समाधान की सीख
   Date18-Apr-2019
प्रेरणादीप
रा यगढ़ के राजा धीरज के अनेक शत्रु हो गए। एक रात शत्रुओं ने पहरेदारों को अपने साथ मिला लिया और महल में जाकर राजा को दवा सुंघाकर बेहोश कर दिया। इसके बाद उन्होंने राजा के हाथ-पाँव बाँधकर एक पहाड़ की गुफा में ले जाकर उन्हें बंद कर दिया। राजा को जब होश आया, तो वे अपनी दशा देखकर घबरा उठे। उस अँधेरी गुफा में उनसे कुछ करते-धरते न बना। तभी उन्हें अपनी माँ का बताया हुआ एक सिद्धांत याद आया-किसी भी परिस्थिति में घबराए बगैर कुछ करने का प्रयत्न करना चाहिए। राजा की निराशा दूर हो गई और उन्होंने पूरी शक्ति लगाकर अपने हाथ-पाँव के बंधन तोड़ डाले। तभी अँधेरे में उनका पैर साँप पर पड़ गया, जिसने उन्हें काट लिया। राजा फिर घबराए, परंतु उन्हें उनकी माँ की दी हुई सीख पुन: याद आई। उन्होंने तत्काल कमर से कटार निकालकर साँप के काटे हुए स्थान पर चीरा लगा दिया। खून की धार बहने से वे घबरा उठे, परंतु उन्हें फिर वह सिद्धांत याद आया। उन्होंने अपनी सारी शक्ति को एकत्रित कर अपना उत्तरीय फाड़ा और घाव पर बाँध दिया। रक्त का बहना बंद हो गया। इतनी बाधाएँ पार हो जाने के बाद उन्हें उस अँधेरी गुफा से निकलने की चिंता सताई तो उन्हें फिर से अपनी माँ का वह सिद्धांत याद आया। राजा ने अँधेरे में टटोलकर गुफा के द्वार का पता लगाया और अपनी पूरी शक्ति द्वार पर लगे पत्थर को हटाने में लगा दी। प्राणपण से जोर लगाने पर वह पत्थर अंतत: लुढ़क गया और राजा गुफा से बाहर आ गए। इस तरह किसी भी परिस्थिति में फँस जाने पर घबराने के स्थान पर प्रयत्न किए जाएँ तो कोई-न-कोई समाधान अवश्य निकल आता है।