परलोक का सुख
   Date10-May-2019
प्रेरणादीप
य दि लोक में रहते हुए परलोक की चिंता होती रहे तो परमार्थ स्वत: संपादित होने लगता है। एक ऋषि अपनी भक्तमंडली को एक कथा कहकर लोक-परलोक के विषय में बतला रहे थे। कथा इस प्रकार थी कि एक देश का यह रिवाज था कि जो राजा वहाँ चुन लिया जाता था, उसे मात्र पाँच वर्ष राज्य करने दिया जाता। इसके बाद उसे ऐसे निर्जन द्वीप में उतार दिया जाता, जिसमें निर्वाह के कोई साधन न थे। बेचारा भूखा-प्यासा दम तोड़ता।
अनेक राजा इसी प्रकार दुर्गति को प्राप्त होते रहे। एक बार एक बुद्धिमान राजा की गद्दी पर बैठने की बारी आई। उसने पता लगाया कि पाँच वर्ष बाद किस द्वीप में जाना पड़ सकता है। अगले ही दिन उसने वहाँ पर अनेकानेक सुविधाएँ उत्पन्न करने की आज्ञा दे दी। पाँच वर्ष की अवधि में वह द्वीप सुविधासंपन्न क्षेत्र में बदल गया। नियत समय पर राजा को वहाँ जाने में और बसने में कोई कठिनाई नहीं पड़ी। इस कहानी का आशय समझाते हुए ऋषि ने कहा- 'परलोक ही वह द्वीप है, जहाँ हर किसी को जाना पड़ता है। वहाँ सुविधा उत्पन्न करने वाला परमार्थ कमाया जाता रहे तो जीवन के उपरांत भी सुख-शांति की कोई कमी नहीं, रहेगी।Ó