संप्रग के पाप धोने के लिए मुक्त व्यापार से तौबा...
   Date01-Dec-2019

ब्रेक
के बाद
शक्तिसिंह परमार
न वम्बर के प्रथम सप्ताह में ब्राजील में आसियान शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने दुनिया के समक्ष एक बड़ा फैसला लिया, जिसका स्पष्ट संदेश भारतीय हितों के संरक्षण को दर्शाता है... जिसको लेकर चीन समेत तमाम कारोबारी देश भारत के फैसले पर नाक-भौं भी सिकोड़ रहे हैं... क्योंकि यह निर्णय भारत के लिए बहुत आसान नहीं था, लेकिन उसने अपने राष्ट्रीय हितों की प्राथमिकताओं को सामने रखकर निर्णय करने का साहस दिखाया... समर्थित क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझेदारी (आरसीईपी) यह एक ऐसा आर्थिक समझौता था, जो केवल अपने नाम के अनुरूप ही अपना दायरा व्यापक स्तर पर नहीं दर्शा रहा है, बल्कि इसमें कारोबारी क्षेत्रफल की दृष्टि से भी वृहद प्रभाव और विस्तार नजर आता है... क्योंकि इसमें आसियान संगठन के प्रमुख दस देश जिनमें इंडोनेशिया, मलेशिया, फिलीपींस, सिंगापुर, थाईलैंड, ब्रुनेई, वियतनाम, लाओस, म्यांमार और कंबोडिया शामिल हैं... यही नहीं, चीन, भारत, जापान, द. कोरिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड इन दस मुक्त व्यापार देशों के भागीदार है... यानी यह संख्या कुल 16 देशों की हो जाती है, जिसकी वैश्विक आबादी का कुल हिस्सा 3.6 अरब होता है... अगर इन देशों के बीच भारत मुक्त व्यापार को हरी झंडी दिखाता तो क्या स्थितियां देश के कारोबारी जगत, उद्योगों, व्यापारियों और उपभोक्ताओं के बीच निर्मित होती..? क्या पहले से ही गलाकाट प्रतिस्पर्धा के चलते कारोबार को या तो बंद करने या फिर मुनाफा न मिल पाने के लिए दिन-रात सरकार की नीतियों को कोसने वाले भारतीय इसे अपनी आत्महत्या करार नहीं दे देते..? इसलिए इस समझौते से बाहर रहने का फैसला दूरगामी दृष्टि से भारतीय हितों की सुरक्षा गारंटी है...
भारत आयात-निर्यात में संतुलन बनाए रखने के लिए वैश्विक मंच से कारोबारी नीतियों को लेकर सदैव चर्चारत और चिंतित भी रहा है... आरसीईपी को लेकर सात वर्षों से भारत की तरफ से चर्चा को आगे बढ़ाया जा रहा है, क्योंकि इस व्यापार समझौते से भारत के घरेलू उद्योगों के हित जुड़े हुए हैं... भारतीय किसानों, सूक्ष्म, लघु एवं मझौले उपक्रमों और डेयरी क्षेत्र से लेकर वे सभी छोटे-बड़े क्षेत्र जो संगठित-असंगठित लोगों की आजीविका के प्रमुख आधार हैं, ये इस समझौते से शत-प्रतिशत प्रभावित हुए बिना नहीं रहते... लेकिन भारत के इन सुझावों पर आसियान देशों या फिर आरसीईपी का मसौदा तैयार करने वाले देशों ने कोई ध्यान नहीं दिया... प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कहा कि - 'आरसीईपी करार में भारत द्वारा उठाए गए शेष मुद्दों और चिंताओं को भी संतोषजनक तरीके से दूर नहीं किया जा सका है, ऐसे में भारत के लिए आरसीईपी समझौते में शामिल होना संभव नहीं है...Ó
भारत द्वारा आरसीईपी से पीछे कदम हटाने के मामले में यह स्पष्ट मत भारत सरकार के समक्ष था कि 2018-19 में आरसीईपी के अंतर्गत 15 में से 11 सदस्य देशों के साथ भारत का घाटे का व्यापार रहा... यह व्यापार घाटा 2018-19 में 184 अरब डॉलर का था.., जबकि आरसीईपी देशों से भारत को महज 34 फीसदी आयात व 21 फीसदी निर्यात हुआ... चीन अब तक भारत में बड़ा निर्यातक देश है, केवल चीन के साथ ही भारत का व्यापार घटा... बहुत बड़ा रूप ले चुका है.., क्योंकि हर साल चीन इलेक्ट्रिक मशीनरी, उपक्रम, प्लास्टिक उत्पाद, इस्पात, एल्यूमीनियम, फर्नीचर भारत में जमकर खपाता है... यही डर था कि अगर आरसीईपी समझौता हुआ तो चीन के यही उत्पाद भारत में दोगुनी मात्रा में बढ़ जाएंगे.., लेकिन भारत ने तमाम तरह के अंतर्राष्ट्रीय दबावों व अंतर्राष्ट्रीय समझौतों की शर्तों से इतर अपने राष्ट्रीय हितों और अपने लोगों के व्यापार, उद्योग हितों के संरक्षण को प्राथमिकता दी...
