अर्थव्यवस्था की चुनौती बनता बढ़ता राजकोषीय घाटा
   Date02-Dec-2019

जयंतीलाल भंडारी
भा रत का राजस्व घाटा और राजकोषीय घाटा तेजी से बढ़ रहा है। वैश्विक क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों ने भारत की विकास दर के अनुमान को घटाया है और भारत के राजस्व घाटे और राजकोषीय घाटे में इजाफा होने के विश्लेषण पेश किए हैं। पिछले दिनों आए ताजा राजस्व आंकड़ों के अनुसार केंद्र सरकार का राजकोषीय घाटा वित्त वर्ष 2019-20 की पहली छमाही (अप्रैल से सितंबर, 2019) में बजट अनुमान के 92.6 फीसद पर पहुंच गया है, जबकि इस अवधि में राजस्व घाटा बजट अनुमान के सौ फीसद पर पहुंच गया। स्पष्ट है कि राजकोषीय और राजस्व घाटे की हालत खराब नजर आ रही है।
गौरतलब है कि वित्तीय वर्ष की राजस्व प्राप्ति और राजस्व व्यय के अंतर को राजस्व घाटा कहते हैं। जबकि वित्तीय वर्ष के राजस्व घाटे के साथ जब सरकार की उधारी और अन्य देयताएं जोड़ देते हैं, तो उसे राजकोषीय घाटा कहते हैं। इसमें कोई दो मत नहीं है कि भारत में कारपोरेट कर सहित अन्य करों में लगातार छूट दिए जाने और कर संग्रह में कमी के कारण चालू वित्तीय वर्ष 2019-20 में सरकार का राजस्व घाटा बढ़ेगा और सरकार का राजकोषीय घाटा सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 3.3 फीसद के निर्धारित लक्ष्य से बढ़ कर चार फीसद के स्तर पर पहुंच सकता है। ऐसे में बढ़ते हुए राजकोषीय घाटे से महंगाई और क्रेडिट रेटिंग में कमी जैसी नई चिंताएं अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ी चुनौती बन जाएंगी।
सरकार ने वित्त वर्ष 2019-20 के लिए कर संग्रह में पिछले वर्ष की तुलना में 17.5 प्रतिशत वृद्धि का लक्ष्य रखा है, लेकिन यह लक्ष्य प्राप्त होना मुश्किल लग रहा है। कर संग्रह उम्मीद से कम रहने की वजह मांग में गिरावट और उद्योग-कारोबार को राहत देना भी है। वर्ष 2019-20 के बजट में विभिन्न वर्गों की उम्मीदों को पूरा करने के लिए जो प्रावधान किए गए हैं, उन पर व्यय तुलनात्मक रूप से अधिक हो रहे हैं। देश के उद्योग-कारोबार में सुस्ती के मद्देनजर वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) संग्रह में भी कमी दिखाई दे रही है। इस साल अक्टूबर में जीएसटी संग्रह घट कर 95380 करोड़ रुपए रहा। जबकि पिछले साल अक्तूबर में जीएसटी संग्रह एक लाख करोड़ रुपए से ज्यादा रहा था।
देश में कर राजस्व में धीमी वृद्धि और कॉरपोरेट कर में कमी से केंद्र सरकार के साथ-साथ राज्यों को भी झटका लगा है। कारपोरेट करों में कमी से सकल कर राजस्व में एक लाख पैंतालीस हजार करोड़ रुपए का घाटा होगा, जिसमें से साठ हजार करोड़ रुपए का भार राज्य वहन करेंगे। देश के सोलह प्रमुख राज्य अपनी वित्तीय स्थिति बिगडऩे के कारण राजकोषीय संकट के कगार पर खड़े हैं। उन पर धीमी पड़ती राजस्व वृद्धि और कारपोरेट कर में कमी की दोहरी मार पड़ रही है। ऐसे में ज्यादातर राज्यों को या तो अपने खर्च में कटौती करनी पड़ेगी या उनका राजकोषीय घाटा बढ़ेगा। निश्चित रूप से राजस्व संग्रह में कमी और कारपोरेट करों में कटौती के कारण सरकार के वित्त संसाधनों पर भारी दबाव है। केंद्र सरकार ने इस वित्त वर्ष में सात लाख करोड़ रुपए उधारी का लक्ष्य रखा है। चालू वित्त वर्ष के पहले छह महीने में बजट में प्रस्तावित उधारी कार्यक्रम के तहत 4.42 लाख करोड़ रुपए जुटाए जा चुके हैं, बाकी 2.62 लाख करोड़ रुपए दूसरी छमाही में जुटाए जाएंगे। इसके साथ ही सरकार को कर चोरी रोकने के उपायों को अपनाना होगा। बेहतर कर अनुपालन से राजकोषीय घाटे पर काबू के लिए अधिकतम प्रयास करने होंगे। सरकार कुछ ऐसी वस्तुओं एवं सेवाओं पर जीएसटी बढ़ा सकती है जो शून्य से पांच फीसद कर दायरे में आती हैं और जिन पर जीएसटी बढ़ाना न्यायसंगत लगे।
