सफलता के लिए जरूरी है समूह भावना
   Date10-May-2019
धर्मधारा
टी म वर्क यानी दो से अधिक व्यक्तियों द्वारा एक ही दिशा में, एक ही उद्देश्य को लेकर मिलकर कार्य करने की भावना। प्रबंधन की भाषा में कहा जाए तो एक जुझारू नेतृत्वकर्ता अपने दम पर कमजोर टीम को कामयाब नहीं बना सकता, लेकिन चुनिंदा क्षमतावान, प्रतिबद्ध, उत्साही एवं व्यक्तिगत उपलब्धियों की भावना से परे लोग एक साधारण नेतृत्वकर्ता की अगुआई में भी किसी टीम को विजेता बना सकते हैं। लगातार अच्छे प्रदर्शन के लिए टीम की ताकत को समझते हुए उसे निरंतर प्रोत्साहित करने की जरूरत होती है। संगठनों की बात यदि की जाए तो ऐसा देखा जाता है कि कुछ संगठन आरंभ में अपनी उत्पादकता से एक के बाद एक इतिहास रचते हैं, लेकिन बाद में वे ही संगठन कामयाबी की एक सीमा के बाद उससे ऊपर नहीं उठ पाते और उसी स्तर तक रह जाते हैं। इसके पीछे का कारण यह है-टीम की ताकत को नजरअंदाज करना, नेतृत्वकर्ता द्वारा अपनी उपलब्धियों पर आत्ममुग्ध होना और इसके लिए किसी और को श्रेय न देने की भावना होना, आदि। यही कारण है कि शुरुआत में जोरदार प्रदर्शन करने वाली टीम बाद में बिखर जाती है और फिर उसकी जगह जो लोग आते हैं, वो उनके समान कार्य का प्रदर्शन करने में सफल नहीं हो पाते। अतिआत्मविश्वासी नेता को या तो यह बात समझ में नहीं आती या फिर जब समझ में आती है, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। आज यह विडंबना ही है कि कई नेता यही समझते हैं। कि टीम के किसी भी प्रदर्शन के पीछे वे ही हैं, जबकि वास्तविकता इसके विपरीत है। अगर टीम प्रेरित और उत्साही होने के बजाय आत्मकेंद्रित और उदासीन है, तो ऐसी टीम के साथ कोई भी महत्त्वाकांक्षी अभियान पूरा कर पाना संभव नहीं हो पाता। अगर कोई नेता यह समझता है कि उसकी टीम में कोई व्यक्ति कार्य करे या न करे, वह खुद इतना सक्षम है कि किसी भी अभियान को अपने दम पर आगे ले जा सकता है, तो यह उसकी भूल ही कही जाएगी।
वास्तव में अपनी कर्मठता और जुझारूपन की वजह से । कामयाबी के एक चरण तक तो पहुँचा जा सकता है, लेकिन निरंतर कामयाबी पाने और आगे जाने के लिए टीम का सहयोग मिलना बेहद जरूरी हो जाता है।
टीम का समुचित साथ न मिलने पर अकेले दम पर चलते-चलते अंतत: नेतृत्वकर्ता का उत्साह भी कम हो सकता है, जबकि कर्मठ टीम का सदस्य होने पर हर अभियान को उत्साह के साथ पूरा किया जा सकता है। कोई भी टीम अपने आप मजबूत नहीं बन जाती। टीम की मजबूती के लिए टीम के हर सदस्य के भीतर एक दूसरे के प्रति सहयोग और आत्मीयता की भावना होने के अलावा हरेक को उत्साहित बनाए रखना भी बेहद जरूरी होता है। और इसके लिए एक अच्छे नेतृत्वकर्ता की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। प्राचीन एवं मध्ययुग में युद्धों के दौरान सेनापति की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती थी। सेनापति ही अपनी टीम के सदस्यों में उत्साह भरता था और योजनाओं के अनुरूप युद्ध करता था। सेनापति की बेहतर योजनाओं और युद्ध में भाग लेने वाली उसकी सेना की कुशलता के बल पर ही युद्ध जीता जाता था