आरसीईपी समझौता होता तो विदेशी कंपनियों द्वारा रायल्टी और तकनीकी शुल्क की भारत की मांग भी समाप्त हो जाती... क्योंकि कांग्रेसनीत संप्रग सरकार के समय में जो व्यापारिक विदेशी समझौते हुए थे और निवेशकों को मुक्त व्यापार के मान से जो सुविधाएं देने का वादा किया गया था, वे उन्हें नहीं मिल पाई... इसलिए उन कंपनियों ने भारत पर मुकदमे ठोकना शुरू कर दिया था... कई कंपनियों ने तो भारत से बड़ा मोटा-तगड़ा जुर्माना भी वसूल लिया था... ऐसे में इस मुक्त व्यापार समझौते से दूरी बनाकर भारत की मोदी सरकार ने संप्रग के उन पापों को धोने का काम किया है, जो लोगों के हितों की कीमत पर परवान चढ़ाने का रास्ता बना चुकी थी... क्योंकि आरसीईपी समझौते के तहत हमारा मुकाबला किसी विदेशी उत्पाद से होना असंभव है... 10 करोड़ किसानों और गैर किसानों की जीविका इसी कारोबार के अंतर्गत चलती है... जबकि न्यूजीलैंड का सारा डेयरी उत्पाद (जिसे वे दुनियाभर में निर्यात करते हैं) साढ़े दस हजार डेयरियों से आता है... यही नहीं, दुनिया का 30 प्रतिशत डेयरी निर्यात सिर्फ न्यूजीलैंड करता है... न्यूजीलैंड में दूध पावडर 150 रु. किग्रा है... जबकि भारत में यह 290 रु. किग्रा है... अब विचार करें कि भारत का डेयरी उद्योग क्या इनके आगे टिक पाता..? यही नहीं, जापान चावल, गेहूं, कपास, चीनी, डेयरी के संरक्षण पर 33.8 अरब डॉलर खपाता है, यानी किसानों, उद्योगों, उत्पादकों के हितों का वहां व्यापक संरक्षण है... उस दृष्टि से हम इस समझौते के मापदंडों पर अपने उत्पादों या उत्पादकों का संरक्षण कम से कम तीन दशक तो करने में असमर्थ हैं...
यह मुक्त व्यापार के नाम से चर्चित हुआ आरसीईपी सिर्फ कृषि व दूध डेयरी तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें निवेश, मैन्यूफैक्चरिंग, टेलीकॉम, रसायन, इस्पात, डाटा, कलेक्शन, ऑटो मोबाइल, साइकिल, टेक्सटाइल, ई-कॉमर्स समेत विभिन्न क्षेत्रों में व्यापक निवेश के जरिए भारतीय बाजार, कारोबार पर विदेशी राष्ट्रों की कब्जा जमाने की रणनीति थी... जिसका सभी भारतीय प्रतिनिधि क्षेत्र लगातार विरोध करते रहे थे... इसका सभी तरफ से विरोध होने के चलते मोदी सरकार लंबे समय से ऊहापोह में थी... लेकिन उसने आरबीआई की रिपोर्ट के बाद समाधान यही निकाला कि फिलहाल मुक्त व्यापार से तौबा में ही भारतीय हितों और यहां के उत्पादों व उत्पादकों का संरक्षण है... क्योंकि इन सभी क्षेत्रों में अगर आरसीईपी लागू हो जाता तो आयात शुल्क को शून्य करना पड़ता, जिससे विदेश निर्मित उत्पादों सामान की बाढ़ आ जाती... यानी मुक्त व्यापार समझौता इसका सीधा-सा मतलब यही होता कि आयात शुल्क को मुक्त कर यानी शून्य करके विदेशी माल की आवाजाही का रास्ता भारत स्वयं खोलता... इससे भारतीय हितों की गला दबाने वाली नीति का परिचय मिलता... जिसे मोदी सरकार ने नहीं स्वीकारा...
अगर भारत मुक्त व्यापार को हरी झंडी दिखाता तो चीन से आने वाले 80 प्रतिशत उत्पादों और अन्य देशों से आने वाले 90 से 95 फीसदी उत्पादों पर शुल्क शून्य हो जाता... 2011 से हम 10 आसियान देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौता चला रहे हैं... जिसके चलते इन देशों से हमारा व्यापार घाटा लगातार बढ़ता जा रहा है... इस समझौते में जाने के बाद न तो बाहर निकल सकते हैं और न ही इस पर किसी तरह के पुनर्विचार की गुंजाइश है... अब विचार किया जा सकता है कि मोदी सरकार ने कितना दीर्घकालिक राष्ट्रहितैषी निर्णय लिया है... लेकिन सार्वजनिक उपक्रमों जैसे बीपीसीएल, भारतीय रेलवे व अन्य को विनिवेश के जरिए निजी हाथों में सौंपने या फिर अपना राजकोषीय घाटा कम करने के लिए मुनाफे वाले उपक्रमों को भी बेचने का यह सिलसिला उचित नहीं माना जा सकता... क्योंकि सरकार का काम सिर्फ प्रबंधन देखनाभर नहीं है, बल्कि नीतियों, निर्माण, उत्पादन और निर्यात में संतुलन के साथ एकरूपता बनाए रखने की जिम्मेदारी भी है... इसलिए मुक्त व्यापार पर ना सही है, लेकिन विनिवेश पर हां को कभी भी सही व राष्ट्रहित में नहीं माना जा सकता...