बढ़ता राजकोषीय घाटा भारत की क्रेडिट रेटिंग भी घटा रहा है। हाल में वैश्विक रेटिंग एजेंसी मूडीज इन्वेस्टर सर्विस ने भारत की क्रेडिट रेटिंग 'स्थिरÓ से घटाकर 'ऋणात्मकÓ कर दी। रेटिंग घटाने के पीछे मूडीज ने भारतीय अर्थव्यवस्था में सुस्ती जारी रहने, ग्रामीण परिवारों पर वित्तीय दबाव, रोजगार सृजन कम होने और गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों में नकदी संकट का हवाला दिया। दो साल पहले नवंबर, 2017 में मूडीज ने वर्ष 2004 से चली आ रही भारत की रेटिंग को बीएए-3 से बढ़ा कर बीएए-2 कर दिया था। मूडीज के निर्णय से पता चलता है कि देश में आर्थिक विकास के निचले स्तर पर बने रहने का जोखिम बढ़ रहा है। धीरे-धीरे कर्ज का बोझ बढ़ रहा है, जो पहले से ही उच्च स्तर पर है। इससे कारोबारी निवेश और उच्च वृद्घि को मदद देने के लिए भविष्य के सुधारों की संभावना भी कम हुई है।
हालांकि कई वैश्विक रिपोर्टों में भारत की तस्वीर कुछ ठीक भी हुई है। विश्व बैंक की ईज ऑफ डूइंग बिजनेस-2020 रिपोर्ट में भारत एक सौ नब्बे देशों की सूची में अब तिरसठवें स्थान पर पहुंच पाया है। विश्व बैंक ने भारत को उन अर्थव्यवस्थाओं में शामिल किया है, जिन्होंने लगातार तीसरे साल अपनी रैंकिंग में सुधार किया है। प्रमुख कारोबार सूचकांकों के तहत कारोबार एवं निवेश में सुधार का परिदृश्य भी दिखाई दे रहा है। वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में तेज वृद्धि, कंपनी कानून में सुधार और शिक्षा पर खर्च बढऩे के कारण भारत एशिया-प्रशांत क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ा है। इस रैकिंग में भारत 43वें स्थान पर आ गया है। बौद्धिक संपदा एवं नवाचार में भी भारत की स्थिति सुधरी है।
ऐसे में जरूरी है कि उन बातों पर और अधिक ध्यान दिया जाए जिनसे देश की क्रेडिट रेटिंग ऋणात्मक स्थिति में पहुंच गई है। हमें आर्थिक सुधार की दिशा में अभी लंबा रास्ता तय करना है। अभी कई कमियों और चुनौतियों पर ध्यान दिया जाना जरूरी है। निसंदेह सरकार के पास व्यापक आर्थिक और वित्तीय सुधार कार्यक्रम मौजूद हैं और उनमें से कुछ सुधारों को पहले ही लागू किया जा चुका है, जबकि बाकी सुधारों को लागू किया जाना शेष है। देश की अर्थव्यवस्था में बड़े बदलाव के लिए विकास के साथ-साथ रोजगार अवसरों को बढ़ाया जाना होगा। विनिर्माण क्षेत्र की वृद्धि दर बढ़ानी होगी। कर अनुपालन और भुगतान को और सरल किया जाना होगा। जीएसटी का क्रियान्वयन सरल बनाया जाना होगा। सरकारी बैंकों के पुनर्र्पूंजीकरण को कारगर तरीके से नियंत्रित करना होगा। उद्यमियों की सुगमता के लिए नौकरशाही के दबाव करने और बैंकिंग प्रक्रिया आसान करने की जरूरत है। रोजगार, निर्यात और निजी निवेश बढ़ाने के कारगर प्रयास किए जाने होंगे और भ्रष्टाचार पर काबू पाना होगा।
यदि राजकोषीय घाटे को नियंत्रित करने के ऐसे विभिन्न प्रयासों से भी राजकोषीय घाटा नियंत्रित नहीं होता है और यह जीडीपी के चार फीसद तक पहुंचता दिखाई देता है तो सुस्ती के दौर से अर्थव्यवस्था को निकालने के लिए इस घाटे को चिंताजनक नहीं माना जाना चाहिए। इस साल के अर्थशास्त्र के नोबेल पुरस्कार विजेता अभिजीत बनर्जी के हाल ही में दिए इस मत को भी सरकार को ध्यान में रखना चाहिए कि सरकार वित्तीय स्थिरता पर ज्यादा चिंतित होने की बजाय अर्थव्यवस्था में नई मांग का सृजन करे। सरकार को किसानों की आय दुगनी करने, नवीकरणीय ऊर्जा और सस्ते आवास से संबंधित ढांचागत नीतियों पर तेजी से काम करना होगा। राजकोषीय घाटे के आकार में कुछ वृद्धि उपयुक्त कही जा सकती है। इससे एक ओर आम आदमी की क्रय शक्ति बढ़ेगी, जिससे नई मांग निकलेगी और उद्योग-कारोबार की गतिशीलता बढ़ेगी, वहीं दूसरी ओर बढ़े हुए सार्वजनिक व्यय और सार्वजनिक निवेश से बुनियादी ढांचे को मजबूती मिलेगी।