चुनावी चंदे पर नियमों का पहरा..!
   Date15-Apr-2019
शक्तिसिंह परमार
भारतीय लोकतंत्र में क्या अब राजनीतिक चंदे की परिभाषा ही बदल जाएगी..? क्या यह बदला हुआ स्वरूप यानी चुनावी चंदे का 'चुनावी बांडÓ रूप फिलहाल तो शुचिता-पारदर्शिता का पैमाना तय करने की हसरतें दिखा रहा है...सरकार, न्यायालय और दानदाताओं का समीकरण इसे किस परिणिती तक पहुंचाया गया..? देखने लायक रहेगा..! इस विषय में सवाल-जवाब के रूप में इतना तो कहा जा सकता है कि कांग्रेस एवं कम्युनिस्टों ने हमेशा ही राजनीतिक चंदे का लंबा गोरखधंधा चलाया है...कांग्रेस जहां उद्योगपतियों, व्यापारियों से चुनावी चंदा वसूलती रही...वहीं कम्युनिस्टों ने एनजीओ के माध्यम से विदेशी फंड लेने में भी कोई गुरेज नहीं की है...तभी तो 2011 से 2014 के बीच ऐसी स्थिति निर्मित हो गई थी कि चुनाव में खर्च राशि का किसी के पास कोई हिसाब नहीं था...न तो चुनाव आयोग के पास, ना ही सरकार के साथ ही किसी अन्य तंत्र के पास...उस समय केंद्र में कांग्रेसनीत संप्रग सरकार तो इसे बताने के बजाय छुपाने में ज्यादा जोर लगा रही थी..,जबकि सबको स्पष्ट रूप से मालूम है कि विधायक के चुनाव में 46 फीसदी और एक सांसद के चुनाव में 43 फीसदी से अधिक धन काला होता है...अब जब यह धन काला है तो क्या इससे चुने गए जनप्रतिनिधि काले कारनामों को बढ़ावा देने में हिचकिचाएंगे..? सिर्फ एक ही उदाहरण पर्याप्त है कि चुनावी राजनीति में बिहार के बेगूसराय से चुनाव लड़ रहे वामपंथी कन्हैया कुमार ने एक माह में 70 लाख रुपए चुनावी दान एकत्रित किया है...कौन है ये दानदाता..?
देश में लगातार बढ़ते चुनावी खर्च पर समय-समय पर हर किसी ने चिंता जताई...नोटबंदी और जीएसटी के बाद एक बार फिर चुनावी चंदे में पारदर्शिता के मुद्दे ने तूल पकड़ा...मोदी सरकार ने 2017-18 के बजट में राजनीतिक पार्टियों को दिए जाने वाले चंदे को पारदर्शी बनाने के लिए चुनावी बांड (इलेक्टोरल बांड) की घोषणा की...तय किए गए नियम के मुताबिक 2000 के नकद चंदे पर रोक लगाई गई थी...फिर नए नियम के मुताबिक 2000 से अधिक का चंदा केवल चेक या ऑनलाइन देने की सिफारिश हुई...गत जनवरी 2019 में ही मोदी सरकार ने इस चुनावी बांड की अधिसूचना जारी की...और अधिसूचना के अनुसार 1000 रु., 10,000 रु., 10 लाख रु. और 1 करोड़ के बांड जारी किए जाते हैं...इन बांड्स को एसबीआई में केवाईसी जानकारी वाले अकाउंट से दानदाता खरीद सकता है...राजनीतिक पार्टियां 15 दिन के अंदर बैंक से इन बांड्स का पैसा ले सकती हंै...पेंच इसमें यह है कि बांड पर पैसा देने वालों का नाम नहीं होता...और यह जानकारी भी सार्वजनिक नहीं की जाती...बस इसी बिंदु को एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म (एडीआर) द्वारा उच्चतम न्यायालय का रुख किया गया...और अब सुप्रीम कोर्ट ने दलों को 30 मई तक बांड से मिले चंदे की रसीद और दानकर्ताओं की पहचान का विवरण सीलबंद लिफाफे में चुनाव आयोग को सौंपने का निर्देश दिया है...यही नहीं, अब वित्त मंत्रालय को चुनाव बांड खरीदने की अवधि अप्रैल-मई में 10 दिन से घटाकर 5 दिन करने का निर्देश दिया...
