के साथ धरातल पर उतरकर मूर्त रूप लेती है, तब हमारे स्वप्न स्वयं ही साकार होने लगते हैं।