ध्यान का अर्थ है स्वयं के भीतर अंतर्दृष्टि
   Date13-Mar-2019

हम कहें कि बचपन से लेकर के और बुजुर्ग होने तक बुढ़ापे तक क्या बदला है, तो उत्तर है- अनुभूतियाँ। बचपन में हमारी जो अनुभूतियाँ थीं, बड़े होने पर उनमें बदलाव आने लगा और फिर धीरे-धीरे हमारे अनुभवों का तल बदलने लगा। जो चीजें हमारे लिए पहले महत्वपूर्ण थीं, वो धीरे-धीरे महत्वहीन होती गईं। जो चीजें पहले हमें अच्छी लगती थीं, वो फिर हमें अच्छी नहीं लगने लगीं, जिनके प्रति हमारा लगाव था, उनसे हमारी विरक्ति हो गई।
आंतरिक दृष्टि की सम्यक स्पष्टता के साथ हमारे दृष्टिकोण में अंतर दिखलाई पडऩे लगता है। इसे ऐसे भी कहा जा सकता है कि चेतना के विकास के क्रम में व्यक्तित्व में भी आमूलचूल परिवर्तन दृष्टिगोचर होता है। सामान्य विकास क्रम में यह प्रक्रिया थोड़ी धीमी गति से होती है, लेकिन ध्यान की मदद से चेतनात्मक परिर्वतन के ये आयाम बड़ी तीव्र गति से हमारे समक्ष आते व घटित होते हैं। अंतर्यात्रा के गति पकड़ते ही सत्य के पदार्पण की संभावना साकार होती दिख पड़ती है।
अपने को सविस्तार देख पाने की घटना एक दिन में नहीं घटती है। इसलिए पतंजलि कहते हैं कि साधना दीर्घकाल तक निरंतरतापूर्वक और दृढ़तापूर्वक करनी चाहिए। इसलिए ध्यान के लिए रोज बैठने की जरूरत होती है। जैसे-हम कोई पुस्तक पढ़ते हैं और कोई पाठ्यक्रम पूरा करते हैं तो हमें रोज उसे पढऩा पड़ता है। उदाहरण के लिए हमारा एम.ए. का पाठ्यक्रम है, जो दो साल का है। बी.ए. का पाठ्यक्रम है, वो तीन साल का है, तो तीन साल के पाठ्यक्रम में हम एक के बाद एक नई चीजें पढ़ते चले जाते हैं और तीन साल में उस पढ़ाई को पूरा कर लेते हैं। बीच-बीच में जो परीक्षाएँ होती हैं, वो हमें बता देती हैं और हमें समझा देती हैं कि हमने पढ़ाई में कितनी प्रवीणता पाई है।
ध्यान में भी कुछ ऐसा ही है। इसके द्वारा हम अपने को परत-दर-परत जानते हैं। परत दर-परत हम अनुभूतियाँ प्राप्त करते हैं और इन अनुभूतियों 3 के माध्यम से हमें यह पता चल जाता है कि हम ध्यान की गहराई में कितना प्रवेश कर पाए हैं। देखा जाए तो जिस व्यक्ति के भीतर समझ जितनी ज्यादा मात्रा में है, वो बाहर की चीजों को उतने ही अच्छे ढंग से देख पाता है, समझ पाता है।
उदाहरण के लिए, एक व्यक्ति जो औसत मानसिक चेतना का है, वो संसार को औसत ढंग से समझता है। एक अन्य व्यक्ति जिसमें समझदारी अधिक है या वह एक वैज्ञानिक है, तो चीजों को वो थोड़ा और बेहतर समझता है। समझदारों की इस श्रेणी को हम विज्ञानवेत्ता, विद्वान, कलाकार, कवि, मनीषी आदि नामों से संबोधित करते हैं।