अनासक्त कर्म ही मुक्ति का मार्ग
   Date02-Dec-2019

धर्मधारा
क र्म ही जीवन का आधार है। कर्म ही सृष्टि का आधार है। अत: कर्म के बिना जीवन और जगत की तो कल्पना ही नहीं की जा सकती। फिर कर्म किए बिना कोई कैसे रह सकता है? स्वयं ईश्वर भी कर्म से रहित नहीं हो सकते। कर्म की बड़ी महिमा है; क्योंकि कर्म बंधन का कारण भी है और बंधन से मुक्ति का कारण भी। अशुभ कर्म बंधन का कारण है तो शुभ कर्म बंधन से मुक्ति का कारण है। सकाम कर्म बंधन का कारण है तो निष्काम कर्म बंधन से मुक्ति का कारण है। आसक्तिपूर्ण कर्म हमें दु:खों के दुष्कर बंधन में बाँधता है, जन्म-मृत्यु के बंधन में बाँधता है, तो अनासक्त कर्म हमें सभी प्रकार के बंधनों से मुक्त कर देता है, सभी प्रकार के द्वंद्वों से मुक्त करता है और जीवन-मरण के बंधन से भी मुक्त कर देता है। यदि हमें अपने जीवन में बंधनों से मुक्त रहना है, द्वंद्वों से मुक्त रहना है, दु:खों से मुक्त रहना है और सदा आनंदित-रहना है तो हमारे कर्म भी निष्काम होने चाहिए, हमारे कर्म-भी अनासक्त होने चाहिए। हम सदैव शुभ कर्म, पुण्य कर्म तो करें ही पर सिर्फ शुभ कर्म, पुण्य कर्म करना ही पर्याप्त नहीं; क्योंकि कामना व आसक्ति के साथ किए गए पुण्य कर्म, शुभ कर्म भी अंतत: हमारे लिए बंधन का ही कारण बनेंगे, दु:खों का ही कारण बनेंगे। कामना व आसक्तिपूर्ण कर्म भी हमारे आनंद में बाधक होंगे, हमारी मुक्ति व मोक्ष में बाधक होंगे और ईश्वरोपलब्धि में बाधक होंगे।
इसलिए हमें शुभ कर्म करना तो है, पुण्य कर्म करना तो है, पर कामनारहित होकर, अनासक्त होकर, कर्म में कर्तापन की भावना से मुक्त होकर, कर्म में सफलता मिले या असफलता उससे अविचलित होकर; जीवन में मान मिले या अपमान, जीवन में हर्ष हो या विषाद दोनों में सम रहकर, दोनों ही स्थिति में अविचलित रहकर; क्योंकि जब हम स्वयं को कर्म के परिणाम से जोड़ लेते हैं, कर्मफल से जोड़ लेते हैं तो हम सदैव ही सुख और दु:ख के झूले में झूलते रहते हैं, हम सदैव ही व्यथित और व्याकुल रहते हैं; क्योंकि कर्म का परिणाम कभी हमारी आशा के अनुकूल आ सकता है और कभी प्रतिकूल भी।
अनुकूल परिणाम पाने पर हम हर्षित होंगे तो प्रतिकूल परिणाम पाने पर हम दु:खी तो होंगे ही। अत: हमें कर्म में, कर्मफल की आशा और आसक्ति का ही त्याग करना है तभी हम सुख और दु:ख, हर्ष और विषाद, आशा और निराशा से ऊपर उठकर, उन दोनों से मुक्त होकर स्थायी आनंद की अनुभूति कर सकेंगे।
जैसे हम स्वयं को खेल के परिणाम से जोड़ लेते हैं, हार और जीत से जोड़ लेते हैं, तब हम स्वयं को उस कर्म के बंधन में बाँध लेते हैं। इसलिए हम हार मिलने पर दु:खी होते हैं और जीत मिलने पर सुखी होते हैं और फिर हम उस
खेल का आनंद नहीं ले पाते। पर जब हम उस खेल को मात्र द्रष्टा भाव से देखते हैं, साक्षी भाव से देखते हैं, एक ज्ञानी, एक कर्मयोगी की दृष्टि से देखते हैं तब उस खेल का परिणाम चाहे कुछ भी हो, हार हो या जीत, वह हमें ना तो हर्षित करता है, ना ही दु:खी करता है,