जन अदालत में साध्वी...
   Date18-Apr-2019

शक्तिसिंह परमार
भोपाल लोकसभा क्षेत्र का आम चुनाव 'धर्मयुद्धÓ में परिवर्तित हो चुका है... मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल की यह लोकसभा सीट अब चुनाव परिणाम की घोषणा तक देश की सबसे हाई प्रोफाइल सीट वाराणसी (काशी), वायनाड और अमेठी से कम महत्व एवं चर्चा का विषय नहीं रहेगी... वैसे भी भाजपा का लंबे समय से गढ़ रहे इस लोकसभा क्षेत्र भोपाल ने एक माह से सर्वाधिक चर्चा तो पा ही ली है... क्योंकि मप्र के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह की यहां से स्वाभाविक पसंद-नापसंद उम्मीदवारी कहें या पार्टी के विरोधियों द्वारा उन्हें ठिकाने लगाने की 'बदलाÓ राजनीति हो... लेकिन अपने राजनीतिक पड़ाव के अंतिम समय में भी दिग्गी अपनी शैली के अनुरूप चर्चा में बने रहने के साथ ही भाजपा के राज्य-केन्द्र नेतृत्व को माहभर तक पसोपेश में डालने में सफल रहे हैं..! राजाभोज की नगरी भोपाल का लोस परिणाम तो दीवार पर लिखे स्पष्ट जनादेश जैसा है कि - इस भगवा गढ़ को साध्वी का भगवा पराक्रम और चटख रंग प्रदान करने वाला है... कांग्रेस दिग्विजय सिंह जैसा उम्मीदवार खड़ा करके भले ही पहली बाजी जीत गई हो, लेकिन अंतिम बाजी भाजपा के पक्ष में ही जाना निश्चित है..!
भोपाल में लंबे समय तक दिग्गी के खिलाफ उम्मीदवार तय न कर पाने का जो नुकसान भाजपा ने कर लिया है, उसे अब सामान्य तौर पर न लें तो ही बेहतर होगा... क्योंकि चुनाव में दुश्मन अर्थात् प्रतिद्वंद्वी के सारे ऋणात्मक गुणों को अपना धनात्मक पक्ष मानकर जीत के लिए पूर्णत: आश्वस्त हो जाना महंगा पड़ सकता है... क्योंकि इस बार भोपाल में लड़ाई सिर्फ दो राजनीतिक दलों (भाजपा-कांग्रेस) के बीच नहीं है और ना ही अपने-अपने क्षेत्र की दो हस्तियों (साध्वी प्रज्ञा सिंह - दिग्विजय सिंह) तक यह चुनावी संग्राम सीमित है... बल्कि जनता की अदालत में यह 'भगवाÓ बनाम 'हराÓ का वह वैचारिक समर है, जिसे एक तरफ दिग्विजय-चिदम्बरम ने प्रायोजित रूप से साजिशन पैदा किया और गत डेढ़ दशकों में कांग्रेस एवं उसके जिम्मेदार मंत्रियों ने इस विघटनकारी विचार को बड़े जतन से खाद-पानी देकर पाला-पोसा है... तो दूसरी तरफ 2008 से ही हिन्दू संगठन, भाजपा और यहां तक कि सर्वाधिक सहिष्णु एवं शांतिपसंद पूरा हिन्दू समाज भी जबरिया थोपे/लादे गए इस कलंक को अपने ऊपर लेकर प्रशासनिक रूप से भयावह शारीरिक प्रताडऩा एवं मानसिक संत्रास झेलता रहा है... जी हाँ, यह लड़ाई 'हरे आतंकवादÓ के बचाव में लड़ी गई 'भगवा आतंकवादÓ की थ्योरी के खिलाफ ही है... जिसे भाजपा संगठन और उसके नेता और कार्यकर्ता भले ही सामान्य चुनाव समझ रहे हों या उस रूप में उसे ले रहे हों, लेकिन यह सम्पूर्ण हिन्दू समाज, हिन्दू संगठनों के लिए किसी वैचारिक संग्राम से कम नहीं है... और इसी के लिए अदालत से पूर्णत: निष्कलंक सिद्ध होने के बाद साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर जनता-जनार्दन की अदालत में आ खड़ी हुई हंै... यानी इस बार जनता को तय करना है कि - 10-15 वर्षों से जो सियासी खेल हिन्दुओं को तोडऩे के लिए चलाया जा रहा है उसके मुख्य किरदारों या साजिशकर्ताओं को क्या सजा अब जनता की अदालत में मिलना चाहिए..? यानी जनता की अदालत में खड़ी 'साध्वीÓ न्याय मांग रही हैं... और उन्हें सम्पूर्ण हिन्दू समाज देख/सुन भी रहा है...
