निर्भयाकांड की पुनरावृत्ति...
   Date02-Dec-2019

देश की राजधानी दिल्ली में 2012 में मानवता को शर्मसार करने वाला एवं पाश्विकता की पराकाष्ठा को पार करने वाला वीभत्स सामूहिक दुष्कर्म आज भी हर किसी को झकझोर जाता है...वह घटनाक्रम आज भी सभ्य समाज के माथे पर किसी कलंक के समान अमिट बना हुआ है..क्योंकि आज भी निर्भया की अस्मत से खेलने वाले और उसके प्राणों की बलि लेने वाले दोषी जेल की सलाखों के पीछे चैन से जिंदगी गुजार रहे हैं...7 साल पहले हुए उस घटनाक्रम की टीसें आज भी हर किसी को बदहवास करने का कारण बन जाती है...जैसे ही दिसंबर आता है दिल्ली का निर्भयाकांड महिला सुरक्षा के मामले को चर्चा में ले आता है...लेकिन इस बार तेलंगाना के हैदराबाद में जिस बर्बर और पाश्विक पराकाष्ठा को पार किया गया है...वह हमें निर्भयाकांड के बाद पुन: उससे भी बदतर और बर्बर निर्भयाकांड की पुनरावृत्ति का प्रमाण दे रहा है...जिस चालाकी और लम्पटता के साथ महिला पशु चिकित्सक के खिलाफ सामूहिक व्याभिचार की साजिशें रची गई वह हमारी कानून व्यवस्था एवं महिला सुरक्षा इंतजामों की पोल खोलने का पर्याप्त कारण बन चुकी है...क्योंकि अब नारी समाज किस पर विश्वास करे और आपदा के समय किसकी बात पर विश्वास करे..? इस विश्वास का गला तेलंगाना के निर्भयाकांड भाग-2 ने घोंट दिया है...क्योंकि दिल्ली में तो निर्भया उस सामान्य घटनाक्रम का शिकार हुई जिसमें उसे बस में लिफ्ट चाहिए थी और मौका देखकर हैवानों ने उसे अपनी हवस का शिकार बनाया...लेकिन तेलंगाना का यह वीभत्स घटनाक्रम दिल्ली के उस पापाचार से भी घृणित, घातक और बर्बर है...जिसमें महिला चिकित्सक को अपने जाल में फांसने के लिए सुनियोजित तैयारी के साथ उसके स्कूटर को पंचर किया गया और सहयोग-सहायता करने के बहाने उसकी अस्मत से खिलवाड़ के बाद जिंदा भी जला दिया...क्योंकि यह तो आरोपी बता रहे है कि दुष्कर्म के बाद मौत के चलते उसे जलाया...क्या पता उसे बेहोंशी की अवस्था में ही वहशियों ने आग के हवाले कर दिया होगा...अब इस पूरे घटनाक्रम पर केंद्र सरकार अपनी एडवाइजरी जारी कर रही है तो राज्य सरकार के गृहमंत्री ऐसे मूर्खतापूर्ण बयान दे रहे है जिनकी पुनरावृत्ति वे क्या अपने परिजनों के साथ होते देखना स्वीकार करेंगे..? दिसंबर प्रारंभ हो चुका है...निर्भया को न्याय के बहाने और अब महिला पशु चिकित्सक को न्याय दिलाने के नाम पर कैंडल मार्च निकालकर इंसाफ पाने के लिए मैदान पकडऩे वाले अभ्यस्त लोगों से इतर क्या समाज के जिम्मेदार वर्ग सरकार, कानून के रक्षक और न्याय मंदिर महिला सुरक्षा के लिए बनाए गए कानूनों और नियमों का पालन करवाने की सक्रियता दिखाएंगे..? क्योंकि निर्भया कांड के दोषियों को जब फांसी की सजा देने के सारे रास्ते साफ हो चुके है फिर उन्हें किस बात की आड़ में जिंदा रखा गया है..? जब तक निर्भया के दोषियों को फंदे पर नहीं लटकाया जाएगा...तब तक तेलंगाना से लेकर अन्य स्थानों पर होने वाले वहशी घटनाक्रमों की पुनर्रावृत्ति होती रहेगी...
दृष्टिकोण
वनवासियों से भूमि छीनने का खेल...
मध्यप्रदेश में कांग्रेसी कमलनाथ सरकार ने गत दिनों निर्णय लिया था कि अनुसूचित क्षेत्रों में आदिवासी समाज की जमीन को गैर आदिवासी खरीद सकेंगे...इसके बाद प्रदेश की ही राजनीति में हड़कंप नहीं मचा..,बल्कि आदिवासी समाज की भूमि रक्षा के लिए जो नियम कानून बने थे उस पर भी सवालिया निशान लग गए...इसमें कोई दो राय नहीं कि अगर आज आदिवासी समाज के पास अपनी कोई भूमि शेष है या सुरक्षित है...तो इसके पीछे वह कड़ा कानून है जो आदिवासियों की जमीन को अन्य लोगों को खरीदने की कानून अनुमति नहीं देता..,क्योंकि न तो उसकी रजिस्ट्री हो सकती है और न ही उस पर खरीदी-बिक्री के साथ कोई बैंक ऋण हो सकता है...सिर्फ आदिवासी की जमीन को आदिवासी ही खरीद, बेच सकता है...लेकिन कमलनाथ सरकार भू-राजस्व संहिता की धारा 165 व 172 में संशोधन कर आदिवासी क्षेत्रों में गैर आदिवासियों द्वारा जमीन के डायवर्शन पर 10 वर्ष की बाध्यता को समाप्त कर दिया... सही मायने में यह निर्णय मध्यप्रदेश के करोड़ों आदिवासियों से उनका भू-अधिकार और उनकी भूमि के संरक्षण के कानून को छीनने जैसा है...क्योंकि संविधान की 5वीं अनुसूची का पैरा-5 (2) (अ) अनुसूचित क्षेत्रों में अथवा जनजाति के किसी व्यक्ति की भूमि के हस्तांतरण को प्रतिबंधित करता है...अब भले ही मुख्यमंत्री यह बोल रहे हो कि आदिवासी की जमीन गैर आदिवासी को बेचने पर प्रतिबंध लागू रहेगा...सिर्फ अनुसूचित क्षेत्रों में गैर आदिवासी की जमीन खरीदने पर डायवर्शन की समय सीमा को समाप्त किया गया है...क्या इस समय सीमा की आड़ में भी जमीन का खेल खेलने वाले आदिवासियों से उनका हक नहीं छीन लेंगे...