चुनावी बांड के विरोध का मूल कारण राजनीतिक
   Date03-Dec-2019

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अवधेश कुमार
चु नावी बांड को लेकर देश में तूफान मचा हुआ है। सड़क से लेकर संसद तक इसके खिलाफ आवाज उठ रही है। आरोप यह है कि चुनावी बांड द्वारा मनी लॉन्ड्रिंग हो रही है और फर्जी नाम से कंपनियां बनाकर राजनीतिक दलोंं को चंदा दिया जा रहा है। यह भी सच है कि 3 जनवरी 2018 से जबसे चुनावी बांड आरंभ हुआ, इसके माध्यम से सबसे ज्यादा धन भाजपा को ही मिला है। इसमें यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि अगर चुनाव बांड सभी दलों के लिए था तो फिर भाजपा को ही सबसे ज्यादा चंदा क्यों मिल रहा है? इसका जवाब हम अपने नजरिए से दे सकते हैं और दिया भी जा रहा है। राजनीतिक जवाब तो यही है कि भारतीय जनता पार्टी ने अपने लाभ के लिए चुनावी बांड की व्यवस्था की, लेकिन यदि हम निष्पक्ष होकर विचार करेंगे तो निष्कर्ष वही नहीं आएगा, जो इस समय बताया जा रहा है। एक समय था, जब सबसे ज्यादा चंदा कांग्रेस पार्टी को मिलता था। कांग्रेस केंद्र से लेकर राज्यों तक सत्ता में थी। इस समय कांग्रेस कमजोर हालत में है। भाजपा की सत्ता केन्द्र से लेकर अनेक राज्यों में है। इसमें स्वाभाविक ही कारपोरेट और व्यापारी वर्ग उसे ज्यादा चंदा दे रहे हैं। वस्तुत: यहां मूल प्रश्न चुनावी और राजनीतिक दलों के लिए चंदे का है।
इस बात पर लंबे समय से बहस होती रही है कि राजनीतिक दलों को जो भी चंदा मिले, वो पारदर्शी हो। कौन कंपनी या व्यक्ति कितना किस पार्टी को दे रहा है, यह सबके सामने होना चाहिए। पार्टियों का तर्क यह था कि जो चंदा देने वाले हैं, खासकर व्यापारी, वे नहीं चाहते कि उनका नाम सार्वजनिक किया जाए। वास्तव में यह बहुत बड़ी समस्या हमारे देश में रही है। इस समस्या के समाधान के लिए चुनाव सुधार के रूप में या राजनीतिक सुधार के रूप में कई कदम आजादी के बाद से लेकर अब तक उठाए गए, पर उनसे ज्यादा प्रभाव नहीं हुआ। नरेन्द्र मोदी सरकार द्वारा 2017 के बजट में चुनावी बांड की योजना लाने के पीछे भी चुनाव को कालाधन से मुक्ति का ही विचार था। सरकार ने 20 हजार तक की नकदी की सीमा को घटाकर दो हजार कर दिया, क्योंकि 20 हजार तक चंदा देने वाले का स्रोत बताने की आवश्यकता नहीं थी। बसपा ऐसी पार्टी है, जो हमेशा कहती थी कि उसे 20 हजार से ज्यादा चंदा कोई देता ही नहीं। उसकी जगह 2000 नकदी का प्रावधान इसलिए आया ताकि नकद चंदे की गोपनीय प्रवृत्ति पर अंकुश लगे। चुनाव आयोग ने और भारतीय रिजर्व बैंंक ने आरंभ में चुनावी बांड को लेकर कुछ शंकाएं प्रकट की थीं। आज भले उसे उद्धृत कर चुनावी बांड को निशाना बनाया जा रहा है, किंतु काफी विचार-विमर्श के बाद इसका प्रावधान किया गया था। इसमें चंदा देने वालों को भारतीय स्टेट बैंक मेंं अपना अकाउंट खुलवाना है, जिसमें उनको अपनी पूरी जानकारी देनी है। स्टेट बैंक के पास उनका पूरा रिकॉर्ड है। वह कितने का बांड खरीद रहे हैं और कौन-सी पार्टी के लिए ले रहे हैं, यह भी जानकारी है। चंदे की राशि राजनीतिक दल के बैंक खाते में जमा होगी। हां, बांड पर दानदाता का नाम नहीं होगा। इसके पीछे सोच यही थी कि दलों को गुप्त चंदा तो मिलेगा, लेकिन कालेधन के रूप में अज्ञात स्रोत के रूप में नहीं मिल सकेगा। बांड प्रॉमिसरी नोट से मिलता-जुलता एक लिखित दस्तावेज होता है। हां, इस पर कोई ब्याज नहीं मिलता। बांड के जरिए दानदाता अपने पसंद के दल को बैंकिंग संस्था के माध्यम से दान कर सकेंगे। बांड की बिक्री साल के चार माहों जनवरी, अप्रैल, जुलाई, अक्टूबर में दस दिनों के लिए होती है। आम चुनाव के समय बांड की खरीदी की सुविधा ज्यादा दिनों तक की गई। बांड खरीदने वाले दानदाताओं की बैलेंस शीट में इसका वर्णन होगा। इससे पता चलेगा कि उसने स्वच्छ पैसा किस दल को चंदा में दिया है। दानदाता को पता होगा कि उसने किस दल को चंदा दिया है और दल चुनाव आयोग को रिटर्न भरकर देगा।