भोपाल में वोटों का समीकरण देखें तो इस लोकसभा में 8 विधानसभा में से 5 पर भाजपा, 3 पर कांग्रेस काबिज है... कुल 18 लाख मतदाताओं में से 4.5 लाख मुस्लिम, बाकी हिन्दू मतदाता है... जिन्हें सेकुलर मीडिया ठाकुर, ब्राह्मण, वैश्य, पिछड़ा, अजा, अजजा में विभक्त करके दिखाता हंै... यही बातें दिग्विजय और कांग्रेस की ताकत बन जाती है... जबकि 18 लाख में से सिर्फ साढ़े चार लाख मुस्लिम, बाकी हिन्दू है... 23 मार्च 2019 को दिग्विजय के नाम पर मुहर लगी... और भाजपा ने 17 अप्रैल को साध्वी को हरी झंडी दिखाई... यानी इस एक माह के विलंब ने मानसिक रूप से दिग्विजय को बढ़त दिलाई और वे अपने हिन्दू विरोधी चेहरे/छवि को ध्वस्त करने के लिए मंदिर-मंदिर दर्शन, हवन-पूजन का काम निपटाते रहे हैं... ऐसे में बहुसंख्यक हिन्दू समाज को सियासत के रंग में रंगे सियार बन चुके इस 'तथाकथित राजाÓ से सावधान रहना होगा...
भाजपा ने भोपाल में विलंब से ही सही दिग्विजय को उन्हीं की शैली में जवाब देने के लिए साध्वी प्रज्ञा सिंह के रूप में ब्रह्मा चलाया है, जिसकी सफलता निश्चित है... लेकिन प्रदेश भाजपा, उसका नेतृत्व एवं अपने को बड़े-बड़े नेता कहने वाले उसी दिन दिग्गी के सामने चुनाव हार गए, जब उन्होंने अपने कदम पीछे करके साध्वी को आगे बढ़ाया... भाजपा के गढ़ में उसका एक सामान्य कार्यकर्ता दिग्गी का सामना कर सकता था..? फिर बड़े नेताओं ने कदम पीछे क्यों खींचे..? क्या उन्हें स्वयं पर भरोसा नहीं या फिर दिग्विजय में उन्हें इतनी खूबियां नजर आ रही हैं कि वे उसे 'दिग्विजयÓ मान चुके हैं..? सही मायने में प्रदेश भाजपा और उसकी तत्कालीन सरकार की ही यह विफलता थी कि दिग्विजय आज राजधानी में दहाड़ रहे हैं...क्योंकि 15 वर्षों में भाजपा दिग्विजय के 10 वर्षों के कार्यकाल के एक भी घपलों, घोटालों को खोलकर इस संदिग्ध व्यक्ति को नाप नहीं सकी... आज वही कांग्रेस और कमलनाथ 4 महीने में भांति-भांति के घोटाले व जांच खोलकर भाजपा एवं संगठन-संस्थाओं पर शिकंजा कस रहे हैं... तब क्या यह विफलता भी भाजपा के खाते में नहीं जाती..?
हिन्दू धर्म एवं हिन्दू समाज के स्वाभिमानी दामन पर लांछन न लगे, इसके लिए साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर ने स्वयं भयावह पीड़ा जेल में भोगी.., वरना तो साध्वी भी सरकारी गवाह बनकर हिन्दू समाज पर 'भगवा आतंकवादÓ का यह तथाकथित कलंक लगवा देतीं और स्वयं सुरक्षित निकल जाती हैं... यानी जेल में रहकर भी हिन्दू समाज की प्रतिष्ठा के लिए साध्वी ने किसी संन्यासी से बढ़कर साधना की है.., समझौता एक्सप्रेस/मालेगांव विस्फोट के बहाने हिन्दू आतंकवाद, भगवा आतंकवाद के सियासी खुराफाती खेल का हश्र अदालत में देख/सुन लेने के बाद हिन्दू समाज कितना जागरूक हुआ है यह भोपाल के वैचारिक संग्राम में देखने लायक होगा..?
