जूता-प्याज को दोहराती कांग्रेस...
   Date10-May-2019
शक्तिसिंह परमार
भारतीय राजनीति में बयानों, दावों और वादों को लेकर किस तरह से नेता पलटी मार जाते हैं..,बयान को तोड़-मरोड़कर पेश करने का आरोप लगाते हैं...और यह कहने से भी नहीं चूकते कि मेरे द्वारा व्यक्त विचार के भावों को छापने-दिखाने वाले ने समझा ही नहीं...यानी अपने कहे से पलट जाने वाली राजनीति के अनेक उदाहरण हमारे यहां मौजूद हैं...फिर चाहे उन्हें इसके लिए राष्ट्रहित को दांव पर लगाना पड़े...सेना या न्यायालय को भी विवादों में घसीटना पड़े...संवैधानिक पद की गरिमा को तार-तार करने में भी उन्हें कोई शर्म महसूस नहीं होती...नारी के अपमान को भी वे अपने बचाव में कुतर्कों से ढंकने का कोई मौका नहीं गंवाते...और जरूरत पड़े तो जरूरतमंदों, वंचितों, शोषितों यहां तक कि दिव्यांगों के हकों-अधिकारों पर डाका डालकर भी उसे विकास से जोड़कर नई फितरती राजनीति को आगे बढ़ाने से जब न चूके, तब ऐसे राजनीति 'विकास और निर्माणÓ के बजाय विनाश और विध्वंस का ही रुख अख्तियार करती नजर आती है...कहने का तात्पर्य यही है कि जब व्यक्ति अपनी गलती को भी बेशर्मों की भांति स्वीकार करे और उसे बार-बार दोहराए, तब ऐसी राजनीति का मकसद/मंशा क्या होगी..,विचार किया जा सकता है...क्योंकि लोकसभा चुनाव के इस वैचारिक समर में ऐसे नजारे आएदिन देखने को मिल रहे हैं...
लोकसभा चुनाव के समर में उतरने के पूर्व देश की राजनीति को पुलवामा का आतंकवादी हमला नया रंग दे गया था...जी हां, राष्ट्रनिष्ठा ही इसका प्रथम व अंतिम ध्येय बन चुका था...इसके बाद जिस तरह से सेना व सरकार ने इस हमले से जुड़े लोगों को घेरा, वह जन-जन को 'राष्ट्र प्रथमÓ के भाव से ओतप्रोत कर गया...यानी मोदी सरकार के लिए पहले म्यांमार में विदेशी धरती पर नक्सली माओवाद के खिलाफ सैन्य कार्रवाई..,फिर सर्जिकल स्ट्राइक और इसके बाद एयर स्ट्राइक, ये ऐसी तीन महत्वपूर्ण सैन्य उपलब्धियां हैं...जो देश की सुरक्षा के लिए हर स्तर पर जाकर आतंकवाद के खिलाफ करारा जवाब देने का निमित्त बनीं...उसी दौर में भारतीय राजनीति में एक ऐसा धड़ा भी उठ खड़ा हुआ, जो सेना के साहस (एयर स्ट्राइक) की तो प्रशंसा कर रहा था..,लेकिन मोदी सरकार को घेरने से नहीं चूक रहा था...जब सेना ने सही किया, तब उसमें मारे गए आतंकियों की संख्या मोदी सरकार या भाजपाइयों से क्यों पूछी जा रही है..? और जब मरने वाले आतंकियों की संख्या मोदी सरकार से पूछी जा रही है तो एयर स्ट्राइक का श्रेय उसे देने में कंजूसी क्यों..? कुल मिलाकर गिरोह बनाकर सामने आया विपक्ष एयर स्ट्राइक के मामले में असमंजस में था, असमंजस में है और असमंजस में रहेगा...क्योंकि विपक्ष देश की सुरक्षा, सैन्य कार्रवाई और सरकार के साहसिक निर्णय के इस खेल में सांप-छछुंदर की भांति घिर चुका है...
