चुनाव आयोग को दंड प्रक्रिया संहिता की दरकार
   Date10-May-2019
वि.के. डांगे
व र्तमान चुनाव में चुनाव आयोग विशेष सक्रिय दिख रहा है, जिस तरह कुछ प्रत्याशी आपत्तिजनक वक्तव्य दे रहे हैं, उसे देखते हुए आयोग द्वारा उन्हें चेतावनी स्वरूप दंड दिया जा रहा है, यह तो उचित है, परन्तु एक बात यह भी है कि किस भाषा/शब्दों के प्रयोग के लिए कौन सा दंड दिया जाए। न्यायालय के पास अपराधिक प्रकरणों के लिए दंड प्रक्रिया संहिता व दंड संहिता होती है- इन्हीं के आधार पर न्यायालय निर्णय देता है। अब प्रश्न है कि क्या चुनाव आयोग के पास प्रत्याशियों के विरुद्ध कदम उठाने के संबंध में प्रक्रिया संहिता व दंड संहिता है क्या?
नवीनतम जानकारी के अनुसार ऐसी कोई विगतवार प्रक्रिया संहिता या दंड संहिता नहीं है, जिसके आधारपर न्यायालय में होने वाली बहस जैसे बाल की खाल निकालकर बहस होती हो। ऐसी विचित्र स्थिति में आयोग की स्थिति असहज हो जाती है, वह समझ नहीं पाता कि किस प्रत्याशी को कौन सा व कितना दंड/चेतावनी दे। उदा. किसी अभद्र/अश्लील टिप्पणी के लिए एक प्रत्याशी आजम खान पर आयोग ने 48 घंटे तक प्रचार न करने का प्रतिबंध लगाया, परन्तु बाबरी मस्जिद ढांचा गिराने वालों पर मुझे गर्व है- इस प्रज्ञा ठाकुर की अभिव्यक्ति पर उस पर 72 घंटे का प्रचार न करने का प्रतिबंध लगाया गया, यह अंतर क्यों?
भारत विविधताओं का देश है, व भारतीय इतिहास में ऐसी कई घटनाएं हुई है, जिनकी व्याख्या हर व्यक्ति ही नहीं विद्वान भी भिन्न तरह से करते हैं। बाबरी मस्जिद का प्रकरण बाबर से भी पुराना है- संदर्भित मंदिर ई.पू. 150 में पहली बार विदेशी आक्रांता द्वारा टूटकर फिर बना (संदर्भ मिनांदर का आक्रमण ई.पू. 150), फिर मोहम्मद गौरी के भांजे/भतीजे सालार मसूज (13वीं शताब्दि) द्वारा तोड़ा जाकर फिर बना, फिर बाबर के सेनापति मीर बाकी द्वारा (1530 अनु.) तोड़ा गया व मस्जिद बनाई, जिसके बाहर हिन्दुओं ने चबूतरा बनाकर रामलला की पूजा करना चालू किया, इस चबूतरे को भी औरंगजेब ने तुड़वा दिया। कुल मिलाकर हिन्दुओं के लिए नाश व अपमान की कहानी ही यह प्रकरण है- इस अपमान को दूर करने का अधिकार क्या किसी को भी नहीं है? यह प्रश्न आयोग स्वयं को पूछे तो प्रज्ञा ठाकुर के वक्तव्य का समर्थन स्वयं हो जाता है। आयोग को मात्र कानून नहीं राम भक्तों की भावना का भी विचार करना था।
भारतीय इतिहास में कई घटनाएं ऐसी है, जिन पर किसी को गर्व या शर्म है या कोई तटस्थ है या भूल भी गया है, परन्तु जहां पूरे समाज का प्रश्न आता है, तो घटना पर सोचा जाता है। उदा. शिवाजी द्वारा अफजल खान के वध को कई भारतीय असामान्य शौर्य व गर्व करने की घटना मानते हैं, जबकि उसे कुछ लोग हत्या ही मानते हैं। किसी जुलूस में इस घटना को प्रदर्शित करने वाला आदम कद चित्र था, जिस पर कुछ लोगों ने आपत्ति की। इस पर यह चित्र हटाने का आदेश हुआ, तब चित्र के प्रदर्शकों ने कहा - क्या अब शासन इतिहास को भी निरस्त करेगा? जबकि ऐसे चित्र पाठ्य पुस्तकों व शिवाजी संबंधी पुस्तकों में खूब मिलते हैं।
