जनता के सिर पर मुकुट धरो...

त्वरित टिप्पणी - शक्तिसिंह परमार
 
भारत में 17वीं लोकसभा के लिए 'लोकतंत्र' का सबसे बड़ा महोत्सव 'चुनाव' का कार्यक्रम घोषित हो चुका है...यानी तैंतीस कोटि जनता के मानस मंथन और निर्णय की घड़ी आ चुकी है...विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र 'भारत' में सर्वाधिक शक्ति सम्पन्न वह जनता-जनार्दन ही है, जो यह तय करने के लिए स्वतंत्र है कि 'भारत का मजबूत लोकतंत्र' किन हाथों में सुरक्षित है..? क्योंकि भारत में राजकाज व्यवस्था से जुड़े प्रत्येक पद के लिए फर्श से अर्श तक (पंच से प्रधानमंत्री) प्रत्येक 5 वर्ष में जनता निर्णय करने की अधिकारी है...यानी विश्व के इस सबसे वृहद, मजबूत, अनोखे एवं समय व युगानुकूल परिवर्तनशील 'भारतीय लोकतंत्र' की प्राणवायु इसके लिए प्रति 5 वर्ष में होने वाली पारदर्शी, निष्पक्ष चुनावी प्रक्रिया है.., जो इसकी थाती भी है...क्योंकि भारत के संसदीय इतिहास को वैभवशाली एवं सम्पन्न बनाने में हमारी चुनावी प्रक्रिया अनेक मायनों में महत्वपूर्ण है...दुनिया के अनेक देशों ने भारत की चुनाव प्रक्रिया, नियमों एवं संसदीय प्रक्रिया का समय-समय पर भारत आकर न केवल अनुभव लिया.., बल्कि इसे आत्मसात भी किया है...याद करें 2002 में अटलजी ने अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों को जम्मू-कश्मीर में भारत की निर्वाचन प्रक्रिया का आकलन/विश्लेषण करने की अनुमति देकर उन मौकापरस्त ताकतों के हाथों से तोते उड़ा दिए थे.., जो जम्मू-कश्मीर में चुनाव प्रक्रिया को अंतरराष्ट्रीय मंच पर सिर्फ ढकोसला/दिखावा करार देने से नहीं अघाते थे...कहने का तात्पर्य यही है कि भारत की निर्वाचन प्रक्रिया सबसे सटीक, पारदर्शी एवं निष्पक्ष है...क्योंकि इसमें अंतिम निर्णायक शक्ति का केंद्रबिंदु मतदाता ही हैं.., जो अपने अमूल्य वोट के जरिए लोकतंत्र की जड़ों को कैसी और कितनी ऊर्जा/ताकत देना है, का निर्धारण करते हैं...यानी भारतीय प्रजा (मतदाता) ही देश की वास्तव में 'राजा' है.., जो अपनी कोटि-कोटि विवेकशीलता का परिचय देकर देश में लोकतंत्र की मजबूती को अक्षुण्य बनाए हुए है...और इसी जनता-जनार्दन की यह भी खूबी है कि यह अच्छे-अच्छों को अपने मन की थाह लेने या वोट की चोट किस पर करने वाली है..? इसका भान तक नहीं होने देती...राष्ट्रकवि रामधारीसिंह दिनकर ने क्या खूब लिखा है-
 
हुंकारों से महलों की नींव उखड़ जाती,
सांसों के बल से ताज हवा में उड़ता है,
जनता की रोके राह, समय में ताव कहां?
वह जिधर चाहती, काल उधर ही मुड़ता है।
 