कांग्रेस प्रत्याशी दिग्विजय सिंह ने 10 वर्षों तक मप्र में एकछत्र राज किया, इस दौरान उन्होंने अपने कद के आसपास किसी नेता/मंत्री को पहुंचने नहीं दिया... तब के उपमुख्यमंत्री सुभाष यादव को आक्रोश में कहना पड़ा था कि - 'राजा तुमने हमारी स्थिति नौकरशाही के सामने महतरÓ की बना दी है... उस दौर में संघ और हिन्दू संगठनों को बदनाम करने के लिए दिग्विजय के इशारों पर ही 'चोटी कांड, झिरन्या हथियार कांड एवं देवास में संघ के वरिष्ठ पदाधिकारी की हत्याÓ जैसे कांटे बोकर भगवा रंग को बदनाम करने का षड्यंत्र रचा गया... यानी कुछ अधिकारियों के सहारे दिग्गी ने मप्र में अराजक व्यवस्था के साथ बीमारू मप्र का कीर्तिमान गढ़ा था... तभी तो साध्वी उमा भारती ने दिग्गी के 10 वर्षीय कुशासन को 'मिस्टर बंटाढारÓ का नारा बुलंद करके दिग्गी व कांग्रेस को सत्ता से बेदखल किया था... बस उसके बाद दिग्विजय केन्द्र की संप्रग सरकार के सहयोग से एसटीएफ, सीबीआई व अन्य जांच एजेंसियों के जरिये तब के गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे-पी. चिदम्बरम के सहारे मालेगांव/समझौता एक्सप्रेस बम विस्फोट का जिन्न खड़ा किया... यह खेल दिग्गी ने पूरे हिन्दू समाज को 'हिन्दू आतंकवादीÓ बताकर खेला...जिसमें संघ समेत सभी हिन्दू संगठनों को भी जालसाजी का शिकार बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी... स्वामी असीमानंद एवं साध्वी प्रज्ञा सिंह तो जेल में तरह-तरह की नारकीय, घृणित, पिशाचिक यातनाएं झेलकर अपने शरीर में सैकड़ों व्याधियों को अंगीकार किया... लेकिन हिन्दू, हिन्दुत्व और हिन्दू धर्म का भगवा भाव 'हरे आतंकी रंगÓ से बेअसर रखा... दिग्गी की वह हिन्दुओं के खिलाफ खड़ा होने की पराकाष्ठा थी... उन्होंने 26/11 में शहीद हेमंत करकरे की शहादत पर भी सवालिया निशान लगाकर उन्हें मालेगांव मामले में जबरिया घसीटा... यही नहीं, आतंकियों को सम्मान 'ओसामाजीÓ और हिन्दू साधु-संतों को गुंडा मवाली कहना उनका राजनीतिक शगल रहा है... इसलिए मुस्लिमों के 'हरे आतंकवादÓ के बचाव में भगवा और हिन्दू आतंकवाद का जवाब हिन्दू समाज द्वारा ऐतिहासिक तरीके से चुनाव में दिग्गी को दिया जाना चाहिए..,ताकि भविष्य में कोई हिन्दुओं को बदनाम करने की कीमत पर अपना राजनीतिक मकसद साधने और वर्ग-विशेष का हीरो न बन सके, क्योंकि भोपाल के 4.5 लाख वर्ग विशेष के वोट को ही दिग्गी संभवत: इसीलिए बपौती समझ रहे हैं कि आतंकवाद के प्रवक्ता के रूप में दिग्विजय ने उनकी आवाज बनने का काम ही तो किया... वर्ग विशेष के भरोसे चुनाव में खड़े ऐसे 'संदिग्ध व्यक्तिÓ को क्या बहुसंख्यक हिन्दू समाज करारा जवाब नहीं देगा..? जवाब देना होगा वरना इतिहास माफ नहीं करेगा... इंतजार कीजिए, लोकतंत्र के इस वैचारिक समर से आने वाले जनादेश के सिर्फ 35 दिन शेष...