गैर सरकारी संगठन एडीआर की याचिका एक तरह से ऐन चुनाव में चुनावी चंदे के माहौल को गरमाने का खेल है...ताकि जिन दलों को पारदर्शी तरीके से ही सही ज्यादा चंदा मिला.., उन्हें घेरा जा सके...एनजीओ, एडीआर और माकपा ने चुनावी बांड की वैधानिकता को चुनौती दी है...साथ ही योजना पर रोक या दानकर्ता की पहचान की मांग की है...लेकिन यह पहल क्या चुनावी माहौल को बिगाडऩे का गिरोह का एक सुनियोजित षड्यंत्र नहीं है..? वरना जब अधिसूचना जारी हुई थी तभी इस पर अदालत का दरवाजा क्यों नहीं खटखटाया गया..? अब रोक से तो न्यायालय मुकर चुका है...लेकिन दानदाता की पहचान अगर उजागर होती है और जिस दल को दान दिया, वह सत्ता में नहीं आया तो सत्ता में आने वाला दल बदले की कार्रवाई के रूप में उस दानदाता के उद्योग, व्यापार, व्यवसाय पर नियमों का चाबुक चलाना शुरू नहीं कर देगा..? इस पर भी तो चिंतन जरूरी है...जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 29ए के तहत जब पंजीकृत दल जिन्हें चुनाव में 1 फीसदी से अधिक मत मिले हैं.., वे बांड के जरिए चुनावी दान ले सकते हैं...ऐसे में एडीआर का यह आरोप कि 10 लाख और 1 करोड़ के बांड ज्यादा बिके...यह 2013 कंपनी एक्ट में बदलाव गलत तरीके से करने के कारण हुआ...जिसके कारण 95 फीसदी बांड की राशि भाजपा को मिली...यह आरोप सत्यता से परे इसलिए है कि सत्तासीन सरकार को ही सर्वाधिक चंदा मिलता है... इसके रिकार्ड उठाकर एडीआर को देखना चाहिए...दूसरा कि जब जिसको जितने बांड की जरूरत होगी वह खरीदेगा...अब इसमें कम-ज्यादा राशि का सवाल कहां है..? क्या यह दूषित मंशा से सिर्फ भाजपा को घेरने की ही रणनीति नहीं है..?
भारतीय राजनीति में धनबल-बाहुबल का जोड़ हमेशा रहा है...चुनाव-दर-चुनाव इसके तरीके भले ही बदलते रहे हों.., लेकिन यह बात भी अकसर कही जाती है कि अगर आपके पास पर्याप्त धन नहीं है तो आप राजनीति नहीं कर सकते...क्योंकि राजनीति के लिए आज-कल बाहुबल भी धन से ही खरीदा जाता है...इसका यह मतलब नहीं है कि राजनीति में शुचिता का मापदंड न हो..,लेकिन राजनीति के अधिकतर मामलों में चुनावी शुचिता की बात करना बेमानी जैसा है...आज हर तरह की गड़बडिय़ों, अनियमितताओं, घपलों और घोटालों के लिए जनपद से जनपथ तक पहुंचाने वाले चुनाव का सर्वाधिक खर्चीला होना है...पंचायत के पंच का चुनाव जब लाख रुपए का खर्च मांग रहा है, तब सांसद, विधायक के चुनाव में करोड़ों खर्च होना क्या सामान्य बात नहीं है..? फिर इस स्तर पर पैसा पानी की तरह बहाकर चुनाव जीतने वाले सांसद, विधायक की प्राथमिकता क्या होगी..? अपने खर्च-माल का कम से कम 50 न सही.., 5 गुना तो कमाना है ना..! फिर कैसे टूटेगा राजनीति एवं चुनाव में धनबल-बाहुबल का काकस...लेकिन अब जब चुनाव आयोग के पाले में चुनावी बांड के बहाने ही सही गेंद आ चुकी है..,तो इसकी पूरी शल्यक्रिया जरूरी है...न्यायालय की पीठ चुनावी बांड योजना के अनुरूप कानूनों को लाने के उद्देश्य से लगाकर आयकर कानून, जनप्रतिनिधित्व कानून, कंपनी एक्ट, आरबीआई एक्ट और वित्त कानून आदि में किए गए संशोधनों पर भी विस्तार से चर्चा के लिए राजी हुई है...देखने लायक होगा कि 2019 के समर में चुनावी चंदे का यह खेल कहां पहुंचता है... और इसके बाद देश का न्याय मंदिर चुनावी चंदे के गोरखधंधे पर किस तरह की नकेल डालने का आदेश सुनाता है...फिलहाल तो चुनावी समर के जनादेश पर सभी की निगाहें टिकी हंै...इंतजार कीजिए लोकतंत्र के इस वैचारिक समर से आने वाले जनादेश के सिर्फ 39 दिन शेष...
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