लोकसभा चुनाव में जब विपक्षी दलों विशेष रूप से कांग्रेस नेताओं को लगा कि पहले तीन-चार चरणों में भाजपा को देश की सुरक्षा एवं आतंकवाद को मुंहतोड़ जवाब देने की रणनीति का पूरा लाभ मिला रहा है तो पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने दोहराया कि सर्जिकल व एयर स्ट्राइक जैसी कार्रवाई संप्रग के समय में भी हुई है...हमने भी सेना को विदेशी हरकतों का मुंहतोड़ जवाब देने की छूट दे रखी थी...एक पूर्व प्रधानमंत्री का यहां तक दावा तो राजनीतिक मायने में भी जायज है..,लेकिन जब भाजपा के पूर्व मंत्री राजीव शुक्ला पत्रकारवार्ता लेकर यह गिनाने लगे कि संप्रग के समय में भी छह बार सर्जिकल स्ट्राइक हुई..,तो यह पचने जैसा नहीं था...क्योंकि अगर छह बार हुई थी तो जब पहली बार मोदी सरकार ने इस बात का उल्लेख किया, तभी उसे क्यों नहीं गिनाया..? और जब एयर स्ट्राइक हो चुकी है और उसको लेकर कांग्रेसी एवं विपक्षी नेता प्रमाण मांग रहे हैं, तब आपको छह बार की सर्जिकल स्ट्राइक का हवाला क्यों देना पड़ रहा है..? हालांकि सूचना के अधिकार के तहत रक्षा मंत्रालय यह स्पष्ट कर चुका है कि 29 सितंबर 2016 से पहले सर्जिकल स्ट्राइक होने की कोई जानकारी नहीं है...क्या भारतीय सेना का यह दावा भी कांग्रेस के झूठ का पर्दाफाश नहीं कर रहा है..? अगर ऐसे में प्रधानमंत्री मोदी चुनावी सभा में चुटकी लेकर यह कहते हैं कि- एयरकंडीशनर कमरों में बैठे कांग्रेस के नेताओं को अभी भी वीडियो गेम का शौक चर्राया हुआ है.., तो उसमें गलत क्या है..?
अब इतालवी की उस एजेंसी के खुलासे पर भी क्या कांग्रेस सवाल उठाएगी..,जिसमें दावा किया गया है कि बालाकोट एयर स्ट्राइक में 170 आतंकवादी मारे गए और इतनों का उपचार चल रहा है...विदेशी एजेंसियों, मीडिया रिपोर्टों पर विश्वास न करना कांग्रेस की राजनीतिक मजबूरी को समझने का पर्याप्त आधार है..,लेकिन सेना की स्वीकारोक्ति को भी अगर कांग्रेस रह-रहकर नजरअंदाज करेगी तो क्या यह सेना व सैन्य साहस का अपमान नहीं है..? अब अगर पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदरसिंह यह दावा कर रहे हैं कि- सेना में उनके रहते 600 बार इस तरह की सर्जिकल स्ट्राइक हुई..,तो क्या यह खुले रूप से जुमला और सेना को हंसी का पात्र बनाने का दावा नहीं है..? अगर कांग्रेसी नेता और उनके राजकुमार अपने कहे पर एक-दो दिन भी अडिग रहे तो उनके बयानों, तर्कों, साक्ष्यों, संदर्भों पर सरकार ही नहीं, जनता भी गौर फरमाए...लेकिन जब आप सुबह जो कहते हैं, उससे शाम को पलट जाते हैं...और पलटते ही नहीं, बार-बार अपनी ही मूर्खताओं को दोहराने-छुपाने के लिए बयानी चालबाजियां करते हैं...तब इससे नुकसान किसका हो रहा है..? यह आकलन तो कांग्रेस को ही करना होगा.., क्योंकि राफेल मामले में चौकीदार चोर के नारों की गूंज में मदहोश होकर जिस तरह से राहुल गांधी ने सर्वोच्च न्यायमंदिर की अवमानना की और फिर रह-रहकर खेद जताया, माफी मांगी और फिर लिखित माफी मांगकर अपने को गलत सिद्ध किया...क्या यह कांग्रेस की उस राजनीतिक शैली का उदाहरण नहीं है, जिसमें वह 'जूता-प्याजÓ खाने की कहावत को चरितार्थ करती नजर आती है...यह सिर्फ राफेल के मामले में ही नहीं हुआ..,सेना के साहस, अपने घोषणा-पत्र के दावों और अनिल अंबानी पर लगाए गए आरोपों के साथ ही अपने अमेठी, वायनाड के घोषणा-पत्रों की आधी-अधूरी जानकारी से भी सिद्ध हो चुका है कि कुछ तो गंभीर है...जिसे आप लुकाछिपी के जरिए जनता से दूर रखना चाहते हैं...लेकिन बार-बार गलती करना और गलती करके प्रायश्चित के रूप में जूते-प्याज की कहावत को दोहराने का यह राजनीतिक सिलसिला न केवल राहुल गांधी की राजनीति का अवसान सिद्ध होगा..,बल्कि कांग्रेस को भी पूर्णत: रसातल में ले जाने का कारण बनेगा.., जनमानस इसके लिए तैयार है...क्योंकि इंतजार कीजिए लोकतंत्र के इस वैचारिक समर से आने वाले जनादेश के सिर्फ 14 दिन शेष... - श्चड्डह्म्द्वड्डह्म्ह्यद्धड्डद्मह्लद्ब८०ञ्चद्दद्वड्डद्बद्य.ष्शद्व