तमिलनाडु व बंगाल की कलंक कथा...
   Date18-Apr-2019
शक्तिसिंह परमार
भारतीय लोकतंत्र के लिए चुनाव में धनबल-बाहुबल का दुरुपयोग किसी कलंक से कम नहीं है...क्योंकि इसके जरिए अनेक बार पात्र के बजाय अपात्र व्यक्ति जनप्रतिनिधि बनकर देश की सर्वोच्च पंचायत 'संसदÓ एवं विधानसभाओं को भी अपवित्र करने का काम ही करते रहे हैं...क्योंकि जब धनबल-बाहुबल से जीता गया चुनाव और वहां से निकला सांसद-विधायक बाद में भी अपने उसी नापाक खुराफाती खेल की तिकड़में सदन व सदन के बाहर भिड़ाता नजर आएगा...और कई बार नजर भी आए हैं...लेकिन चुनाव को साजिशों, षड्यंंत्रों या कहें वोट बैंक के मान से विदेशी लोगों के जरिए प्रभावित करने के खेल का भी भंडाफोड़ होने लगे तब क्या कहिएगा...2019 के लोकसभा चुनाव के समर में हमारे सामने ऐसी दो कलंक कथाएं उजागर हुई हैं.., जो भविष्य के लिए बड़ा नासूर बन सकती हैं...अगर इस दिशा में व्यापक एवं कड़ी कार्रवाई नहीं की गई तो स्थितियां चुनावी फलक पर भयावह हो जाएंगी...तमिलनाडु में वोट की थोकबंद खरीदी के लिए नोटों की बरसात होना और पश्चिम बंगाल में बांग्लादेशी घुसपैठियों के वोटों को एकमुश्त साधने के लिए बांग्लादेशी तथाकथित सेलिब्रिटी का चुनावी मंच पर वोट मांगना क्या दर्शाता है..? धन्यवाद चुनाव आयोग को और उसकी सक्रियता को कि उसने इन दोनों ही राज्यों में चुनाव जैसे राष्ट्रीय कर्म को दागनुमा होने से बचाया...इन दोनों राज्यों की कलंक कथा से क्या अन्य राज्यों के नेता-दल सबक लेंगे..? क्योंकि इन दोनों राज्यों ने बहुत ही गंभीर खतरे की तरफ इशारा किया है...
दक्षिण के राज्य तमिलनाडु में चुनाव के समय खैराती सौगातें और पानी की तरह बहाया गया पैसा ही जीत की गारंटी बनता रहा है...लेकिन इस बार जो घटनाक्रम सामने आया उसके चलते चुनाव आयोग को ऐतिहासिक सख्ती दिखाना पड़ी और 18 अप्रैल को दूसरे चरण में तमिलनाडु के वेल्लोर लोकसभा सीट का चुनाव दो दिन पूर्व रद्द करना पड़ा...क्या यह सामान्य घटना है..? यानी यहां पर चुनाव केवल नाम के लिए हो रहा था...नोट के जरिए वोट खरीदने की सारी तैयारियों का भंडाफोड़ चुनाव आयोग और आयकर विभाग की सक्रियता से संभव हुआ...गत 1 अप्रैल को वेल्लोर लोकसभा क्षेत्र में द्रमुक के कार्यालय से 11 करोड़ 53 लाख रुपए नकद बरामद हुए थे...इस सीट से द्रमुक के उम्मीदवार डी.एम. कतीर हैं...यानी मतदान पूर्व मतदाताओं को रिझाने/खरीदने के सारे गैर कानूनी हथकंडे तैयार थे...कतीर के खिलाफ प्राथमिकी ही नहीं दर्ज की गई..,बल्कि चुनाव आयोग ने इस सीट पर चुनाव भी रद्द करवा दिया...यह आयोग की सक्रियता के साथ मतदाताओं को भी जागरूक करने का आधार बन गया है कि किस तरह से उनके वोट को खरीदने की हर स्तर पर गैर कानूनी तिकड़में भिड़ाई जा रही हंै...क्योंकि तमिलनाडु में अन्नाद्रमुक में बिखराव और दो धड़ों में बंटी पार्टी का लाभ द्रमुक मतदाताओं में रुपए लुटाकर लेना चाहती है...तभी तो तमिलनाडु में रात को बिजली गुल करके गली-गली में नोटों की बरसात हो रही है...क्या यह चुनावी तंत्र पर घात लगाने जैसा नहीं है..? वेल्लोर की भांति संभवत: तमिलनाडु में ऐसी और धनबल से प्रभावित सीटें निश्चित होंगी...विश्वास है, आयोग ऐसी ही सख्त कार्रवाई के जरिए चुनाव की निष्पक्षता को बनाए रखने में सफल होगा... फिलहाल तो तमिलनाडु में रात को नोटों की बरसात का मामला उच्चतम न्यायालय में पहुंच गया है.., जिसका असर आयोग की सख्ती में भी दिख रहा है... यानि धनबल की तमिलनाडु में तिकड़में ध्वस्त होती नजर आ रही हैं...
