गंवाए अवसर ने लिखी बालाकोट की पटकथा
   Date14-Mar-2019

ब्रह्म चेलानी
भारत ने बालाकोट हवाई हमले में जो वीरता दिखाई, उसका जवाब हवाई घुसपैठ से देने में पाकिस्तान ने ज्यादा इंतजार नहीं किया। हालांकि आर्थिक तंगी से ग्रस्त पाकिस्तान शत्रुता में ज्यादा वृद्धि नहीं कर सकता, इसलिए भी नहीं, क्योंकि भारत उस पर बड़े पैमाने पर दंड बरपा सकता है। लंबे समय से भारत सीमा पार आतंकवाद को पाकिस्तान के लिए ज्यादा महंगा बनाए बिना झेलता रहा है। इसलिए पुलवामा हमले ने पूरे देश में क्रोध को बहुत भड़का दिया, न केवल पाकिस्तान के खिलाफ, बल्कि उस राजनीतिक वर्ग के खिलाफ भी, जिसने भारत को एक नरम राज्य में बदलकर रख दिया है। पाकिस्तान के साथ शांति एक मृगतृष्णा (अंग्रेजी में मिराज) है, और भारतीय वायुसेना ने अपने मिराज-2000 को वहां आतंकवादियों पर बम बरसाने में लगा दिया। भारत ने पाकिस्तान के आतंकी सरगनाओं, सैन्य प्रमुखों को तीखा संदेश दे दिया कि भारत पाकिस्तानी हवाई क्षेत्र में अंदर घुसकर बम बरसाने में भी सक्षम है।
अटलबिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री काल में हमने हवाई हमले का एक मौका गंवा दिया था। तब दिसंबर 2001 में जैश-ए-मोहम्मद ने भारतीय संसद पर हमला किया था, पुर्जों के अभाव में पाकिस्तान के एफ-16 विमान तब सक्षम नहीं थे, लेकिन तब भारत ने पाकिस्तान को बख्श दिया। तब भारत हवाई हमला कर देता, तो पाकिस्तान आगे आतंकी नरसंहारों की पटकथा नहीं लिख पाता। जो अवसर हमने गंवाया था, वह 18 वर्ष बाद सीमित हवाई हमले के साथ हमारे हाथ लगा। बालाकोट प्रमाण है कि पहली बार एक परमाणु शक्ति ने दूसरी परमाणु शक्ति के क्षेत्र में हवाई हमला किया है। बड़ा सवाल यह है कि क्या वर्तमान टकराव की स्थिति भारत के लिए निर्णायक मोड़ बनेगी? क्या वह दृढ़ता हमने पैदा कर ली है कि हम आगे अपना खून और नहीं बहने देंगे? क्या भारत ने बालाकोट हवाई हमले को उसी तरह से अंजाम दिया है, जैसे वर्ष 2016 में सर्जिकल स्ट्राइक को अंजाम दिया था, ताकि लोगों के क्रोध को शांत किया जा सके? क्या यह सोचकर कदम उठाया गया कि पाकिस्तान फिर जवाब नहीं देगा? मात्र एक हवाई हमला पाकिस्तान को रोकने में ठीक उसी तरह से अप्रभावी सिद्ध होगा, जैसे एक सर्जिकल स्ट्राइक सिद्ध हुई थी। बालाकोट में जितने भी आतंकवादी मारे गए हों, लेकिन सच यही है कि पाकिस्तान के जनरल ने कोई कीमत नहीं चुकाई है। तत्काल सैन्य प्रतिक्रिया से उनका हौसला बढ़ गया है, वे चाहेंगे कि भारत का और खून बहे। 2016 की सर्जिकल स्ट्राइक के समय भी भारत ने आतंकी सरगनाओं से सीधे कोई कीमत नहीं वसूली थी, जिसकी वजह से नागरोटा से पुलवामा तक पाकिस्तान प्रेरित आतंकी हमलों का सिलसिला चला। भारत अब पाकिस्तान को निश्चय ही सतत और बहु-आयामी दबाव में लाए। उदाहरण के लिए, भारत अंतर्राष्ट्रीय समुदाय से यह अपेक्षा कैसे कर सकता है कि वह पाकिस्तान को कूटनीतिक रूप से अलग-थलग कर दे, जबकि स्वयं नई दिल्ली ऐसा करना नहीं चाहती। वास्तव में, तमाम भाषणों के विपरीत पाकिस्तान को आतंकवादी राज्य की तरह देखने से भारत का इंकार फिर उसे परेशान करने लौट आया है। भारत असैनिक तरीकों से पाकिस्तान को सबक सिखाने में भी संकोच करता रहा है। जल संधि पर नितिन गडकरी के बयान ने केवल गलत अंतर्राष्ट्रीय प्रचार को बल दिया। जबकि भारत संधि के सूक्ष्म पक्षों की पालना कर रहा है। भारत को इस सच के सामने जरूर खड़ा होना चाहिए कि पाकिस्तान वर्षों से भारत के खिलाफ जंग में है। इस आक्रामकता को केवल आतंकवाद तक सीमित करना व्यापक रणनीतिक आयामों को न्यूनतम करके देखना है और इससे वर्तमान तदर्थ दृष्टि की जगह एक व्यापक रणनीति बनाने की जरूरत भी खारिज हो जाती है। हम पिस रहे हैं। यह बड़े पैमाने पर एकतरफा गैर-पारंपरिक युद्ध है, जो 1980 के दशक से चल रहा है, जिसकी कुल कीमत पूर्व में हो चुके पूर्ण युद्धों में चुकाई गई कीमत से भी ज्यादा है। अगर भारत इस लड़ाई को आतंकी सरगनाओं तक नहीं ले जाना चाहता, तो वे भारत के खिलाफ आतंकी छद्म का इस्तेमाल जारी रखेंगे।
