व्यक्तित्व के रूपांतरण की प्रक्रिया है ध्यान
   Date03-Dec-2019

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धर्मधारा
ध्या न हमारे मन में एक चुंबकत्व यानी एक मैग्नेटिक फील्ड तैयार करता है। भावना और विचार, इन्हीं के द्वारा यह चुंबकत्व तैयार होता है। इस चुंबकत्व के माध्यम से इसकी प्रकृति के अनुरूप हम वातावरण से, प्रकृति से चीजों को आकर्षित करते हैं। एक बार की सत्य घटना है, श्रीमाँ पांडिचेरी में थीं। वहाँ एक जगह, जहाँ लोग प्रार्थना करते हैं, मेडिटेशन करते हैं, वहाँ पर वे बैठी थीं, अन्य लोग भी बैठे थे। उन्होंने कहा कि देखो! आज हम तुम लोगों को बताते हैं कि शांति का आव्हान कैसे करते हैं? उन्होंने कहा कि जरूरी नहीं है कि तुम संस्कृत में शांति पाठ के मंत्र बोलो, लेकिन तुम गहरे हृदय से, गहरे भाव से शांति को पुकारो और फिर लोगों ने देखा कि धीरे-धीरे वहाँ पर गहरी शांति छाने लगी, वातावरण बदल गया, ऐसा लगा कि पृथ्वी में सचमुच सब कुछ शांत हो रहा है। उन्होंने कहा कि जब हम अपने केंद्र में बैठ करके प्रकृति से किसी चीज का आव्हान करते हैं तो वो हमें प्राप्त होती है। हम जो बुलाते हैं, वो हमें मिलता है, जो माँगते हैं, वो दिया जाता है। ईसा मसीह ने भी कहा है-नॉक - दि डोर एंड डोर विल बी ओपन। द्वार खटखटाओ तो वो द्वार खुलेगा। हम द्वार खटखटाते हैं और वह खुलता है।
जीवन की सबसे बड़ी विडंबना है कि प्राय: हम गलत चीजों की कल्पना करते हैं और प्रकृति से हम प्राय: वह माँगते हैं, जो हमारे जीवन के लिए नुकसानदेह है, जिसकी हमें आवश्यकता नहीं है और जो हमें नहीं चाहिए। जैसे-हम कल्पना करते हैं कि बहुत दिनों से हमारी तबीयत ठीक नहीं है, हम बीमार तो नहीं हो जाएँगे? हमारे संशय, हमारी शंकाएँ, हमारे संदेह, हमारी नकारात्मकता-प्रकृति से हमारे लिए वही बटोर लाते हैं। हम बिना सोचे-समझे, बिना जाने-बूझे, अपने जिन विचारों व भावों को अपने मन में स्थान देते हैं, मन के अस्तित्व में उसके बीज बोते हैं। जब हम बार-बार यह सोचते हैं कि कहीं ऐसा तो नहीं हो जाएगा, तो हम ऐसा करके नकारात्मक चीजों का आव्हान करते रहते हैं। हम भूल जाते हैं कि जो हम माँग रहे हैं, वो ध्यान मन की इस स्थिति में परिवर्तन लाता है। ध्यान हमारे व्यक्तित्व को पात्र बनाता है तथा हमारे अंदर एक नई काबिलियत, एक नई योग्यता, एक नई पात्रता विकसित करता है।