पश्चिम बंगाल में इस बार का चुनाव कांग्रेस-वामपंथियों और भाजपा के लिए कितना मायने रखता है..? इससे लाख गुना जीवन-मरण का सवाल ममता और उनकी तृणमूल के लिए बन चुका है...तभी तो चुनाव घोषणा से 6 माह पूर्व जो षड्ंयत्रकारी खेल ममता और उनकी चौकड़ी ने राज्य में खेला..,वह बदस्तूर रह-रहकर जारी है...पश्चिम बंगाल में प्रत्येक सीट पर बांग्लादेशी घुसपैठियों के वोटों की निर्णायक स्थिति है...और इन वोटों के लिए स्वयं की जान की बाजी लगाने का भी ममता कई बार ऐलान कर चुकी हैं...लेकिन ऐसा लगता है कि भाजपा की तैयारियों और रणनीति के चलते इस बार ममता की दाल गल नहीं रही...इसलिए वे बांग्लादेशी घुसपैठियों को रिझाने-मनाने के लिए बांग्लादेशी कलाकारों का भी गैर कानूनी सहयोग लेने से परहेज नहीं कर रहीं.., क्या यह राष्ट्रघाती कदम नहीं है..? क्या पाकिस्तान का प्रधानमंत्री या अन्य देशों के राष्ट्राध्यक्ष भारत में आकर किसी पार्टी विशेष का चुनाव प्रचार कर सकते हैं..? अगर नहीं..,तो फिर पश्चिम बंगाल में बांग्लादेश के अभिनेता फिरदौस अहमद को बिजनेस वीजा के बहाने पश्चिम बंगाल में ममता व तृणमूल कांग्रेस के पक्ष में चुनाव प्रचार की अनुमति किसने दी..? ममता ने यह किसकी मिलीभगत से किया इसका भी खुलासा होना चाहिए... क्योंकि किसी को व्यापार-व्यवसाय-कला के नाम पर बुलाकर वोट की जुगत लगाना क्या कहलाता है..?
हालांकि गृह मंत्रालय की सक्रियता से फिरदौस का वीजा रद्द हो चुका है और देश छोडऩे का आदेश दिया जा चुका है..,लेकिन इस बीच फिरदौस ने जो गुपचुप बैठकें की होंगी...अपने घुसपैठिये बांग्लादेशी भाइयों से ममता के पक्ष में मतदान का षड्यंत्र रचा होगा...उस गलती का सुधार और उसकी सजा किसको मिलना चाहिए..? क्योंकि यह भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था और निष्पक्ष चुनाव व्यवस्था में गैर कानूनी तरीके से हस्तक्षेप का अंतरराष्ट्रीय अपराध है...क्या बांग्लादेश को भी इस पर स्पष्टीकरण नहीं देना चाहिए..? और ममता जब अपने पुलिस कमिश्नर के लिए सड़कों पर बैठ जाती हंै तो फिरदौस के मामले में मौन साधे क्यों बैठी हैं..?
कहने का तात्पर्य यही है कि चुनाव आयोग तो तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल की कलंक कथाओं को दुष्परिणाम दिखाने के पहले प्रतिबंधित करने में सफल रहा...क्या इन राज्यों के मतदाता भी अपने राष्ट्रीय धर्म को लक्ष्य तक पहुंचाने में सफल होंगे..? इसके लिए प्रत्येक मतदाता को अपने आस-पास ऐसी ही धन लुटाने वाली एवं राष्ट्रघाती गतिविधियों पर सतत निगाह रखनी होगी... उम्मीद व विश्वास है कि लोकतंत्र सफल होगा...इंतजार कीजिए, लोकतंत्र के इस वैचारिक समर से आने वाले जनादेश के सिर्फ 36 दिन शेष...
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