कू टनीतिक रिश्तों के लिहाज से आने वाले दिनों में विश्व एक नया आकार लेने वाला है। यह संभावना इसलिए जताई जा रही है, क्योंकि आतंकवाद के खिलाफ अपनी हालिया कार्रवाई के जरिये भारत ने खुद के नई नीति पर चलने का संकेत दिया है। यह एक ऐसी इंटीग्रेटेड पॉलिसी है, जिसमें कूटनीतिक और सामरिक नीतियां शामिल हैं। जाहिर है, 'सॉफ्ट पावरÓ की हमारी पारंपरिक पहचान बदलने वाली है।
इसको समझने के लिए भारत की 'नॉन मिलिट्री प्रीएम्प्टिव स्ट्राइकÓ के बाद दुनियाभर से आई प्रतिक्रियाएं गौर करने लायक हैं। अमेरिका की तरफ से जहां यह कहा गया कि भारत के पास अपनी आत्मरक्षा का पूरा अधिकार है, तो ऑस्ट्रेलिया ने पाकिस्तान को नसीहत देते हुए कहा कि उसे जैश-ए-मोहम्मद जैसे संगठनों को रोकने के हरसंभव प्रयास करने चाहिए। फ्रांस ने भी आतंकवाद के खिलाफ जंग में भारत की हर कार्रवाई का समर्थन करने की बात कही है। खबर है कि चीन भी पाकिस्तान का नाम लिए बिना उसे लताड़ चुका है। कुल मिलाकर, संकेत यही है कि दुनिया के तमाम बड़े और महत्वपूर्ण देश भारत के साथ खड़े हैं। इसकी एक बड़ी वजह यह भी है कि आतंकवाद के खिलाफ किसी प्रयास के नेतृत्व की मंशा सभी देशों की है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा भी है कि इसके लिए क्षेत्रीय देशों को आगे आना चाहिए। बकौल ट्रंप, क्षेत्र में शांति और स्थिरता तभी बनी रह सकती है, जब सभी देश मिलकर आतंकवाद के खिलाफ जंग लड़ेंगे। ऐसे में, इसकी संभावना ज्यादा है कि आने वाले दिनों में भारत आतंकवाद के खिलाफ जंग का नया सेनापति बन जाए। अब तक यह हैसियत अमेरिका की रही है। हालांकि उसने भले ही बड़े-बड़े हमले किए, लेकिन कूटनीतिक तौर पर वह सफल नहीं हो सका। अफगानिस्तान से बाहर निकलने की उसकी जल्दबाजी इसका ताजा सबूत है। लेकिन भारत की सफल एयर स्ट्राइक से साबित होता है कि नई दिल्ली सामरिक तौर पर भी कामयाब हो सकती है और कूटनीतिक तौर पर भी। इस हमले से पहले कूटनीतिक स्तर पर भारत ने हालात अपने पक्ष में बना लिए थे। बेशक हम यह नहीं चाहते कि मामला युद्ध तक पहुंचे, लेकिन आतंकियों को खत्म करने की ऐसी पहल भी जरूरी है।
भारत के पक्ष में यह माहौल यूं ही नहीं बना है। जी-20 सहित तमाम देशों से हमारे आर्थिक रिश्ते बेहतर हुए हैं। दुनियाभर में हमारा कद बढ़ा है। आतंकवाद की ही बात करें, तो अरसे से हम इसके शिकार रहे, लेकिन हर बार हमने राजनयिक तौर पर इसका हल तलाशा। हां, साल 2001 में जब हमारी संसद पर हमला हुआ था, तब भारतीय सेना को तैयार रहने को कहा गया था। लेकिन तब 'काउंटर टेररिज्मÓ में शामिल कई देशों ने भारत से ऐसा न करने का आग्रह किया था, और हमने उसे मान लिया था। इसी तरह, आगरा शिखर सम्मेलन में भी हम उस शख्स के साथ शांति-वार्ता के लिए बैठे, जिसने कारगिल युद्ध की व्यूह रचना की थी। जाहिर है, भारत ने पहले भी कूटनीतिक बदलाव के संकेत दिए थे, लेकिन किन्हीं वजहों से उसने कोई सख्त सैन्य कदम नहीं उठाए। लेकिन अब पुलवामा हमले के बाद हालात काफी बदल गए हैं। यह संदेश देना जरूरी था कि भारत आतंकवाद के खिलाफ हर तरह के कदम उठा सकता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी यह कहना पड़ा कि न छेड़ेंगे, न छोड़ेंगे।
बहरहाल, भारत की कूटनीतिक पहल यह भी बता रही है कि जो देश आतंकवाद के खिलाफ मोर्चा ले रहे हैं, उन्हें अब यह बताया जा सकता है कि मिल-जुलकर जंग लडऩे पर ही सफलता सुनिश्चित हो सकती है। काउंटर टेररिज्म एक बड़ी और लंबी लड़ाई है, जिसका हल किसी अकेले देश से संभव नहीं है। फिर, दक्षिण एशिया के सभी देशों को साथ में लेकर भारत पाकिस्तान पर दबाव बनाने की रणनीति बना सकता है। इन दिनों संयुक्त राष्ट्र सहित तमाम अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर भी आतंकवाद एक बड़ा मुद्दा बनने लगा है। इसलिए आने वाले दिनों में पाकिस्तान को घेरने के लिए कई नई रणनीति हम देख सकते हैं।
शशांक, पूर्व विदेश सचिव