विचारों की लहरों के साथ उपजती है जिज्ञासा
   Date13-Apr-2019
जिज्ञासा का अर्थ है-जानने की इच्छा
। यह मानव की सहज प्रवृत्ति है। मनुष्य सदैव ही क्या, कौन, कैसे के उत्तर खोजने में लगा रहता है। आज जितने भी आविष्कार हम देखते हैं, वे सब जिज्ञासा की ही परिणति हैं। यह जिज्ञासा विचारों की लहरों के साथ उपजती है। जीवन की प्रत्येक घटना जो मन को स्पंदित करती है, अनायास ही नए प्रश्नों व जिज्ञासाओं को जन्म देती है। इसी तरह परिस्थितियों व परिवेश की हलचलें जो विचार व भाव में लहरें पैदा करने में समर्थ हैं, स्वाभाविक ही अंतश्चेतना में जिज्ञासा को भी जन्म देती हैं। यह क्रम कभी नहीं रुकता, बस, नित्य-निरंतर-अविराम चलता रहता है। जिज्ञासा के संबंध में विचार योग्य तथ्य यह है कि हमें जिज्ञासा किसकी व क्यों करनी चाहिए। यह मानव की स्वाभाविक अभिवृत्ति है और इसे एक निश्चित दिशा की ओर ले जाने का प्रयास इसकी व्यापकता को अवरूद्ध करने वाला होगा। किसी क्षेत्र विशेष की सीमा में जिज्ञासा को बांधा नहीं जा सकता और बांधा जाना चाहिए भी नहीं। एक व्यक्ति जीवन के प्रति जिज्ञासा करता है तो विचारक बन जाता है, संसाधनों के प्रति जिज्ञासा पर वैज्ञानिक बन जाता है, आत्मा-परमात्मा के प्रति जिज्ञासा होने पर दार्शनिक, संगीत के प्रति जिज्ञासा होने पर संगीतज्ञ, नीति-नियमों के प्रति जिज्ञासा होने पर कानून विशेषज्ञ व ग्रहों की चाल पर जिज्ञासा होने से ज्योतिषी बन जाता है। आशय यह है कि जो भी व्यक्ति जिस भी विषय के प्रति जिज्ञासा करता है, वह उसी क्षेत्र का महारथी, जानकार, आविष्कारकर्ता बन जाता है। जिज्ञासा और अधिक गहन होने पर वह स्वयं ही वही क्षेत्र बन जाता है। जिज्ञासा का विष्य जिज्ञासु के जीवन, कर्म, भाव, विचार, व्यवहार में अभिहित होने लगता है। जिज्ञासा के इसी क्रम में वेदांत के ग्रंथ 'ब्रह्मसूत्रÓ का प्रारंभ सर्वोच्च जिज्ञासा से है-'अथातो ब्रह्म जिज्ञासाÓ अर्थात अब ब्रह्म को जानने की जिज्ञासा। इसके पूर्व कुछ भी नहीं और इसके पश्चात के सभी विचार इस प्रारंभिक जिज्ञासा की ही परिणति है। सामान्यत: 'अथÓ शब्द मंगल, अनंतर, आरंभ आदि का द्योतक है, जिसकी अनेक आयामों में व्याख्या हो सकती है। यहां 'अथÓ शब्द आनंतर्य द्योतक है, न कि आरंभ द्योतक, क्योंकि ब्रह्म जिज्ञासा का आरंभ नहीं किया जा सकता। आनंतर्य से तात्पर्य यहां उन साधनों से है, जिनकी सिद्धि के पश्चात मुमुक्षु को ब्रह्मजिज्ञासा स्वयमेव होती है। कार्य को अपनी उत्पत्ति में कारण सामग्री की अपेक्षा होती है। यहा ंजिस कारण के होने पर जिज्ञासारूप कार्य हो और जिस कारण के न होने पर जिज्ञासारूप कार्य न हो, वह कारण ब्रह्म है। आशय यह है कि साधन भी ब्रह्म है और साध्य भी।