भारतीय लोकतंत्र ने समय-समय पर देशकाल एवं परिस्थिति के अनुसार अनेक मिथक तोड़े हैं तो अनेक आयाम गढ़े भी हैं...16वीं लोकसभा के लिए 2014 में भारत के संसदीय इतिहास में पहली बार 9 चरणों में मतदान प्रक्रिया पूर्ण कराने वाला चुनाव आयोग अपनी ऊर्जा, संसाधन एवं सक्रियता बढ़ाकर 2019 में 7 चरणों में लोकतंत्र के इस महोत्सव को पूर्ण कराएगा...1 अरब 30 करोड़ से अधिक आबादी वाले भारत में करीब 90 करोड़ से अधिक मतदाता अपने मताधिकार के जरिए चुनावी महोत्सव के साक्षी बनेंगे...इस बार सर्वाधिक 8.34 करोड़ नए मतदाता हैं, जिनमें 1.5 करोड़ 18 से 19 वर्ष की आयु के युवा मतदाता भी लोकतंत्र में निर्णायक भूमिका का निर्वाह करेंगे...करीब 5 वर्ष से लगातार ईवीएम को सवालों के घेरे में खड़ा करने वाले विपक्ष को भी इस बात से राहत मिलेगी कि सभी 10 लाख से अधिक मतदान केंद्रों पर वीवीपीएटी का उपयोग होगा और सभी मतदान केंद्र सीसीटीवी की निगरानी में होंगे...हेल्पलाइन नंबर 1950 एवं एप के जरिए चुनाव आयोग 100 मिनट के अंदर सभी शिकायतों का निराकरण करेगा...आपराधिक रिकार्ड की जानकारी देना प्रत्येक प्रत्याशी के लिए अनिवार्य किया गया है...कहने का तात्पर्य यह है कि हमारा लोकतंत्र समय के साथ जितना परिपक्व एवं मजबूत हो रहा है, उसको मजबूती देने वाली चुनाव प्रक्रिया भी उसी द्रुतगति से परिष्कृत एवं प्रभावी होती जा रही है...यह भारतीय लोकतंत्र में मतदाताओं को उनकी इच्छा-आकांक्षा को पूर्ण करने और उनकी जागरूकता को प्रणाम करने के रूप में भी देखा जाना चाहिए...
 
17वीं लोकसभा का यह चुनाव किसी वैचारिक समर से कम नहीं है.., क्योंकि इस वैचारिक समर के मंथन-विश्लेषण से प्रेरित होकर ही तो मतदाता अपने मतों की आहुतियां लोकतंत्र की इस वेदी (ईवीएम) में डालने को प्रेरित होंगे...2014 से इतर 2019 का यह चुनावी घमासान अनेक मायनों में महत्वपूर्ण है...यह सिर्फ सत्ता की लड़ाई तक सीमित नहीं है.., यह सिर्फ किसी के प्रधानमंत्री बने रहने या प्रधानमंत्री बनने की जोड़-तोड़ और होड़ तक का सियासी संग्राम भी नहीं है..,सीमा सुरक्षा, आतंकवाद, भ्रष्टाचार, महंगाई, बेरोजगारी और जाति-वर्गभेद जैसी ज्वलंत समस्याओं के समाधान का चुनावी अवसरभर नहीं है..,बल्कि लोकसभा का यह समर भारतीय लोकतंत्र 21वीं सदी में भारत को किस रूप में देखना चाहता है..? वैश्विक मंच पर भारत को कौन से पायदान पर खड़ा करना चाहता है..? और भारत की सनातन समरस परंपरा को कैसे मजबूती मिलेगी..? इसके निर्धारण की यह शुभबेला है...जिसमें मजबूत लोकतंत्र के लिए वोटरूपी आहुतियां ही तय करेंगी कि भारत की जनता की राह को समय-काल और क्षणिक स्वार्थ की परिस्थितियां रोक नहीं सकते.., क्योंकि वह राष्ट्र को देवता मानकर अपने राष्ट्रधर्म के निर्वाह को तत्पर है...कवि ने क्या खूब लिखा है...
 
आरती लिए तू किसे ढूंढता है मूरख,
मंदिरों, राजप्रासादों में, तहखानों में?
अभिषेक आज राजा का नहीं, प्रजा का है,
तैंतीस कोटि जनता के सिर पर मुकुट धरो।