राष्ट्राभिमान
   Date26-Apr-2019

 
बात सन् 1942 की है। उन दिनों पूरा देश महात्मा गांधी के आह्वान पर 'करो या मरोÓ की भावना को लेकर आंदोलन कर रहा था। ऐसे समय में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के कुलपति थे डॉ. अमरनाथ झा। विश्वविद्यालय में दीक्षान्त समारोह होने वाला था। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में उत्तर प्रदेश के तत्कालीन गवर्नर विलियम को बुलाया गया था। नियत समय पर दीक्षान्त समारोह शुरू हुआ। गवर्नर विलियम ने आसन ग्रहण किया ही था कि उसकी नजर सामने फहराये तिरंगे पर गई। यह देखकर वह क्रोध से तमतमा उठा। वह गरजते हुए बोले- 'ये मेरा अपमान है। मेरी सरकार को सीधे-सीधे चुनौती है। यदि आप लोग चाहते हैं कि समारोह भली भांति चलता रहे तो दूर हटाइये इस तिरंगे को मेरी नजरों के सामने से।Ó यह सुनकर डॉ. झा ने शांत स्वर में उत्तर दिया- 'मान्यवर, यह इस देश का झण्डा है। यदि हमारे यहाँ नहीं फहराएगा तो कहाँ फहराएगा? रही बात इसे हटाने की तो एक बार जहाँ तिरंगा फहरा दिया, उसे वहां से कोई भी हटा नहीं सकता। उनका स्वाभिमानपूर्ण उत्तर सुनकर गवर्नर जल-भुन गया और क्रोध से पैर पटकता हुआ समारोह के बीच में ही उठकर चला गया। डा. झा ने उन्हें दरवाजे तक आदर पूर्वक छोड़ा और फिर पूरा कार्यक्रम अच्छी तरह सम्पन्न करवाया।