अगर विपक्ष के आरोप के अनुसार इसमें गड़बड़ी हो रही है तो यह दुर्भाग्यपूर्ण ही कहा जाएगा। प्रश्न उठता है कि अगर हम चुनावी बांड की व्यवस्था को खत्म करते हैं तो उसकी जगह चुनावी चंदे के लिए या राजनीतिक दलों के चंदे के लिए कौन-सी व्यवस्था खड़ी की जाए? इसका सीधा उत्तर किसी के पास नहीं है। कारपोरेट ने राजनीतिक दलों और चुनावी चंदे के लिए मिलकर कुछ ट्रस्ट बनाए। उनसे भी चंदा आता है, पर वह भी सफल व्यवस्था नहीं मानी जा रही। वास्तव मेें आपस में तू-तू मैं-मैं या गुत्थम-गुत्थी की बजाय राजनीतिक दलों, मीडिया और बुद्धिजीवी- सबको यह विचार करना चाहिए कि आखिर ऐसी कौन-सी व्यवस्था हो, जिसमें खुलकर राजनीतिक दलों को कोई चंदा दे और चंदा देने वाले के अंदर यह भय न रहे कि हम जिस पार्टी को कम चंदा दे रहे हैं, वो कल हमारे खिलाफ कार्रवाई कर सकती है। पार्टियों का पूरा चंदा कहां से आता है, यह भी जानकारी सार्वजनिक हो जाए। यह एक आदर्श स्थिति होगी। हम समझ सकते हैं कि यहां तक पहुंचना बहुत कठिन है। आदर्श के रूप में बातें करना जितना आसान है, व्यवहार में उसे उतारना उतना ही कठिन। जिस ढंग से हमारे देश में राजनीतिक प्रतिस्पर्धा राजनीतिक दुश्मनी में बदल गई है, उसमें यह बिलकुल स्वाभाविक है कि एक पार्टी को चंदा देने वाले के बारे में दूसरी पार्टी को पता चल जाए तो वह उसके खिलाफ प्रतिशोध के भाव से काम कर सकती है। इसी सोच के तहत चुनावी बांड के जरिए चुनावी और राजनीतिक चंदे को बैंकों के माध्यम में लाया गया था।
निस्संदेह, इस समय चुनावी बांड के विरोध के पीछे मूल कारण राजनीतिक हैं। अगर दूसरी पार्टियों को भाजपा के समान या उनके आसपास चंदा मिला होता तो पार्टियां इसे कभी मुद्दा नहीं बनातीं। इसलिए राजनीति में जो आवाजें उठ रही हैं, उनके आधार पर हम विचार नहीं कर सकते। सवाल यह है कि क्या जो राजनीतिक दल बदलाव चाहते हैं, वे कम से कम खर्च में चुनाव लडऩे को तैयार हैं? क्या वे पारदर्शी तरीके से चंदा लेने के लिए तैयार हैं और क्या चंदा देने वाले बिल्कुल खुलकर राजनीतिक पार्टियों को चंदा देने को तैयार हैं? ये ऐसे प्रश्न हैं, जिनका समाधान किसी कानून से और किसी सरकारी व्यवस्था से नहीं हो सकता। चुनावी चंदे को पारदर्शी बनाना केवल कानून का विषय नहीं है। आप कोई कानूनी ढांचा या व्यवस्था खड़ी कर दें, उससे वैसा आमूल बदलाव नहीं हो सकता, जिसकी भारतीय राजनीति एवं चुनाव प्रणाली को आवश्यकता है। यह मुख्यत: राजनीतिक सुधार का विषय है। राजनीतिक सुधार के मायने यह हैं कि राजनीतिक पार्टी अपने खर्चे कम करें और चुनाव कम से कम खर्च में आयोजित हो जाएं। इसके लिए कोई पार्टी तैयार नहीं है। दुर्भाग्य यह है कि राजनीतिक दलों के व्यवहार से आम जनता की मानसिकता का भी विकृतिकरण हुआ है। अगर कोई ईमानदार व्यक्ति, जिसके पास अकूत धन नहीं है, चुनाव में खड़ा होता है तो आम लोग उसका उपहास उड़ाते हैं। जो धनबल के साथ चुनाव में उतरता है, जिसके प्रचार-प्रसार ज्यादा होते हैं, उनकी ओर लोगों का आकर्षण भी ज्यादा रहता है। तो एक मतदाता के नाते आम जनता को भी विचार करना चाहिए कि हमको एक ईमानदार, सक्षम और योग्य प्रतिनिधि चाहिए या वो जिनके पास धन की शक्ति है? मतदाता के नाते हमें यह भी विचार करना पड़ेगा कि हम कैसे राजनीतिक दल को मत देें? तो चुनावी स्वच्छता की स्थापना राजनीतिक दलों के साथ आम जनता और मतदाता की भी जिम्मेदारी है। हमें यह विचार करना चाहिए कि कैसा वातावरण बनाएं, जिसमें राजनीतिक स्वच्छ और पारदर्शी हो? आदर्श व्यवस्था तभी स्थापित हो सकती है, जब एक मतदाता के नाते हम ईमानदार, योग्य और सक्षम प्रतिनिधि को महत्व दें, न कि केवल धनबल वाले को। अगर चुनावी बांड से निकली बहस इस दिशा में जाए, तभी कुछ हो सकता है, अन्यथा यह आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति तक सीमित रह जाएगा, जो साफ दिख रहा है।