दूसरी घटना और भी मनोरंजक है। सिंधिया घराने के दो पुरुषों की हत्या के लिए, नजीब खां रूहेला जिम्मेदार था। जब ये दो पुरुष निहत्थे थे, तब सारी नैतिकता ताक में रखकर उसने हत्या करवाई। सिंधिया घराने के एक मात्र वारिस महादजी सिंधिया इसका बदला लेना चाहते थे, परन्तु उनके दुर्भाग्य से नजीब खां की जल्द ही मृत्यु हो गई। परन्तु महादजी सिंधिया की बदलेगी आग तब शांत हुई, जब उन्होंने रूहेलो को पराजित किया। रूहेलखंड पर राज्य किया (1770-1802)। विशेष यह कि उन्होंने नजीब खां की कब्र को उखड़वाकर हड्डियों के अंजर-पंजर, इधर-उधर मिट्टी में बिखेर दिए।
यदि इस घटना पर कोई गर्व प्रगट करता है तो क्या चुनाव आयोग इसका संज्ञान लेगा? आखिर नजीब खां कोई सज्जन व्यक्ति तो नहीं कहा जा सकता, क्योंकि उसने आक्रांता अहमद शाह अब्दाली को भारत पर आक्रमण करने के लिए बुलाया था (1759-60)।
मुख्य बात यह है कि समय व समाज की घटना के प्रति मान्यता व प्राकृतिक न्याय क्या है। भारत की स्वतंत्रता के लिए जो फांसी पर चढ़े, उन्हें सम्मानित करने पर अंग्रेजों को आपत्ति थी, उन शहीदों के चित्र भी बनाना/दिखाना, मना था, क्या आज भी यही स्थिति चुनाव आयोग के अनुसार होना चाहिए?
अभी किसी चुनाव प्रत्याशी को समय नहीं है कि चुनाव आयोग से वह कानूनी लड़ाई में उलझे, क्योंकि प्रत्याशियों का ध्यान तो चुनावी लड़ाई में लगा है। परन्तु चुनाव समाप्त होने पर चुनाव का हिसाब देने के साथ संभव है कि प्रत्याशीगण चुनाव आयोग को कानूनी चुनौती देकर बताए कि किस स्थिति में चुनाव आयोग ने उनके प्रति क्या किया? जिस देश में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की न्यायिक जांच हो सकती है, वहां चुनाव आयोग भी कानूनी चुनौती से ऊपर नहीं। चुनाव आयोग ने सेना व पुलिस पर कुछ भी बोलना प्रत्याशियों के लिए प्रतिबंधित कर दिया है। ऐसा क्यों किया, इसका उत्तर चुनाव आयोग को कभी न कभी देना ही होगा। सेना व पुलिस अपनी मर्जी से कार्य नहीं करते, वे शासन की आज्ञा से काम करते हैं। ऐसी स्थिति में सेना व पुलिस की सफलता/असफलता, कीर्ति/अपकीर्ति के लिए शासन व शासकीय पार्टी भी जिम्मेदार है, इसके संबंध में हर राजकीय पक्ष तो बोलेगा ही। 1971 के बंगला देश युद्ध, 1999 के कारगिल युद्ध 1965 के भारत-पाक युद्ध इनके बाद भी तो भारत में चुनाव हुए थे, पर उन चुनावों में चुनाव आयोग ने किसी को सेना के विषय में बोलने से प्रतिबंधित नहीं किया था, फिर आज ही ऐसा क्यों? चुनाव आयोग यह जाने कि द्वितीय विश्व युद्ध (1939-45) में भी ब्रिटिश संसद में ब्रिटिश सेना के मामलों में तीखी व खुली बहस होती थी, युद्ध समाप्ति पश्चात जो संसदीय चुनाव वहां हुए, उनमें भी सेना पर बहस न करने की बात वहां के चुनाव व्यवस्था ने नहीं की। फिर भी हमारा चुनाव आयोग यदि अपनी बात पर कायम है तो फिर क्यों न शासन के हर विभाग के विषय में अनुकूल/प्रतिकूल टिप्पणी या प्रशंसा/निंदा पर प्रतिबंध लगाया जाए? यदि ऐसा हुआ तो चुनाव संहिता एक कवायद की पुस्तिका व चुनाव एक रस्मी परेड से अधिक कुछ नहीं होकर एक अनिवार्य औपचारिकता से अधिक कुछ नहीं होगा।