मनुष्य की चेतना के परिष्कार का नाम अध्यात्म
   Date18-Apr-2019
धर्मधारा
जि नके पास आध्यात्मिक क्षमता होती है, क्या उनके जीवन सुखी हो जाते हैं? युवक के मन में उभरी जिज्ञासा, प्रश्न बनकर प्रकट हुई। 'सुख तो बहुत सतही चीज है, जिसका अध्यात्म से ताल्लुक नहीं। अध्यात्म अपनी चेतना के परिष्कार का नाम है, अपने चित्त की शुद्धि का नाम है और जिनके जीवन में आध्यात्मिक उन्नति होती है, उन्हें सुख नहीं शांति मिलती है, साधन नहीं संतुष्टि मिलती है।Ó स्वामी शंकर की प्रखर वाणी ये सब कुछ कहे जा रही थी कि युवक के मन में सवाल उठा- 'ऐसे व्यक्तियों के क्या लक्षण होते होंगे, उन्हें कैसे पहचाना जाए।Ó स्वामी शंकर को जितेंद्रिय और त्रिकालदर्शी लोग ऐसे ही नहीं कहते थे। युवक के इतना सोचते ही उन्होंने पास रखी गीता उठाई और उसे युवक के हाथों में थमाते हुए बोले-'जरा इसके चौदहवें अध्याय का पच्चीसवाँ श्लोक पढ़ो।Ó युवक ने धीरे से गीता, खोली और कहे गए। श्लोक को ढूंढकर धीरे-धीरे पढऩा शुरू किया, जिसमें लिखा था
मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयो: । सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीत: स उच्यते॥
अर्थात-जो मनुष्य मान-अपमान में सम रहता है, मित्र-शत्रु के पक्ष में सम रहता है और जो सारे कर्मों के आरंभ का त्यागी है, वही गुणातीत कहा जाता है।
'जानते हो, जब मनुष्य की आध्यात्मिक प्रतिरोधक क्षमता उच्चतम होती है तो वह प्रकृति के गुणों के पार चला जाता है। घटनाएँ वही रहती हैं, पर उसका घटनाओं के प्रति नजरिया बदल जाता है। वही घटनाक्रम जो किसी और को अभिमान से मत्त कर दे या वो घटनाक्रम जो किसी को वेदना से उद्वेलित कर दे, दोनों-के-दोनों उसके अंत:करण को तनिक भी प्रभावित नहीं करते। उसकी दृष्टि और दिशा सदैव गंतव्य की ओर रहती है।Ó स्वामी शंकर ने उत्तर को विस्तृत करते हुए कहा।
'क्या हमारे जैसा सामान्य व्यक्ति भी इस क्षमता का अधिकारी बन सकता है।Ó युवक ने पूछा। स्वामी शंकर मुस्कराए और बोले-'परमात्मा के लिए न कोई सामान्य है, न असामान्य। हृदय में भक्ति हो और प्रभु को पाने के लिए अकुलाहट हो तो प्रभु स्वयं भक्त की रक्षा के लिए तत्पर खड़े रहते हैं।