हजारों करोड़ का बैंक घोटाला...
   Date09-Nov-2019

देश की अर्थव्यवस्था को अगर रसातल में पहुंचाने के लिए बैंकों को भी जिम्मेदार माना जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होना चाहिए..,क्योंकि जिस तरह से बैंकों के जरिए घोटाले और गड़बडिय़ों, अपारदर्शी तरीके से राशि आवंटन और बिना जांचें परखे या कहे कि नियम सम्मत कागजी खानापूर्ति किए ही करोड़ों-अरबों के ऋण मंजूर करने और बाद में उसे मनमाफिक तरीके से दिवालिया घोषित करने के रास्ते सुलझाने का खेल इन दो दशकों में बैंकों में बहुत ही भयावह तरीके से खेला गया है...जिसका हमें समय-समय पर सामना भी करना पड़ा है...पीएनबी घोटाले में जिस तरह से नीरव मोदी ने या फिर शराब माफिया विजय माल्या व मेहुल चौकसी ने देश के बैंकिंग प्रबंधन को रसातल में पहुंचाया किसी से छुपा नहीं है...2016 में हुई 500 व 1000 के नोटों की बदली प्रक्रिया में तो बैंकों और बैंककर्मियों का स्याह चेहरा सामने आ चुका हैं..,उसमें सिर्फ निजी क्षेत्रों के ही नहीं..,बल्कि सरकारी से लेकर उन तमाम तरह के नागरिक व सेवा सहकारी बैंकों की भी पोल खोल चुकी है...जिन्होंने आर्थिक स्वार्थपूर्ति के लिए अपने तमाम बैंकिंग नियमों को ताक पर रख दिया था...इसलिए मोदी सरकार ने अगर बैंकों के विलयकरण और बैंकिंग व्यवस्था को मजबूती देने की पहल की है तो इसका स्वागत होना चाहिए..,लेकिन यह भी देर से उठाया गया दूरगामी कदम है...
मंगलवार को केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) ने 16 राज्यों के 190 स्थानों पर छापेमार कार्रवाई को अंजाम दिया...यह मामला बैंकों में धोखाधड़ी के जरिए 7200 करोड़ रु. के बैंकिंग घोटाले के रूप में सामने आया है जिसके जरिए देश के विभिन्न हिस्सों में तमाम बैंकिंग शाखाओं को पलीता लगाया गया...170 से अधिक सीबीआई टीमों ने देशभर के 16 राज्यों के विभिन्न शहरों में इन शाखाओं व अन्य ठिकानों से बैंकिंग लेनदेन में की गई धोखाधड़ी के दस्तावेज व साक्ष्य जुटाए है...अगर 2019 के मान से देखें तो यह इस साल की सबसे बड़ी छापेमार कार्रवाई है जिसमें सीबीआई ने महाराष्ट्र में 58 स्थानों पर छापे मारने के साथ ही दिल्ली, गुरुग्राम, गाजियाबाद, देहरादून, वाराणसी, पटना, चंडीगढ़, हैदराबाद में छापेमार कार्रवाई को अंजाम दिया...इस आर्थिक घालमेल के तार आंध्रा बैंक , ओरिएंटल, इंडियन ओवरसीज, स्टेट बैंक, इलाहाबाद बैंक, केंद्रा बैंक, देना बैंक, पंजाब बैंक, सिंध बैंक, पीएनबी, सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया, यूनियन बैंक ऑफ इंडिया, आईडीबीआई बैंक, बैंक ऑफ बड़ौदा, बैंक ऑफ इंडिया और बैंक ऑफ महाराष्ट्रा से तार जुड़े हैं...यही नहीं आर्थिक अनियमितता के तार विदेशों तक राशि के हस्तांतरण के रूप में जुड़े हुए पाए गए हैं...कुल मिलाकर जिस तरह की गड़बडिय़ां इस सीबीआई छापामार कार्रवाई में सामने आई है...इससे उन उपभोक्ताओं का मनोबल और टूटना है, जिन्होंने अपने खून-पसीने की कमाई को बैंकों में सुरक्षित होने का भ्रम पाल रखा था...क्योंकि महाराष्ट्र में पीएमसी बैंक घोटाला दर्जनभर लोगों की जान ले चुका हैं...क्योंकि जिस तरह से परतें खुल रही है और नियोजक अपना धन उसमें डूबा मानकर न केवल सदमें का शिकार हो रहे हैं..,बल्कि हार्टअटैक व अन्य कारणों से अपने प्राण भी गंवा रहे हैं...फिलहाल तो सीबीआई की यह कार्रवाई घोटाले का खुलासा और इसकी आर्थिक अनियमितता से जुड़े पक्षों के तार खंगाल रही है...जब तक दोषियों पर कार्रवाई होगी या उन्हें चिन्हित करेगी तब तक इस घोटाले से ही कितने बैंकिंग उपभोक्ताओं को पीएमसी की भांति अपने ही धन पर डाका पड़ जाने का भय सताता रहेगा और कितनों की ही जान चली जाएगी इस पर विचार कानून-नियम के रखवालों को करना चाहिए...
दृष्टिकोण
नेहरू स्मारक -संग्रहालय में सफाई...
देश के प्रथम प्रधानमंत्री पण्डित जवाहरलाल नेहरू के नाम से बने नेहरू स्मारक पुस्तकालय एवं नेहरू संग्रहालय सोसायटी का केंद्र की नरेन्द्र मोदी सरकार ने पुनर्गठन कर दिया है...जिस तरह की संभावनाएं लगाई जा रही है या खबरें हवा में तैर रही थी कि इन तमाम तरह के ट्रस्टों, स्मारकों व उन सोसायटियों जिनमें कहीं न कहीं आर्थिक या फिर सामाजिक व राष्ट्रहित से जुड़ी गतिविधियों का संचालन होता है जिन्हें संचालन के लिए आर्थिक रूप से केंद्र एवं राज्य सरकारें प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से सहयोग करती है...इन सभी तरह की व्यवस्थाओं को पारदर्शी तरीके से संचालन हेतु न केवल गांधी-नेहरू परिवार..,बल्कि कांग्रेस के उन मठाधीशों के शिकंजे से भी मुक्त करने की जरूरत है...जिन्होंने इन स्मारकों, सोसायटियों व ट्रस्टों को अपनी बपौती समझकर मनमाफिक तरीके से आर्थिक गबन को भी बढ़ावा देने में कोई कसर नहीं छोड़ी है...अब अगर कांग्रेस के कोई नेता या विपक्षी दल सरकार के इस कदम की भी आलोचना कर रही है तो उनकी बुद्धि पर तरस आता है...क्योंकि जब सरकार बदलती है तो इस तरह के संस्थानों में विचार-कार्यों को बढ़ावा देने वाले सरकार सम्मत लोगों की जरूरत भी है...जब कांग्रेस ने 50-60 साल तक इन तमाम तरह के संस्थानों में सिर्फ कम्युनिस्टों, गांधी परिवार के करीबियों या फिर कांग्रेसियों को ही विराजमान किया तब क्या उनकी छुट्टी करके इन संस्थानों में बेहतर कार्य योजना बनाने वाले लोगों का प्रवेश नहीं होना चाहिए..? यह पहल करके मोदी सरकार ने सही मायने में नेहरू स्मारक पुस्तकालय एवं संग्रहालय सोसायटी को नया जीवनदान दिया है...