आत्मशोधन जरूरी
   Date11-May-2019
प्रेरणादीप
विं ध्याचल पर्वत पर दो चींटियाँ रहती थीं, एक उत्तरी चोटी पर, दूसरी दक्षिणी चोटी पर। एक का घर शक्कर की खान में था, दूसरी नमक की खान में रहती थी। एक दिन शक्कर की खान वाली चींटी ने दूसरी चींटी को निमंत्रण दिया-'बहन! कहाँ इस नमक की खान में पड़ी हो, मेरे यहाँ चलो, वहाँ शक्कर ही शक्कर है। खाकर मुँह मीठा करो और अपना जीवन सफल करो।Ó
दूसरी चींटी ने निमंत्रण स्वीकार कर लिया। बड़े सवेरे नहा-धोकर पहली चींटी के घर जा पहुँची। चींटी ने उसे घूम-घूमकर शक्कर की खान दिखाई और कहा-'बहन! जी चाहे जितनी शक्कर खाओ, यहाँ किसी बात की कमी नहीं है।Ó चींटी दिनभर इधर-उधर भागती फिरी और शाम को पहली चींटी से यह कहकर चली गई-बहन! तुमने मुझे बड़ा धोखा दिया। यदि शक्कर तुम्हारे पास न थी, तो मुझे निमंत्रण ही क्यों दिया?Ó
पास ही एक कुटिया में संत और उनका शिष्य निवास करते थे। शिष्य ने पूछा-'गुरुदेव! शक्कर की खान में घूमने पर भी चींटी को शक्कर का पता क्यों न चला?Ó संत बोले- 'बात यह थी वत्स कि चींटी अपने मुँह में नमक का टुकड़ा दाबे हुए थी, इसी से उसे मिठास का आभास नहीं हो पाया। इसी प्रकार जो लोग अपने पुराने संस्कार नहीं बदलते, आत्मशोधन द्वारा अपनी बुराइयाँ नहीं हटाते, परमात्मा के समीप होते हुए भी उसकी कृपा से वंचित रह जाते हैं। नया पाने के लिए पुराने को हटाने का नियम अनिवार्य और अटल है।Ó