बेकाबू होती प्याज की कीमतें...
   Date03-Dec-2019

vishesh lekh_1  
सालभर होने के हो, लेकिन देशभर में प्याज की कीमतें लगभग सभी मौसमों में आसमान छूती रही। कुछ समय के लिए गरमी में जब नई प्याज आई थी, तो भाव कुछ कम हुए थे, लेकिन इसके बाद जो सिलसिला रह-रहकर प्याज के दामों में वृद्धि का चला, तो वह रुकने का नाम ही नहीं ले रहा है... स्थिति इतनी विकट हो चुकी है कि लगातार बारिश, बाढ़ और निर्धारित बरसात अवधि निकल जाने के बाद भी जब बारिश का दौर नहीं थमा तो, जो प्याज की फसलें बाजार में आना थी, वह खराब होकर खेतों में ही रह गई... ऐसे में बिचौलियों और जमाखोरों की चांदी हो गई... दिल्ली में तो 80 से 100 रु. के बीच प्याज के भाव लगातार बने हुए हैं... इसमें कभी कुछ नरमी तो कभी और तेज उछाल देखने को मिलता है... प्याज केवल गरीबों के उपयोग की खाद्य वस्तु नहीं है, जिसे चुनाव में मुद्दा बनाया जाए... क्योंकि भारत में अनेकों बार प्याज के दामों के मुद्दे पर ही केन्द्र व राज्य में सरकारें जनता पलट चुकी है... इसलिए अब प्याज का गरीब से या गरीबी से नाता नहीं रहा, बल्कि यह आम और खास सभी के निवाले में शामिल ऐसी वस्तु बन चुकी है, जिसके दाम अब हमेशा आसमान की तरफ ही निगाहें किए हुए रहते हैं... प्याज के दाम उपभोक्ताओं के ही नहीं, सरकार के भी रह-रहकर आंसू निकाल रही है... कभी केन्द्र के तो कभी राज्य के... क्योंकि जब ज्यादा उत्पादन होता है तो राज्य सरकार पर किसी भी तरह से उन्हें खरीदकर डंप करने का भार पड़ता है... और जब आवक कम होती या उत्पादन घटता है, दाम बढ़ता है तो सारी जिम्मेदारी केन्द्र के माथे ढोले दी जाती है... इसलिए प्याज हर किसी को रुलाता ही है...
इसमें कोई दो राय नहीं है कि इस वर्ष खरीफ सीजन में लगातार बारिश के कारण प्याज की फसलें बड़े स्तर पर खराब या बर्बाद हुई हैं... इसीलिए प्याज के उत्पादन में इस वर्ष करीब 26-30 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है... ऐसे में जो प्याज कोल्ड स्टोरेजों में रखा था, उस पर बिचौलियों की निगाहें भी टेढ़ी होती रही... इसलिए जब-जब सरकार ने प्याज के दामों को थामने का प्रयास किया और आयात संबंधी निर्णय लिया, तभी इनके दामों में तेजी आ गई... 20 नवम्बर को ही केन्द्रीय मंत्रिमंडल ने 1.2 लाख टन प्याज आयात करने का फैसला किया था... तब दिल्ली में 60 से 70 रुपए प्याज चल रहा था, आज यह 100 से 120 रुपए के बीच बिक रहा है... इंदौर में ही सामान्य गुणवत्ता वाला (छंटाई वाला) प्याज 40 से 50 रु. बिक रहा है... अब केन्द्र सरकार ने तुर्की से 11 हजार टन प्याज आयात करने का फैसला किया है... यही नहीं, अन्य देशों से भी प्याज के आयात को बढ़ाया जा रहा है... प्याज के दामों की निगरानी के लिए केन्द्र सरकार ने गृह मंत्री की अध्यक्षता में एक समूह भी बनाया है, जिसमें वित्त मंत्री, उपभोक्ता मामले के मंत्री, कृषि मंत्री और सड़क परिवहन मंत्री को शामिल किया गया है... कुल मिलाकर भारी बारिश से सिर्फ प्याज उत्पादन किसान ही नहीं, बल्कि उपभोक्ता और सरकार भी लगातार दो-चार हो रही है, क्योंकि दाम बेकाबू हैं, जिससे सरकार भी परेशान है और प्याज खराब होने से किसान भी स्वयं को ठगा हुआ महसूस कर रहा है...
दृष्टिकोण
कॉल व डाटा दरों में वृद्धि के मायने...
दूरसंचार सेवा प्रदाता कंपनियों ने पिछले महीने ही अपनी कॉल व डाटा दरों में करीब-करीब 50 प्रतिशत तक वृद्धि का ऐलान कर दिया था... और यह वृद्धि मंगलवार यानी 3 दिसम्बर से लागू होने जा रही है... कुछ कंपनियों ने तो अपने निर्धारित समय से पूर्व ही इसमें वृद्धि का निर्णय अमल में ले लिया है... दूरसंचार सेवा प्रदाता कंपनियों की यह वृद्धि चार साल में पहली है... ऐसे में न केवल उपभोक्ताओं पर बातें करने पर भी दरों का बोझ बढ़ेगा, बल्कि मोबाइल के जरिए अपने डाटा उपयोग की वह सहज सुलभ रियायत भी अब महंगी हो चुकी है... सही मायने में इन कंपनियों ने पहले लोगों को एक रोग लगाने की भांति मुफ्त-मुफ्त में डाटा उपलब्ध कराने या कम कीमत में तीन महीने, छह महीने, सालभर के पैकेज चलाकर इस स्थिति में ला खड़ा किया कि अब हर किसी के हाथ में 4-जी मोबाइल है, फिर चाहे वह सब्जी की दुकान पर बैठा युवक हो या फिर पानी पताशे बेचने वाला, जब भी फुर्सत मिली, मोबाइल से फिल्में देखने, गाने सुनना, एक-दूसरे को वीडियो शेयर करना और इससे बढ़कर जो टिक-टॉक ने युवा पीढ़ी की आदतें बिगाड़ दी हैं, उससे अब उन्हें ही समस्याएं खड़ी होने लगी हैं... क्योंकि डाटा कितना ही महंगा हो जाए, वह अपना शौक पूरा करने के लिए हर हाल में रिचार्ज करवाते ही हैं... ऐसे में कंपनियों ने जब ये भांप लिया कि डाटा व कॉल दरें महंगी होने के बाद भी उनके व्यापार में कोई कमी नहीं आना है, तभी तो वे मनमाफिक तरीके से दरों में वृद्धि कर रही हैं... वोडाफोन, आयडिया, एयरटेल, जिओ, सभी ने अपना मासिक, सालाना पैक महंगा किया, डाटा और कॉल दोनों महंगी हुई। यही नहीं, प्रीपेड उपभोक्ताओं पर भी अतिरिक्त बोझ कंपनियों ने डाल दिया है...